रामेश्वरम: महादेव और श्री राम के मिलन की पावन धरा, एक संपूर्ण मार्गदर्शिका
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संवाद 24 डेस्क। भारत के मानचित्र पर यदि आप सबसे दक्षिण की ओर दृष्टि डालेंगे, तो नीले समंदर के बीच एक शंख के आकार का द्वीप दिखाई देगा यही ‘रामेश्वरम’ है। तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित यह पावन नगरी न केवल ‘चार धामों’ में से एक है, बल्कि उत्तर के काशी (वाराणसी) का दक्षिण प्रतिरूप भी मानी जाती है। कहा जाता है कि एक हिंदू की तीर्थयात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक वह काशी के जल से रामेश्वरम में महादेव का अभिषेक न कर ले। ‘संवाद 24’ की इस विशेष रिपोर्ट में, हम आपको ले चलेंगे उस पावन भूमि पर जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने स्वयं अपने हाथों से शिवलिंग की स्थापना की थी।
रामेश्वरम का पौराणिक और ऐतिहासिक वैभव
रामेश्वरम का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण का वध करने के पश्चात जब भगवान श्री राम लंका से वापस लौटे, तो उन पर ‘ब्रह्म हत्या’ का दोष था (क्योंकि रावण एक ब्राह्मण था)। इस पाप के प्रायश्चित के लिए ऋषियों ने उन्हें शिव की आराधना करने का परामर्श दिया।
भगवान राम ने हनुमान जी को कैलाश से शिवलिंग लाने के लिए भेजा, परंतु मुहूर्त बीता जा रहा था। ऐसे में माता सीता ने समुद्र की रेत से एक शिवलिंग बनाया, जिसे ‘रामनाथ’ कहा गया। बाद में हनुमान जी द्वारा लाया गया लिंग (विश्वलिंगम) भी वहीं स्थापित किया गया। आज भी यहाँ पहले हनुमान जी द्वारा लाए गए लिंग की पूजा की जाती है, जो श्री राम की अपने भक्त के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
ऐतिहासिक रूप से, वर्तमान रामनाथस्वामी मंदिर का अधिकांश विस्तार 12वीं शताब्दी में श्रीलंका के राजा पराक्रमबाहु और बाद में विजयनगर साम्राज्य व रामनाड के सेतुपति राजाओं द्वारा किया गया। यहाँ की वास्तुकला द्रविड़ शैली का चरमोत्कर्ष है।
श्री रामनाथस्वामी मंदिर: स्थापत्य कला का अजूबा
रामेश्वरम का मुख्य आकर्षण ‘श्री रामनाथस्वामी मंदिर’ है। यह मंदिर अपनी भव्यता और विशालता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
विश्व का सबसे लंबा गलियारा (Corridor)
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका गलियारा है। मंदिर के तीसरे प्राकार (outer corridor) की लंबाई लगभग 1219 मीटर है। इसमें करीब 1212 नक्काशीदार स्तंभ हैं। जब आप इस गलियारे में खड़े होते हैं, तो स्तंभों की एक अनंत कतार दिखाई देती है, जो इंजीनियरिंग और कला का बेजोड़ संगम है। इन स्तंभों पर की गई बारीक नक्काशी द्रविड़ कला की सूक्ष्मता को दर्शाती है।

22 पवित्र कुंड (Teerthams)
मंदिर परिसर के भीतर 22 पवित्र कुंड हैं। मान्यता है कि इन कुंडों में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। प्रत्येक कुंड के जल का स्वाद और तापमान भिन्न होता है। श्रद्धालु सबसे पहले समुद्र (अग्नि तीर्थम) में स्नान करते हैं और फिर क्रमबद्ध तरीके से इन 22 कुंडों के जल से स्वयं को पवित्र करते हैं।
पांबन ब्रिज: इंजीनियरिंग का भारतीय चमत्कार
रामेश्वरम मुख्य भूमि से ‘पांबन चैनल’ द्वारा अलग है। यहाँ पहुँचने के लिए ‘पांबन ब्रिज’ को पार करना एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव है।
- रेलवे ब्रिज: 1914 में बना यह भारत का पहला समुद्री पुल था। इसका बीच का हिस्सा ‘कैंटिलीवर’ तकनीक से बना है, जो बड़े जहाजों के गुजरने के लिए ऊपर उठ जाता है। नीले समंदर के ऊपर से गुजरती ट्रेन और नीचे लहरों का शोर किसी रोमांचक फिल्म जैसा लगता है।
- सड़क मार्ग (अन्ना इन्दिर गांधी सेतु): रेलवे ब्रिज के समानांतर बना यह सड़क मार्ग पर्यटकों को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के मिलन का विहंगम दृश्य प्रदान करता है।
धनुषकोडी: भारत का ‘घोस्ट टाउन’ और राम सेतु का उद्गम
रामेश्वरम से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित ‘धनुषकोडी’ एक ऐसी जगह है जहाँ समय ठहर गया है। 1964 में आए एक भीषण चक्रवात ने इस हंसते-खेलते शहर को मलबे में तब्दील कर दिया था।
राम सेतु (Adam’s Bridge)
धनुषकोडी वह स्थान है जहाँ से ‘राम सेतु’ की श्रृंखला शुरू होती है। नासा के उपग्रह चित्रों में भी समुद्र के नीचे एक चूना पत्थर की संरचना दिखाई देती है, जिसे ‘नल-नील’ द्वारा निर्मित पुल माना जाता है। यहाँ पहुँचकर आप भारत और श्रीलंका के बीच के संकीर्ण समुद्री मार्ग को देख सकते हैं। यहाँ का ‘संगम’ (बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर का मिलन) देखने लायक है, एक तरफ शांत पानी और दूसरी तरफ उठती ऊँची लहरें।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम नेशनल मेमोरियल
रामेश्वरम केवल प्राचीन आस्था का ही नहीं, बल्कि आधुनिक प्रेरणा का भी केंद्र है। यह भारत के पूर्व राष्ट्रपति और ‘मिसाइल मैन’ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जन्मस्थली है।
यहाँ उनके सम्मान में एक भव्य स्मारक बनाया गया है। इस मेमोरियल में कलाम साहब के जीवन के संघर्षों, उनकी उपलब्धियों, उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं और रॉकेट मॉडलों का प्रदर्शन किया गया है। यह स्थान युवाओं और बच्चों के लिए राष्ट्रभक्ति और विज्ञान के प्रति जिज्ञासा जगाने वाला है।
अन्य दर्शनीय स्थल
- अग्नि तीर्थम: मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार के सामने स्थित यह समुद्र तट है। यहाँ भक्त सबसे पहले डुबकी लगाते हैं।
- गंधमादन पर्वतम्: यह रामेश्वरम का सबसे ऊँचा स्थान है। यहाँ एक दो मंजिला मंदिर है जहाँ भगवान राम के पदचिह्न (चरण पादुका) रखे हुए हैं। यहाँ से पूरे द्वीप का नज़ारा दिखता है।
- जटायु तीर्थम: कहा जाता है कि रावण से युद्ध करते समय घायल जटायु यहीं गिरे थे।
- लक्ष्मण तीर्थम: भगवान लक्ष्मण को समर्पित यह मंदिर अपनी नक्काशी और पवित्र सरोवर के लिए जाना जाता है।
सांस्कृतिक अनुभव और भोजन
रामेश्वरम में दक्षिण भारतीय संस्कृति की गहरी छाप है।
- भोजन: यहाँ आपको दक्षिण भारत के पारंपरिक व्यंजनों—जैसे इडली, डोसा, वड़ा और सांभर का असली स्वाद मिलेगा। लेकिन चूंकि यह एक तटीय क्षेत्र है, यहाँ शाकाहारी भोजन के साथ-साथ शहर के बाहरी हिस्सों में समुद्री भोजन (Seafood) भी प्रसिद्ध है। हालांकि, मुख्य मंदिर क्षेत्र के आसपास केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन ही मिलता है।
- त्योहार: महाशिवरात्रि और थिरुकल्याणम (भगवान शिव और देवी पर्वथवर्धिनी का विवाह) यहाँ बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं।
यात्रा की योजना: कैसे और कब जाएँ?
सबसे अच्छा समय
रामेश्वरम जाने के लिए अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे सुखद होता है। गर्मियों (अप्रैल से जून) में यहाँ काफी उमस और गर्मी होती है, जिससे घूमना थकाऊ हो सकता है।
कैसे पहुँचें?
- वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा मदुरै (Madurai) है, जो यहाँ से लगभग 175 किलोमीटर दूर है। मदुरै से आप बस या टैक्सी ले सकते हैं।
- रेल मार्ग: रामेश्वरम रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा है। पांबन ब्रिज से ट्रेन का सफर एक अनिवार्य अनुभव है।
- सड़क मार्ग: मदुरै, कन्याकुमारी और चेन्नई से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं।
यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
- दर्शन का समय: मंदिर सुबह 5:00 बजे खुलता है और दोपहर 1:00 बजे से 3:00 बजे तक बंद रहता है। रात को 9:00 बजे पट बंद हो जाते हैं। ‘मणि दर्शन’ (सुबह 5 से 6 बजे) का विशेष महत्व है।
- पहनावा: मंदिर के भीतर पुरुषों के लिए धोती या पजामा और महिलाओं के लिए साड़ी या सूट (दुपट्टे के साथ) अनिवार्य है। जींस या छोटे कपड़े पहनकर प्रवेश वर्जित हो सकता है।
- धनुषकोडी यात्रा: धनुषकोडी जाने के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा है। शाम 5 बजे के बाद वहाँ रुकने की अनुमति नहीं है क्योंकि वह क्षेत्र निर्जन है।
- गाइड से सावधान: मंदिर के आसपास कई लोग गाइड बनकर आते हैं, हमेशा प्रमाणित गाइड ही लें या खुद जानकारी जुटाकर चलें।
अंततः हम कह सकते हैं कि रामेश्वरम की यात्रा एक ऐसी अनुभूति है जो आपको आध्यात्मिकता के शिखर और प्रकृति की शांत गोद में एक साथ ले जाती है। यहाँ की लहरें आपको रामायण की गाथा सुनाती हैं, तो पांबन ब्रिज आधुनिक भारत के कौशल का परिचय देता है। चाहे आप एक श्रद्धालु हों या एक पर्यटक, रामेश्वरम आपकी आत्मा पर एक अमिट छाप छोड़ता है।






