हार्मोनल इम्बैलेंस और स्ट्रेस का काल: जानें सिद्धासन की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली।

Share your love

संवाद 24 डेस्क। भारतीय ऋषियों और मुनियों ने हजारों वर्षों के अनुसंधान के बाद योग की जिस पद्धति को विकसित किया, उसमें ‘आसन’ केवल शरीर को मोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि चेतना को जगाने का एक माध्यम है। हठयोग के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित 84 लाख आसनों में से चार को मुख्य माना गया है, और उन चार में भी ‘सिद्धासन’ को निर्विवाद रूप से प्रथम स्थान प्राप्त है। ‘सिद्ध’ शब्द का अर्थ है, पूर्ण, सक्षम या वह जिसने आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लिया हो।

सिद्धासन का ऐतिहासिक और शास्त्रीय संदर्भ
प्राचीन ग्रंथ ‘हठयोग प्रदीपिका’ के प्रथम उपदेश के 38वें श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
“न स्थितिः सिद्धसदृशी न कुम्भकसमं बलम्। न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लयः॥”
अर्थात, सिद्धासन के समान कोई आसन नहीं है, कुंभक के समान कोई बल नहीं है, खेचरी के समान कोई मुद्रा नहीं है और नाद के समान कोई लय नहीं है।

‘घेरण्ड संहिता’ और ‘शिव संहिता’ में भी इस आसन की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। प्राचीन ऋषियों का मानना था कि यदि कोई साधक निरंतर 12 वर्षों तक सिद्धासन का अभ्यास करता है और साथ में मिताहार (संतुलित भोजन) का पालन करता है, तो उसे ‘योग सिद्धि’ प्राप्त हो जाती है। यह आसन मुख्य रूप से ‘नाड़ी शुद्धि’ (Nadi Purification) के लिए जाना जाता है।

सिद्धासन की सूक्ष्म कार्यप्रणाली: वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक शरीर विज्ञान (Anatomy) के नजरिए से देखें तो सिद्धासन शरीर की ऊर्जा प्रणालियों को एक विशेष सर्किट में बांध देता है। जब हम इस आसन में बैठते हैं, तो शरीर के निचले हिस्से की रक्त वाहिकाओं पर एक विशिष्ट दबाव पड़ता है।

  • पेल्विक फ्लोर सक्रियता: सिद्धासन में एड़ी का दबाव ‘पेरिनियम’ (Perineum) क्षेत्र पर होता है। यह क्षेत्र हमारे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) से गहराई से जुड़ा है। यह दबाव ‘मूलाधार चक्र’ को उद्दीपित करता है।
  • ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन: सामान्यतः मानवीय ऊर्जा का प्रवाह नीचे की ओर होता है। सिद्धासन इस ऊर्जा के प्रवाह को मोड़कर ऊपर की ओर (रीढ़ की हड्डी के माध्यम से मस्तिष्क की ओर) ले जाता है। इसे ‘Sublimation of Energy’ कहा जाता है।
  • हृदय और श्वसन दर: इस स्थिर मुद्रा में बैठने से हृदय की गति स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाती है और श्वसन की गहराई बढ़ जाती है, जिससे तनाव पैदा करने वाले हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ के स्तर में भारी गिरावट आती है।

सिद्धासन करने की मानक विधि (Step-by-Step Guide)
एक प्रोफेशनल लेख के रूप में, यह अनिवार्य है कि पाठक को तकनीक की बारीकियों का पता हो। सिद्धासन के अभ्यास के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
चरण 1: तैयारी
शांत और हवादार स्थान पर योगा मैट बिछाएं। जमीन पर दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं (दंडासन)। अपनी रीढ़ को सीधा रखें।
चरण 2: बाईं एड़ी का नियोजन
अपने बाएं पैर को घुटने से मोड़ें। बाएं पैर की एड़ी को ‘पेरिनियम’ (गुदा और जननेन्द्रिय के मध्य का स्थान) पर मजबूती से रखें। यह सुनिश्चित करें कि एड़ी का दबाव सटीक केंद्र पर हो।
चरण 3: दाईं एड़ी का स्थान
अब दाएं पैर को मोड़ें और दाईं एड़ी को सीधे जननेन्द्रिय के ऊपर या बाईं एड़ी के ठीक ऊपर रखें। दाएं पैर के पंजे और उंगलियों को बाईं जंघा और पिंडली के बीच के खाली स्थान (Space) में फंसा दें।
चरण 4: शारीरिक स्थिरता
जब पैर व्यवस्थित हो जाएं, तो अपने हाथों को घुटनों पर रखें। यहाँ आप ‘ज्ञान मुद्रा’ या ‘चिन्मय मुद्रा’ बना सकते हैं। अपनी रीढ़, गर्दन और सिर को एक सीधी रेखा में रखें।
चरण 5: दृष्टि और ध्यान
अपनी आंखें बंद करें। अपनी दृष्टि को ‘भ्रूमध्य’ (तीसरी आँख) पर केंद्रित करें या नासिका के अग्र भाग पर (नासाग्र दृष्टि)। अपनी श्वास को प्राकृतिक रूप से चलने दें।

सिद्धासन के बहुआयामी लाभ

  1. मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ (Psychological Benefits)
    आज के दौर में
    अवसाद (Depression) और चिंता (Anxiety) महामारी का रूप ले चुके हैं। सिद्धासन मस्तिष्क के ‘अल्फा वेव्स’ को सक्रिय करता है, जिससे गहरी शांति का अनुभव होता है। यह एकाग्रता (Concentration) बढ़ाने के लिए छात्रों और बौद्धिक कार्य करने वालों के लिए सर्वोत्तम है।
  2. प्रजनन और अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System)
    यह आसन विशेष रूप से पुरुषों और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। यह ‘ब्रह्मचर्य’ के पालन में सहायता करता है क्योंकि यह कामोत्तेजना को नियंत्रित कर उसे ओज और तेज में परिवर्तित करता है। यह प्रोस्टेट ग्रंथि के स्वास्थ्य और हार्मोनल संतुलन को बनाए रखने में सहायक है।
  3. नाड़ी तंत्र की शुद्धि (Nadi Purification)
    योग के अनुसार शरीर में 72,000 नाड़ियाँ हैं। सिद्धासन इन सभी नाड़ियों में प्राण के प्रवाह को सुगम बनाता है। यह मुख्य रूप से ‘ईड़ा’, ‘पिंगला’ और ‘सुषुम्ना’ नाड़ी के बीच संतुलन स्थापित करता है।
  4. पाचन और चयापचय (Metabolism)
    यद्यपि वज्रासन भोजन के बाद किया जाता है, लेकिन सिद्धासन का नियमित सुबह का अभ्यास जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। यह पेट के निचले हिस्से के अंगों को सक्रिय करता है, जिससे कब्ज और बवासीर जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।

सिद्धासन की सावधानियां और निषेध (Who should avoid it?)
किसी भी प्रोफेशनल अभ्यास में सुरक्षा सर्वोपरि है। सिद्धासन का अभ्यास निम्नलिखित स्थितियों में वर्जित है:

  • गंभीर घुटने का दर्द: यदि आपको ऑस्टियोआर्थराइटिस या घुटने की कोई पुरानी चोट है, तो इस आसन को न करें।
  • साइटिका (Sciatica): साइटिका के तीव्र दर्द में यह आसन तंत्रिकाओं पर दबाव बढ़ा सकता है।
  • हर्निया और हालिया सर्जरी: पेट या निचले अंगों की सर्जरी के कम से कम 6 महीने बाद तक इसे टालें।
  • संक्रमण: यदि गुदा क्षेत्र या जननेन्द्रिय में कोई संक्रमण या सूजन है, तो अभ्यास न करें।

सिद्धासन और आध्यात्मिक प्रगति: कुंडलिनी जागरण
योगियों का मानना है कि सिद्धासन ‘कुंडलिनी’ शक्ति को जगाने की पहली सीढ़ी है। जब मूलाधार पर दबाव पड़ता है और रीढ़ सीधी रहती है, तो ‘अपान वायु’ ऊपर की ओर उठकर ‘प्राण वायु’ से मिलती है। यह मिलन सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खोलता है। संवाद 24 के आध्यात्मिक पाठकों के लिए यह जानना रोचक होगा कि बुद्ध से लेकर कबीर तक, अधिकांश संतों ने अपनी साधना के लिए सिद्धासन के विभिन्न रूपों का चयन किया था।

अभ्यास के लिए महत्वपूर्ण सुझाव (Expert Tips for Samvad 24 Readers)

  • समय: इस आसन के लिए सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) है।
  • अवधि: शुरुआत 5 मिनट से करें। यदि पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन महसूस हो, तो तुरंत पैर खोलें और मालिश करें। जबरदस्ती न करें।
  • सहायता: यदि आपकी रीढ़ सीधी नहीं रहती, तो आप अपनी एड़ियों के नीचे या कूल्हों के पीछे एक पतला योग ब्लॉक या मुड़ा हुआ कंबल रख सकते हैं।
  • एकाग्रता: केवल बैठने से लाभ नहीं होगा। अपने मन को श्वास के साथ जोड़ना अनिवार्य है।

आधुनिक जीवन का सार ‘सिद्धासन’
अंततः हम कह सकते हैं कि सिद्धासन केवल एक शारीरिक मुद्रा नहीं है, बल्कि यह स्वयं को जानने की एक वैज्ञानिक विधि है। डिजिटल युग में जहाँ हमारा ध्यान बिखरा हुआ है, सिद्धासन हमें वापस अपने केंद्र पर लाता है। यह शरीर को स्थिरता, मन को स्पष्टता और आत्मा को शांति प्रदान करता है। ‘संवाद 24’ अपने पाठकों को यह सुझाव देता है कि वे इस ‘आसनों के सम्राट’ को अपने जीवन में स्थान दें। यदि आप इसे सही विधि और समर्पण के साथ करते हैं, तो यह न केवल आपके शारीरिक रोगों को दूर करेगा, बल्कि आपको एक उच्च चेतना के स्तर पर ले जाएगा। योग कोई धर्म नहीं, बल्कि जीने की कला है और सिद्धासन उस कला का सबसे सुंदर रंग है।

सिद्धासन बनाम अन्य ध्यानात्मक आसन: एक तुलना
संवाद 24 के पाठकों के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि योग विज्ञान में प्रत्येक आसन का अपना एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभाव होता है। अक्सर लोग सुखासन, पद्मासन और सिद्धासन को एक ही श्रेणी का मान लेते हैं, लेकिन गहराई से विश्लेषण करने पर इनके बीच मूलभूत अंतर स्पष्ट होते हैं।

​सुखासन: सादगी और प्रारंभिक विश्राम
​सुखासन, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘सुख’ पूर्वक बैठने की मुद्रा है। यह उन लोगों के लिए सबसे उपयुक्त है जो योग की शुरुआत कर रहे हैं या जिन्हें घुटनों और कूल्हों में लचीलेपन की कमी है। इस आसन का मुख्य उद्देश्य सामान्य विश्राम और रीढ़ को सीधा रखते हुए बैठने का अभ्यास करना है। वैज्ञानिक रूप से, इसमें ऊर्जा का स्तर अन्य ध्यानात्मक आसनों की तुलना में ‘निम्न’ रहता है क्योंकि इसमें शरीर के ऊर्जा द्वारों (Energy Locks) पर कोई विशेष दबाव नहीं पड़ता। इसे लंबे समय तक करने पर पीठ में थकान महसूस हो सकती है, इसलिए इसे केवल कम समय के ध्यान या प्रारंभिक अभ्यास के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।

​पद्मासन: स्थिरता और अनुशासन का प्रतीक
​पद्मासन या ‘कमल मुद्रा’ सुखासन से कहीं अधिक उन्नत है। इसे ‘कठिन’ श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि इसके लिए टखनों और घुटनों में अत्यधिक लचीलेपन की आवश्यकता होती है। पद्मासन का मुख्य उद्देश्य शरीर को पूरी तरह से ‘लॉक’ कर देना है, जिससे ध्यान के दौरान शरीर हिले-डुले नहीं। यह आसन ऊर्जा के स्तर को ‘उच्च’ बनाए रखता है क्योंकि यह निचले अंगों में रक्त के प्रवाह को कम करके उसे रीढ़ की ओर निर्देशित करता है। जो साधक शारीरिक रूप से सक्षम हैं, उनके लिए यह लंबी अवधि के ध्यान हेतु बहुत श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इसमें रीढ़ स्वतः ही सीधी रहती है।

​सिद्धासन: ऊर्जा का सर्वोच्च शिखर
​जब हम सिद्धासन की बात करते हैं, तो यह पद्मासन की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक सूक्ष्म और ऊर्जावान है। हालांकि इसे सीखने में ‘मध्यम से कठिन’ मेहनत लगती है, लेकिन इसके परिणाम ‘उच्चतम’ श्रेणी के होते हैं। सिद्धासन का मुख्य उद्देश्य केवल शारीरिक स्थिरता नहीं, बल्कि ‘ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन’ (Sublimation of Energy) है। इसमें एड़ी का दबाव विशिष्ट तंत्रिकाओं पर होता है जो सीधे मस्तिष्क और चेतना को प्रभावित करती हैं। इसे योगियों द्वारा ‘ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ’ आसन माना गया है क्योंकि यह मन को जितनी जल्दी स्थिर करता है, उतना कोई और आसन नहीं।

​संक्षेप में कहें तो, यदि आप केवल शांति से बैठना चाहते हैं तो सुखासन पर्याप्त है। यदि आप शरीर को अनुशासित और अडिग बनाना चाहते हैं तो पद्मासन का अभ्यास करें। किंतु, यदि आपका लक्ष्य मानसिक एकाग्रता की पराकाष्ठा और आध्यात्मिक सिद्धियों को प्राप्त करना है, तो सिद्धासन ही वह मार्ग है जिसे प्राचीन विज्ञान ‘सर्वोच्च’ मानता है। संवाद 24 के पाठकों को अपनी शारीरिक क्षमता और आध्यात्मिक लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही इन आसनों का चुनाव करना चाहिए।

अस्वीकरण: यह लेख शोध और शास्त्रीय ज्ञान पर आधारित है। व्यक्तिगत शारीरिक सीमाओं के कारण, किसी भी आसन का अभ्यास करने से पहले एक विशेषज्ञ योग गुरु से परामर्श लेना उचित है। संवाद 24 आपके सुरक्षित अभ्यास की कामना करता है।

Samvad 24 Office
Samvad 24 Office

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News