बेटे को स्कूल में परेशान किया जा रहा है: गुमसुम हो गया है बच्चा, उसे बुलिंग का सामना करना और हिम्मत से जवाब देना कैसे सिखाएं
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संवाद 24 डेस्क। जब कोई बच्चा अचानक चुप-चुप रहने लगे, अकेले रहना पसंद करे, स्कूल जाने से कतराए या बात-बात पर डरने लगे, तो यह केवल “मूड” नहीं होता। कई बार इसके पीछे स्कूल में होने वाली बुलिंग छिपी होती है। बच्चों पर बुलिंग का असर गहरा होता है, आत्मविश्वास टूटता है, पढ़ाई प्रभावित होती है और भावनात्मक चोट लंबे समय तक रह सकती है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका सबसे निर्णायक हो जाती है।
पहचानें: क्या आपका बच्चा बुलिंग का शिकार है?
बुलिंग का शिकार बच्चा अक्सर अपने व्यवहार से संकेत देता है। वह स्कूल से लौटकर गुमसुम रहता है, दोस्तों से कटने लगता है, पेट-दर्द या सिर-दर्द का बहाना बनाता है, रात में डरावने सपने आते हैं या अचानक गुस्सा दिखाने लगता है। कई बच्चे शर्म या डर के कारण खुलकर बताते नहीं, इसलिए माता-पिता को इन संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए।
पहला कदम: बच्चे की बात बिना जजमेंट सुनें
सबसे पहले बच्चे को सुरक्षित महसूस कराइए। उससे शांति से पूछें, “आज स्कूल में कैसा लगा?” सीधे “तुम्हें कोई परेशान तो नहीं कर रहा?” कहने से वह और बंद हो सकता है। जब वह बताए, तो बीच में टोके बिना, डांटे बिना, समाधान थोपे बिना सुनें। उसे भरोसा दें कि गलती उसकी नहीं है और आप उसके साथ हैं।
भावनाओं को नाम दें, ताकत दें
बच्चे को यह समझना ज़रूरी है कि डर, गुस्सा या दुख महसूस करना गलत नहीं। कहिए “तुम्हें बुरा लगना स्वाभाविक है।” जब भावनाओं को मान्यता मिलती है, तो बच्चा भीतर से मजबूत होता है। उसे सिखाएं कि भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि समझदारी से संभालना ही हिम्मत है।
हिम्मत से जवाब देना: शब्दों की ताकत सिखाएं
बुली को हर बार शारीरिक प्रतिक्रिया की जरूरत नहीं होती। बच्चे को आत्मविश्वासी वाक्य सिखाएं, जैसे “मुझे यह पसंद नहीं, बंद करो”, “मुझसे इस तरह बात मत करो”, “मैं टीचर से बात करूंगा।” घर पर रोल-प्ले करें ताकि वह इन्हें अभ्यास में ला सके। मजबूत आवाज़, सीधी आंखों में नज़र और स्थिर बॉडी-लैंग्वेज, ये तीनों बहुत असरदार होते हैं।
सीमाएं तय करना और मदद माँगना भी हिम्मत है
बच्चे को बताएं कि मदद माँगना कमजोरी नहीं। यदि बुलिंग जारी रहे, तो टीचर, काउंसलर या स्कूल प्रशासन को बताना सही कदम है। यह “चुगली” नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी लेना है।
सोशल स्किल्स और आत्मविश्वास बढ़ाइए
खेल, मार्शल-आर्ट्स, थिएटर या टीम-एक्टिविटीज़ बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। दोस्ती के कौशल जैसे बातचीत शुरू करना, समूह में शामिल होना, ‘ना’ कहना इन पर घर में बातचीत करें। जब बच्चा अपने अंदर ताकत महसूस करता है, तो बुली का असर कम होता है।
डिजिटल बुलिंग पर खास ध्यान
आज बुलिंग केवल स्कूल तक सीमित नहीं। ऑनलाइन मैसेज, मीम्स या ग्रुप-चैट भी चोट पहुंचा सकते हैं। बच्चे को प्राइवेसी सेटिंग्स, ब्लॉक/रिपोर्ट करना और स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखना सिखाएं। जरूरत पड़े तो आप स्वयं हस्तक्षेप करें।
स्कूल के साथ साझेदारी बनाएं
टीचर से मुलाकात कर तथ्य साझा करें, समाधान-केंद्रित बात करें और फॉलो-अप तय करें। बच्चे को भरोसा दिलाएं कि वयस्क मिलकर उसकी सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं।
कब प्रोफेशनल मदद लें?
यदि बच्चा लगातार उदास रहे, आत्म-आलोचना बढ़े, नींद-भूख बिगड़े या स्कूल से डर बना रहे, तो चाइल्ड काउंसलर/साइकोलॉजिस्ट से मिलना समझदारी है। शुरुआती मदद लंबे नुकसान से बचाती है।
पैरेंटिंग का सबसे बड़ा मंत्र
आपका शांत समर्थन, धैर्य और स्पष्ट मार्गदर्शन बच्चे के लिए ढाल बनता है। उसे यह यकीन दिलाइए कि वह अकेला नहीं है, उसकी आवाज़ मायने रखती है और हिम्मत का मतलब सही समय पर सही कदम उठाना है।






