संकष्ट चतुर्थी (सकट चौथ): संतान सुख, संकट निवारण और समृद्धि का महाव्रत
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री।
6 जनवरी 2026, मंगलवार माघ कृष्ण चतुर्थी
सनातन हिंदू परंपरा में संकष्ट चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित अत्यंत फलदायी व्रत माना गया है। वर्ष भर में आने वाली 12 संकष्टी चतुर्थियों में माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विशेष स्थान प्राप्त है, जिसे सकट चौथ, तिलकुटा चतुर्थी, माघी चौथ, लंबोदर संकष्टी जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की रक्षा, बाधा निवारण और पारिवारिक सुख–शांति के लिए किया जाता है।
संकष्ट चतुर्थी 2026 : तिथि और समय
सकट चौथ व्रत:
6 जनवरी 2026, मंगलवार
चतुर्थी तिथि आरंभ:
6 जनवरी 2026, प्रातः 08:02 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त:
7 जनवरी 2026, प्रातः 06:53 बजे (सूर्योदय से पूर्व)
चंद्रोदय एवं अर्घ्य का समय
चंद्रोदय: रात्रि 08:54 बजे
चंद्र दर्शन के पश्चात ही अर्घ्य अर्पित कर व्रत का पारण किया जाता है। इसी कारण इस व्रत में चंद्रमा पूजन का विशेष महत्व है।
संकष्ट चतुर्थी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत संकटों से मुक्ति दिलाने वाला है ।नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है।घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।वर्ष के आरंभ में पड़ने के कारण पूरे वर्ष के लिए शुभ फल प्रदान करता है।विशेष मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान संबंधी चिंताएँ शांत होती हैं और गणेश कृपा प्राप्त होती है।
सकट चौथ व्रत क्यों किया जाता है?
सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश और सकट माता को समर्पित होता है।माताएँ अपने पुत्रों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और मंगल कामना से यह व्रत करती हैं।पूरे दिन उपवास रखकर रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत पूर्ण किया जाता है। इस दिन गणपति को तिल से बने लड्डू (तिलकुट) का भोग अर्पित किया जाता है।चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही भोजन ग्रहण किया जाता है।
???? संकष्ट चतुर्थी की सरल पूजा विधि
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- व्रत का संकल्प लें
- लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश व सकट माता की स्थापना करें
- सिंदूर अर्पित करें और घी का दीपक जलाएँ
- पुष्प, फल, मिठाई और तिलकुट का भोग लगाएँ
- गणेश चालीसा या गणपति मंत्रों का पाठ करें
- आरती कर शंखनाद से पूजा पूर्ण करें
- चंद्रोदय के पश्चात अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
संकष्ट चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और विश्वास का पर्व है। जो भक्त गणपति के चरणों में समर्पण भाव से यह व्रत करते हैं, उनके जीवन से संकट दूर होते हैं और मंगल का आगमन होता है। जहाँ गणेश की कृपा होती है, वहाँ विघ्न टिक नहीं पाता ।






