गलतफहमी नहीं, संगठनात्मक संकट की चेतावनी है कानपुर भाजपा की धड़ेबंदी
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर नगर निगम में भाजपा के भीतर उभरा टकराव केवल “गलतफहमी” भर नहीं है, बल्कि यह उस गहरी दरार का संकेत है जिसे लंबे समय से अनदेखा किया जा रहा था। पार्षदों और महापौर के बीच चल रही खींचतान अब व्यक्तिगत असहमति से आगे बढ़कर संगठनात्मक संकट का रूप ले चुकी है। परिवारवाद के आरोप, भ्रष्टाचार के संकेत, शक्ति प्रदर्शन और खुली गुटबाजी—ये सभी किसी मामूली मतभेद के लक्षण नहीं, बल्कि गंभीर
राजनीतिक असंतुलन के संकेत हैं – भाजपा के वरिष्ठ नेता भले ही इसे “जरा सी गलतफहमी” बताकर टालने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। नगर निगम सदन की बैठकें, निलंबन की कार्रवाइयाँ, ऑडियो-वीडियो और अब पोस्टर वार—ये सब दर्शाते हैं कि विवाद अब सार्वजनिक मंच पर आ चुका है। जब अपनी ही पार्टी के पार्षद महापौर के कामकाज और उनके पुत्र के हस्तक्षेप पर खुलकर सवाल उठाने लगें, तो यह मान लेना कठिन है कि मामला केवल संवाद की कमी तक सीमित है
टकराव की जड़ें गहरी हैं
यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ। लगभग डेढ़ साल से नगर निगम में असहजता की स्थिति बनी हुई थी। दिग्गज पार्षदों का सदन में आगे की पंक्ति से पीछे की सीटों तक सिमटना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश था। 26 दिसंबर 2025 की बैठक में सीवर लाइन और भूमि कब्जे का मुद्दा उस चिंगारी की तरह था जिसने भीतर सुलग रही आग को खुली लपटों में बदल दिया।
इसके बाद निलंबन की कार्रवाई और चुनिंदा वार्डों में ही विकास कार्य होने के आरोपों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। जब चार और भाजपा पार्षद निलंबित साथियों के समर्थन में सामने आए, तो यह साफ हो गया कि असंतोष अब व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक रूप ले चुका है।
नेतृत्व की चुप्पी और जिम्मेदारी
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पार्टी के कई जिम्मेदार नेता इस मुद्दे पर स्पष्ट बोलने से बचते नजर आए। किसी ने “गलतफहमी” कहा, किसी ने “जानकारी न होने” की बात कही। लेकिन राजनीति में चुप्पी भी एक बयान होती है। जब संगठन समय रहते हस्तक्षेप नहीं करता, तो विवाद अपने आप रास्ता बना लेता है—और वही यहाँ हुआ।
विडंबना यह है कि जिस भाजपा ने आंतरिक अनुशासन और संगठनात्मक मजबूती को अपनी पहचान बनाया, उसी पार्टी के नगर निगम में आज अनुशासनहीनता और असंतोष खुलकर दिखाई दे रहा है। एआई टूल्स द्वारा किए गए विश्लेषण भले ही तकनीकी हों, लेकिन उन्होंने भी उसी सच्चाई की ओर इशारा किया—भ्रष्टाचार के आरोप, सत्ता का केंद्रीकरण और गुटबाजी।
विकास पर असर और राजनीतिक जोखिम
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा नुकसान शहर के विकास को हो सकता है। जब जनप्रतिनिधि आपसी टकराव में उलझे हों, तो नीतिगत फैसले, योजनाओं का क्रियान्वयन और जनता की समस्याएँ हाशिये पर चली जाती हैं। विपक्ष के लिए यह स्थिति संजीवनी बन सकती है, खासकर ऐसे समय में जब 2027 का विधानसभा चुनाव दूर नहीं है।
भाजपा नेतृत्व बार-बार “मिशन-2027” की बात कर रहा है, लेकिन यदि नगर निगम जैसे बुनियादी स्तर पर एकजुटता नहीं दिखी, तो इसका संदेश जनता तक गलत जाएगा। मतदाता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी कामकाज और सामंजस्य से प्रभावित होता है।
समाधान क्या?
समाधान केवल बैठकों और बयानबाजी से नहीं निकलेगा। जरूरत है निष्पक्ष आंतरिक जांच, स्पष्ट जवाबदेही और पारदर्शी कार्यप्रणाली की। महापौर हों या पार्षद—सबको संगठनात्मक मर्यादा में रहकर काम करना होगा। यदि परिवारवाद या हस्तक्षेप के आरोप हैं, तो उनका स्पष्ट और सार्वजनिक समाधान जरूरी है।
कानपुर भाजपा में उभरी धड़ेबंदी को “गलतफहमी” कहकर नजरअंदाज करना समस्या को और गहरा करेगा। यह समय आत्ममंथन और निर्णायक हस्तक्षेप का है। यदि पार्टी नेतृत्व ने समय रहते संतुलन नहीं साधा, तो यह दरार आने वाले समय में बड़े राजनीतिक नुकसान में बदल सकती है। संगठन की मजबूती केवल नारों से नहीं, बल्कि आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही से बनती है—और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक है।






