खानवा के धुएँ में खो गया एक महावीर, राणा सांगा की अपराजित गाथा

संवाद 24 संजीव सोमवंशी।
भारतीय इतिहास के पन्नों में अनेक वीर पुरुषों का नाम शौर्य और त्याग के साथ दर्ज है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी रहे जिनकी महानता समय की धूल में दब गई या जानबूझकर दबा दी गई। राणा संग्राम सिंह, जिन्हें हम राणा सांगा के नाम से जानते हैं, ऐसा ही एक महान नाम है।

वे केवल मेवाड़ के महाराणा नहीं थे, बल्कि वह शासक थे जिसने उत्तर भारत में हिन्दू शक्ति की अंतिम बड़ी धारा को संगठित किया। उनका शासनकाल AD 1509 से 1528 तक रहा, और इन लगभग दो दशकों में उन्होंने इतने युद्ध जीते कि वे उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली हिन्दू शासक के रूप में स्थापित हो गए। राणा सांगा की पहचान केवल तलवार चलाने वाले योद्धा की नहीं थी; वे एक उत्कृष्ट रणनीतिकार, संघटक नेता और दूरदर्शी शासक थे, जिनकी वीरता ऐसी थी कि उनके शरीर पर गहरे घावों के निशान भी उनकी शक्ति को कमज़ोर नहीं कर सके।

राणा सांगा अपने समय में एक ऐसे राजनीतिक वातावरण में उभरे, जहाँ दिल्ली सल्तनत कमजोर हो चुकी थी और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रीय शासक अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं में उलझे थे। यह वह युग था जब सामरिक कौशल और व्यक्तिगत पराक्रम दोनों किसी भी शासक की सफलता के लिए अनिवार्य थे। सांगा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने बिखरे हुए राजपूत राज्यों को एकजुट किया और उन्हें एक संगठित शक्ति के रूप में तैयार किया।

यह कार्य राजपूत इतिहास में अत्यंत कठिन रहा है। आंतरिक मतभेद, पारिवारिक स्पर्धाएँ और सांस्कृतिक विविधताएँ अक्सर राजपूत एकता के मार्ग में बाधा बनती थीं, लेकिन राणा सांगा अपने करिश्माई नेतृत्व से सबको साथ लाने में सफल रहे। यह उनकी कुशलता का ही प्रमाण था कि उनके नेतृत्व में मेवाड़ एक प्रांतीय राज्य से बढ़कर उत्तरी भारत की निर्णायक शक्ति बन गया।

सांगा की सैन्य क्षमता और उनकी सफलताओं का दायरा कई राज्यों तक फैला हुआ था। उन्होंने गुजरात, मालवा और दिल्ली सल्तनत, तीनों प्रमुख मुस्लिम राजतंत्रों को पराजित किया। इन अभियानों ने राणा सांगा की प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुंचाया।

इदर अभियान उनकी व्यापक सैन्य क्षमता का प्रमाण था, जहाँ उन्होंने गुजरात सल्तनत की ताकत को चुनौती देकर यह साबित किया कि मेवाड़ केवल एक रक्षात्मक शक्ति नहीं, बल्कि आक्रामक क्षमता वाला राज्य था।

इसी तरह गागरोन के युद्ध में राणा सांगा ने न केवल विजय प्राप्त की, बल्कि मेदीनी राय जैसे प्रतिष्ठित योद्धा का सम्मान और समर्थन भी अर्जित किया। यह जीत अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे मालवा सल्तनत की शक्ति कमजोर पड़ी और सांगा का प्रभाव मध्य भारत तक फैल गया।

खटोली के युद्ध में राणा सांगा ने दिल्ली सल्तनत के शासक इब्राहिम लोदी को हराया। यह जीत उनकी सैन्य क्षमता का सर्वोच्च उदाहरण मानी गई। इस युद्ध में उन्हें गंभीर चोटें आईं, उनकी एक भुजा और एक आँख क्षतिग्रस्त हुई, लेकिन इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने युद्धक्षेत्र नहीं छोड़ा।

इस विजय के बाद उत्तर भारत की पूरी राजनीतिक व्यवस्था बदल गई। इब्राहिम लोदी की प्रतिष्ठा समाप्तप्राय हो गई और राणा सांगा दिल्ली तक अपना प्रभाव स्थापित करने की स्थिति में आ गए। लोदी के ऊपर यह लगातार दबाव इस बात का संकेत ছিল कि राणा सांगा न केवल क्षेत्रीय सेना रखने वाले शासक थे, बल्कि उनका लक्ष्य सम्पूर्ण उत्तरी भारत में हिन्दू सत्ता की पुनर्स्थापना था।

राणा सांगा की सैन्य रणनीति भारतीय युद्धकला की उस परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण थी, जिसमें घुड़सवार सेना महत्त्वपूर्ण होती थी। राजपूत घुड़सवार अपनी गति, साहस और तलवारबाज़ी के लिए विश्वप्रसिद्ध थे। सांगा ने इस परंपरा को और उन्नत रूप में विकसित किया। उनकी सेना अत्यंत अनुशासित थी, और वे स्वयं युद्ध में सबसे आगे रहने वाले कमांडर थे। उनके नेतृत्व की विशेषता यह थी कि वे अपने सैनिकों को प्रेरित करते थे और उनका मनोबल किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं होने देते थे। यही कारण था कि सांगा की सेना कई बार संख्या और संसाधनों में कमज़ोर होते हुए भी जीत दर्ज करती रही।

सांगा का प्रभाव बढ़ता जा रहा था, और यही बढ़ती शक्ति दिल्ली सल्तनत और अफगान सरदारों के लिए चिंता का कारण बन गई। इसी दौरान उत्तर भारत में एक नई शक्ति उभर रही थी, मध्य एशिया से आए बाबर की। बाबर के पास आधुनिक तोपखाने, बंदूकें और मैदान में किलेबंदी जैसी तकनीक थी, जिसका भारतीय शासक अभी पूरी तरह उपयोग नहीं कर रहे थे। सांगा ने बाबर की चुनौती स्वीकार की, क्योंकि वे उत्तर भारत के राजनीतिक नेतृत्व को अपने हाथों में लेना चाहते थे और यह मानते थे कि बाबर को हराकर वे दिल्ली की सत्ता पुनः प्राप्त कर सकेंगे।

AD 1527 का खानवा का युद्ध राणा सांगा के जीवन का न केवल सबसे महत्वपूर्ण बल्कि सबसे कठिन युद्ध था। इस युद्ध में सांगा की सेना संख्या में बाबर से कहीं अधिक थी, और उनके पास राजपूतों का विशाल गठबंधन भी मौजूद था। लेकिन बाबर के पास आधुनिक तोपखाना और सैन्य तकनीक थी, जिसके सामने राजपूतों की पारंपरिक युद्धशैली कमजोर पड़ गई। बाबर ने लड़ाई के मैदान में लकड़ी के बैरिकेड, तुर्की तोपखाना और गोलीबारी के संयुक्त उपयोग से ऐसी रणनीति अपनाई जिसका सामना भारत में पहली बार राजपूतों को करना पड़ा। राणा सांगा ने अपनी वीरता और अद्वितीय रणकौशल के बल पर युद्ध को लंबा खींचा, लेकिन अंततः तकनीकी असमानता के सामने राजपूत सेना पराजित हो गई। सांगा गंभीर रूप से घायल हुए, और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। यह युद्ध मुगल साम्राज्य की नींव तो बना, लेकिन राणा सांगा की वीरता आज भी भारतीय गौरव का प्रतीक है।

राणा सांगा के बारे में फैलाई गई सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि उन्होंने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया था। यह दावा पूरी तरह निराधार है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। बाबर अपनी आत्मकथा “बाबरनामा” में स्पष्ट रूप से लिखता है कि उसे भारत आने का निमंत्रण अफगान सरदारों—दौलत खान लोधी और अलम खान ने दिया था, जो इब्राहिम लोदी को हटाना चाहते थे। इन परिस्थितियों का राणा सांगा से कोई संबंध नहीं था। यदि सांगा वास्तव में बाबर को बुलाते, तो वह उनसे युद्ध क्यों करते? यह विचार ही तर्क के विरुद्ध है।

सांगा उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली शासक थे, और उनका विस्तार दिल्ली की ओर हो रहा था। इस स्थिति में वे किसी विदेशी शक्तिक्षेत्र को क्यों आमंत्रित करेंगे? सांगा ने बाबर को कभी आमंत्रित नहीं किया; बल्कि उनके साथ संघर्ष यह दर्शाता है कि वे मुगल सत्ता को चुनौती देने वाले प्रमुख योद्धा थे। आधुनिक इतिहासकारों और कई स्वतंत्र संस्थानों के विश्लेषणों ने भी इस दावे को झूठा सिद्ध किया है कि उन्होंने बाबर को इब्राहिम लोदी के खिलाफ आमंत्रित किया।

राणा सांगा की विरासत अमर है क्योंकि उन्होंने एक ऐसे समय में हिन्दू शक्ति का नेतृत्व किया, जब मध्यकालीन भारत कई आक्रमणों और राजनीतिक विभाजनों से गुजर रहा था। उनकी वीरता, नेतृत्व और बलिदान ने आगे की पीढ़ियों को प्रेरित किया। राणा सांगा की परंपरा का प्रभाव ही आगे चलकर महाराणा प्रताप जैसे अमर योद्धाओं में दिखाई देता है। सांगा का जीवन भारतीय इतिहास की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ व्यक्तिगत वीरता, राजनीतिक दूरदर्शिता और सांस्कृतिक आत्मसम्मान तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

अंततः, राणा सांगा केवल मेवाड़ के शासक नहीं थे; वे उस युग के महान भारतीय सम्राटों में गिने जाते हैं। उनका व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि नेतृत्व, साहस और सत्यनिष्ठा किसी भी दौर में एक राष्ट्र और संस्कृति की पहचान होते हैं। उनका संघर्ष, उनकी विजयों और उनका बलिदान भारतीय इतिहास की उन अमर गाथाओं में शामिल है जिन्हें भूलना न केवल अन्याय होगा, बल्कि हमारी ऐतिहासिक चेतना के लिए भी हानिकारक होगा।

Samvad 24 Office
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