लॉर्ड डलहौजी: विकास के आवरण में छिपा साम्राज्य विस्तार का गुप्त खेल
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। भारत के औपनिवेशिक इतिहास का अध्ययन करते समय लॉर्ड डलहौजी का नाम अनिवार्य रूप से सामने आता है। 1848 से 1856 तक गवर्नर-जनरल रहे डलहौजी को आधिकारिक इतिहासकार अक्सर आधुनिक भारत का शिल्पकार बताते हैं। रेलवे, टेलीग्राफ, डाक व्यवस्था, शिक्षा सुधार और प्रशासनिक पुनर्गठन जैसे अनेक कार्य उन्हें एक दूरदर्शी प्रशासक के रूप में स्थापित करते हैं। लेकिन इन सभी विकास कार्यों का मूल उद्देश्य भारत का हित नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य को अधिक शक्तिशाली, अधिक लाभकारी और अधिक नियंत्रित बनाना था।
डलहौजी के आगमन के साथ ब्रिटिश नीति में आया निर्णायक परिवर्तन
डलहौजी एक कठोर साम्राज्यवादी थे। भारत आने से पहले ही वे ब्रिटिश संसद में ‘औपनिवेशिक विस्तार’ के समर्थक के रूप में पहचाने जाते थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी का लक्ष्य भारत में “संपूर्ण राजनीतिक सर्वोच्चता” स्थापित करना होना चाहिए। इस सोच का सीधा असर उनकी सभी नीतियों पर पड़ा। चाहे वह प्रशासनिक सुधार हो, भू-राजस्व नीति हो, या फिर रियासतों के विलय के मुद्दे।
भारत आने के बाद डलहौजी ने माना कि यह देश विशाल संसाधनों से संपन्न है और अगर इसे सुव्यवस्थित प्रशासन व संचार प्रणाली से बांधा जाए तो यह ब्रिटिश व्यापार के लिए सबसे बड़ा बाजार बन सकता है। इसलिए उनके शासन का हर बड़ा कदम भारत की अर्थव्यवस्था व राजनीति को ब्रिटिश हितों के अनुरूप ढालने की एक सुनियोजित प्रक्रिया थी।
लैप्स सिद्धांत: साम्राज्यवादी विस्तार का सबसे कठोर औजार
डलहौजी की सबसे विवादास्पद नीति “Doctrine of Lapse” थी। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी भारतीय राजा की जैविक संतान नहीं होती, तो उसकी गोद ली हुई संतान को मान्यता नहीं दी जाती और राज्य स्वतः ही कंपनी शासन में शामिल कर लिया जाता। यह नीति भारतीय परंपराओं, धर्म और राजकीय व्यवस्था पर सीधा आक्रमण थी, क्योंकि हिंदू समाज में दत्तक संतान को पूर्ण उत्तराधिकारी माना जाता है। लेकिन डलहौजी ने इसे नजरअंदाज किया।
उनके शासनकाल में सतारा (1848), जौनपुर (1850), संबलपुर (1850), झांसी (1853), नागपुर (1854) और बघाट समेत कुल सात रियासतें लैप्स सिद्धांत के तहत अंग्रेजों ने हड़प लीं। सबसे अधिक विवाद झांसी और नागपुर को लेकर हुआ। रानी लक्ष्मीबाई द्वारा दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी घोषित करने के बावजूद डलहौजी ने इसे अस्वीकार किया। इस निर्णय ने भारतीय जनता की भावनाओं को गहरा आघात पहुंचाया और बाद में 1857 विद्रोह की चिंगारी को तेज कर दिया।

डलहौजी का तर्क था कि दत्तक उत्तराधिकार व्यवस्था से शासन “अस्थिर” और “अकुशल” हो जाता है। परंतु सत्य यह था कि वे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन लाना चाहते थे, ताकि राजनीतिक विस्तार और आर्थिक नियंत्रण दोनों सुनिश्चित हो सकें।
अवध का विलय: सुधार के नाम पर राजनीतिक कब्ज़ा
अगर डलहौजी की किसी नीति ने जनता और सैनिकों दोनों में सबसे अधिक असंतोष उत्पन्न किया, तो वह था अवध का विलय। 1856 में उन्होंने नवाब वाजिद अली शाह को “कुशासन” का दोषी ठहराकर सत्ता से हटा दिया और अवध को कंपनी शासन में मिला लिया।
अवध भारत की सबसे समृद्ध रियासतों में से एक थी। इसका उपजाऊ भूभाग, मजबूत सेना और धनसंपदा ब्रिटिश व्यापारियों के लिए आकर्षण का केंद्र थे। इसलिए “कुशासन” का आरोप पूरी तरह राजनीतिक था। इस विलय का सबसे भीषण प्रभाव अवध की सेना पर पड़ा। हजारों सैनिक बेरोजगार हो गए, जिन्हें बाद में 1857 में कंपनी के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करना आसान हो गया। अवध के किसानों पर राजस्व का बोझ बढ़ा, ताल्लुकेदारों की जमीनें जब्त हुईं और सामाजिक व्यवस्था चरमरा गई।
इतिहासकारों की सर्वसम्मति है कि डलहौजी ने अवध को “जबरन कब्जे” की नीति से अधिग्रहित किया और यह कदम 1857 के विद्रोह के कारणों में एक बना।
कथित विकास कार्य: आधुनिकता या ब्रिटिश मुनाफाखोरी?
डलहौजी को भारत में आधुनिक बुनियादी ढांचे का जनक कहा जाता है, लेकिन यह विकास भारतीयों के लिए नहीं था। सभी प्रमुख विकास योजनाओं का उद्देश्य ब्रिटिश व्यापार, सैन्य नियंत्रण और प्रशासनिक पकड़ को मजबूत करना था।
रेलवे: लाभ भारतीयों को नहीं, ब्रिटिश उद्योगों को
भारत में पहली रेल 1853 में चली, लेकिन इसका उद्देश्य यात्रियों की सुविधा नहीं था। ब्रिटिश सरकार ने रेलवे निर्माण के लिए “गारंटी सिस्टम” लागू किया, जिसके अनुसार अंग्रेजी कंपनियों को 5 प्रतिशत न्यूनतम लाभ की गारंटी दी गई। यदि लाभ 5% से कम होता, तो इसकी भरपाई भारतीय राजकोष करता।
रेलवे से ब्रिटिशों को यह लाभ हुआ कि भारत का कच्चा माल कपास, जूट, अयस्क, चाय, मसाले तेजी से बंदरगाहों तक पहुंचाया जा सके। ब्रिटिश निर्माण कंपनियों को लोहे के इंजिन, पटरियाँ और डिब्बे बेचने का विशाल बाजार मिला। सैनिकों की तेज आवाजाही सुनिश्चित हुई, जिससे विद्रोहों को तुरंत दबाया जा सके। रेलवे नेटवर्क का विस्तार भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास से अधिक ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को ईंधन देने वाला कदम था।
टेलीग्राफ: सूचना का जाल या विद्रोह कुचलने का हथियार?
इसी प्रकार टेलीग्राफ लाइनें भारत में “संचार क्रांति” नहीं बल्कि “साम्राज्यवादी नियंत्रण” का साधन थीं। विद्रोह के दौरान इन्हें निर्णायक रूप से प्रयोग किया गया। अकबर शाह द्वितीय के उत्तराधिकारी विवाद से लेकर 1857 के विद्रोह तक, ब्रिटिश अधिकारियों ने टेलीग्राफ के माध्यम से तुरंत संदेश भेजकर अपनी सैन्य रणनीति को प्रभावी बनाया। भारतीय जनता को इन लाइनों का कोई वास्तविक लाभ नहीं था, क्योंकि इनका उपयोग केवल सरकार और सेना करती थी।
डाक व्यवस्था: प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाने का माध्यम
डलहौजी ने ‘वन-पैनी पोस्ट’ की शुरुआत की, लेकिन इसका भी उद्देश्य ब्रिटिश अफसरों और व्यापारिक हितों को आसान संचार उपलब्ध कराना था। इस व्यवस्था के माध्यम से प्रशासनिक पत्राचार तेज हुआ, जिससे ब्रिटिश शासन की केंद्रीयकरण नीति मजबूत हुई। भारतीय जनता बड़े पैमाने पर इस सेवा का उपयोग बहुत बाद में कर पाई।
सड़क और नहर परियोजनाएँ: कृषि सुधार नहीं, व्यापार मार्गों का विस्तार
डलहौजी ने कई सड़कों, पुलों और नहरों का निर्माण करवाया, परंतु ये परियोजनाएँ स्थानीय किसानों की सुविधा के लिए नहीं थीं। इनका उद्देश्य यह था कि ब्रिटेन में बनने वाले तैयार माल को भारत के अंदरूनी बाजारों तक पहुँचाया जा सके। भारत के ग्रामीण इलाकों से कच्चा माल तेजी से बंदरगाहों तक लाया जा सके। सेना को संवेदनशील क्षेत्रों तक शीघ्र पहुँचाया जा सके। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश कंपनियों का व्यापार कई गुना बढ़ गया, जबकि भारतीय उद्योग विशेषकर हथकरघा धीरे-धीरे नष्ट हो गया।
शिक्षा नीति: अंग्रेजीकरण की राजनीतिक रणनीति
1854 का वुड्स डिस्पैच भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव कहा जाता है, लेकिन इसका उद्देश्य भारतीयों की बौद्धिक प्रगति नहीं था। ब्रिटिशों को ऐसे “क्लर्क” चाहिए थे जो प्रशासन में उनकी सहायता कर सकें। इसलिए शिक्षा की दिशा ऐसी निर्धारित की गई कि भारतीय अंग्रेजी शासन और संस्कृति को श्रेष्ठ मानें। इस नीति से तीन बड़े प्रभाव हुए। भारतीय भाषाओं का ह्रास प्रारंभ हुआ। शिक्षा शहरी और उच्च वर्ग तक सीमित रह गई। भारत में मानसिक दासता का भाव बढ़ा, जिसे महात्मा गांधी ने बाद में ‘मैकाले शिक्षा’ की गुलामी कहा।
भू-राजस्व और आर्थिक नीतियाँ: किसानों पर निर्मम बोझ
डलहौजी के शासन में भूमि-राजस्व को इतना बढ़ा दिया गया कि भारतीय किसान उसकी भरपाई नहीं कर सके। पंजाब और अवध में तो स्थिति और भी गंभीर हो गई, क्योंकि राजस्व वसूली सीधे अंग्रेजी अधिकारियों के नियंत्रण में थी। इसके परिणामस्वरूप किसान कर्ज के जाल में फँसने लगे। जमींदारों की विशाल भूमि जब्त कर दी गई, और उनका सामाजिक प्रभाव समाप्त होने लगा। यह आर्थिक असंतोष बाद में विद्रोह में बदल गया।
सैन्य नीतियाँ: भेदभाव और अविश्वास का बीज
डलहौजी ने कंपनी सेना में यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई और भारतीय सैनिकों को कठोर अनुशासन के तहत रखा। वेतन, पदोन्नति और सुविधाओं में भेदभाव से सैनिकों में रोष फैलने लगा।
1856 में सेना में नई बंदूकें (एनफील्ड राइफल) आईं, जिनकी चर्बी लगे कागज की कारतूसों ने धार्मिक विवाद को जन्म दिया। हालांकि यह विवाद डलहौजी के जाने के बाद भड़का, परंतु इसकी पृष्ठभूमि उसी भेदभाव और असंतोष ने तैयार की थी जो उनके काल में पनपा।
डलहौजी की नीतियों का अंतिम परिणाम: 1857 का विस्फोट
इतिहासकारों का मानना है कि यदि डलहौजी न होते, तो 1857 का विद्रोह अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं होता। उनकी नीतियों ने भारतीय समाज के हर वर्ग को नाराज़ किया। राजाओं को रियासतें छिन जाने का दुख, सैनिकों को भेदभाव का आक्रोश, किसानों को राजस्व का बोझ, ताल्लुकेदारों को जमीनें खोने का भय और आम जनता को परंपराओं के अपमान की वेदना। इस प्रकार उनका शासन असंतोष का एक विशाल पहाड़ बनकर भारतीय चेतना में जमा रहा, जिसका विस्फोट 1857 में हो गया।
डलहौजी: आधुनिक भारत का निर्माता या औपनिवेशिक शोषण का प्रतीक?
एक व्यापक समीक्षा यह दर्शाती है कि डलहौजी के लगभग सभी विकास कार्य ब्रिटिश व्यापार, सैन्य शक्ति, प्रशासनिक पकड़ और राजनीतिक नियंत्रण को बढ़ाने के लिए थे। भारतीय जनता को प्रत्यक्ष लाभ बहुत कम मिला।
उनकी नीतियों का निष्कर्ष यह है कि रेल, डाक, सड़कें और टेलीग्राफ भारतीयों को सुविधा देने के लिए नहीं थे बल्कि ब्रिटिशों को भारत पर पकड़ मजबूत करने के लिए बनाए गए थे। उनका पूरा शासन ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सबसे स्पष्ट और कठोर रूप था।
विकास के भीतर छिपा हुआ दमन
लॉर्ड डलहौजी की छवि दो परतों वाली है। बाहरी परत उन्हें आधुनिकता का वाहक दिखाती है। रेलवे, संचार व्यवस्था, शिक्षा सुधार। परंतु भीतर की परत साम्राज्यवाद, आर्थिक शोषण, सांस्कृतिक हस्तक्षेप और राजनीतिक विस्तार से भरी है। इसलिए डलहौजी का मूल्यांकन करते समय यह याद रखना आवश्यक है कि उनकी आधुनिकता भारतीयों के लिए नहीं थी, बल्कि ब्रिटिशों की सत्ता को मजबूत करने के लिए बनाई गई थी।






