सात मिट्टी के बर्तन और माँ लक्ष्मी की रसोई: आखिर क्यों कभी कम नहीं पड़ता जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद?”
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संवाद 24 डेस्क। भारत के पूर्वी तट पर ओडिशा राज्य में बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित ‘जगन्नाथ पुरी’ केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परंपरा का वह जीवंत प्राणतत्व है, जहाँ आस्था, संस्कृति और रहस्य एक साथ निवास करते हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख धामों में से एक, पुरी को ‘श्रीयंत्र’ और ‘नीलाचल धाम’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ के कण-कण में भगवान जगन्नाथ (ब्रह्मांड के स्वामी) की उपस्थिति महसूस की जाती है। यदि आप अपनी अगली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक यात्रा के लिए पुरी को चुन रहे हैं, तो यह विस्तृत लेख आपकी यात्रा को सार्थक बनाने के लिए एक मुकम्मल दस्तावेज सिद्ध होगा।
पुरी का ऐतिहासिक और पौराणिक परिप्रेक्ष्य
जगन्नाथ पुरी का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव सभ्यता की आध्यात्मिक चेतना। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ भगवान विष्णु ने अपने ‘नील माधव’ स्वरूप में निवास किया था, जिनकी पूजा कबीलाई प्रमुख ‘विशववसु’ गुप्त रूप से करते थे। बाद में राजा इंद्रद्युम्न ने यहाँ विशाल मंदिर का निर्माण कराया। वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा शुरू किया गया था और इसे अनंगभीम देव ने पूर्णता प्रदान की। पुरी को ‘पुरुषोत्तम क्षेत्र’ भी कहा जाता है। यह स्थान वैष्णव, शैव और शाक्त मतों के अद्भुत मिलन का केंद्र है। यहाँ भगवान जगन्नाथ को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि घर के बड़े बुजुर्ग और राजा के रूप में माना जाता है, जिनके इर्द-गिर्द पूरी नगरी का जीवन चक्र घूमता है।
श्री जगन्नाथ मंदिर: वास्तुकला और अकल्पनीय रहस्य
जगन्नाथ मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला (कलिंग शैली) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मुख्य मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है और चार द्वारों से घिरा हुआ है: सिंह द्वार (पूर्व), व्याघ्र द्वार (पश्चिम), हस्ति द्वार (उत्तर) और अश्व द्वार (दक्षिण)।
मंदिर के अनसुलझे रहस्य
वैज्ञानिक युग में भी जगन्नाथ मंदिर के कुछ तथ्य आज भी शोध का विषय बने हुए हैं:
- हवा के विपरीत ध्वजा: मंदिर के शिखर पर स्थित ध्वजा सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराती है।
- परछाई विहीन शिखर: मुख्य मंदिर के गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय जमीन पर नहीं पड़ती।
- नीलचक्र का चमत्कार: मंदिर के शीर्ष पर स्थित अष्टधातु का ‘नीलचक्र’ शहर के किसी भी कोने से देखने पर आपको अपनी ओर ही सम्मुख दिखाई देगा।
- समुद्र की ध्वनि: जैसे ही आप मंदिर के ‘सिंह द्वार’ के भीतर कदम रखते हैं, समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देना बंद हो जाती है।
- पक्षियों का वर्जना: इस मंदिर के शिखर के ऊपर से न तो कभी कोई पक्षी उड़ता है और न ही कोई विमान।
रथ यात्रा: विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन
पुरी की चर्चा ‘विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा’ के बिना अधूरी है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होने वाली यह यात्रा वह समय है जब जगत के स्वामी स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं। इस उत्सव में तीन विशाल रथ, नंदीघोष (जगन्नाथ जी), तालध्वज (बलभद्र जी) और देवदलन (सुभद्रा जी) का निर्माण किया जाता है। इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के धातु या कील का उपयोग नहीं होता। राजा द्वारा सोने की झाड़ू से रथों के मार्ग को बुहारने (छेरा पहरा) की रस्म सामाजिक समरसता का सर्वोच्च प्रतीक है। यह वह क्षण होता है जब जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें गिर जाती हैं और लाखों भक्त केवल एक डोरी खींचने के लिए उमड़ पड़ते हैं।
महाप्रसाद: दुनिया की सबसे बड़ी रसोई
जगन्नाथ मंदिर की रसोई को विश्व की सबसे बड़ी और पवित्र रसोई माना जाता है। यहाँ माता लक्ष्मी की देखरेख में ‘महाप्रसाद’ तैयार होता है।
- पकाने की विधि: यहाँ सात मिट्टी के बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं और लकड़ी की आग पर खाना पकाया जाता है। आश्चर्यजनक रूप से सबसे ऊपर वाले बर्तन का भोजन सबसे पहले पकता है।
- आनंद बाजार: मंदिर परिसर के भीतर ‘आनंद बाजार’ में हजारों लोग एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। यहाँ का भोजन कभी कम नहीं पड़ता, चाहे भक्तों की संख्या कितनी भी हो जाए। इसे ‘अभाड़ा’ भी कहा जाता है।
पुरी और उसके आसपास के प्रमुख दर्शनीय स्थल
पुरी की यात्रा का अर्थ केवल मुख्य मंदिर नहीं है, बल्कि इसके इर्द-गिर्द कई ऐसे स्थल हैं जो आपकी यात्रा को पूर्ण करते हैं:
पवित्र समुद्र तट (Golden Beach) पुरी का समुद्र तट अपनी सुनहरी रेत के लिए जाना जाता है। इसे ‘ब्लू फ्लैग’ प्रमाणन प्राप्त है, जो इसकी स्वच्छता और सुरक्षा की पुष्टि करता है। यहाँ सूर्योदय का दृश्य साक्षात् ईश्वर की कलाकृति प्रतीत होता है।
स्वर्गद्वार
यह पुरी का पवित्र श्मशान घाट और तीर्थ स्थल है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। तीर्थयात्री यहाँ पितरों के तर्पण के लिए आते हैं।
नरेन्द्र सरोवर
मंदिर से लगभग 2 किमी दूर स्थित इस सरोवर का ऐतिहासिक महत्व है। यहाँ वैशाख माह में ‘चंदन यात्रा’ का आयोजन होता है, जिसमें भगवान की नाव विहार लीला संपन्न होती है।
कोणार्क सूर्य मंदिर (The Black Pagoda)
पुरी से मात्र 35 किमी दूर स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ‘कोणार्क’ जाना अनिवार्य है। रथ के आकार में बना यह मंदिर भारतीय इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान का शिखर है। इसकी दीवारों पर उकेरी गई कामुक और सामाजिक जीवन की प्रतिमाएं मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
चिल्का झील (Chilika Lake)
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं, तो सतपाड़ा (चिल्का) जरूर जाएँ। यह एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। यहाँ आप ‘इरावदी डॉल्फिन’ देख सकते हैं और प्रवासी पक्षियों के कलरव का आनंद ले सकते हैं।
कला और संस्कृति: पट्टचित्र और ओडिसी
पुरी केवल धर्म की नगरी नहीं, बल्कि कला की जननी भी है।
- रघुराजपुर (Artistic Village): पुरी से 15 किमी दूर स्थित इस गाँव का हर घर एक कलाकार का घर है। यहाँ ‘पट्टचित्र’ (कपड़े पर की जाने वाली पारंपरिक चित्रकारी) की जीवंत परंपरा है।
- ओडिसी नृत्य: पुरी ओडिसी नृत्य का मुख्य केंद्र रहा है। यहाँ के गोटीपुआ नृत्य और जगन्नाथ संस्कृति पर आधारित प्रस्तुतियाँ आपकी आत्मा को तृप्त कर देंगी।
यात्रा प्रबंधन: कैसे और कब जाएँ?
सर्वश्रेष्ठ समय
पुरी भ्रमण के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय मौसम के लिहाज से सबसे उत्तम है। हालांकि, रथ यात्रा (जून-जुलाई) के दौरान यहाँ का अनुभव अद्वितीय होता है, लेकिन उस समय अत्यधिक भीड़ और उमस के लिए तैयार रहना चाहिए।
कैसे पहुँचें?
- वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर (Biju Patnaik Airport) है, जो पुरी से 60 किमी दूर है। यहाँ से टैक्सी या बस द्वारा 1.5 घंटे में पुरी पहुँचा जा सकता है।
- रेल मार्ग: पुरी रेलवे स्टेशन भारत के सभी बड़े शहरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई) से सीधे जुड़ा हुआ है।
- सड़क मार्ग: भुवनेश्वर से पुरी के बीच का ‘पुरी-कोणार्क मरीन ड्राइव’ सड़क मार्ग भारत के सबसे सुंदर रास्तों में से एक है।
ठहरने और खान-पान की व्यवस्था
पुरी में हर बजट के यात्रियों के लिए विकल्प उपलब्ध हैं:
- आवास: यहाँ पुराने ‘मठ’ और ‘धर्मशालाएं’ बहुत कम मूल्य पर उपलब्ध हैं। वहीं, समुद्र के किनारे लक्जरी रिसॉर्ट्स और होटल भी प्रचुर मात्रा में हैं।
- भोजन: ‘दालमा’ (ओडिशा का पारंपरिक व्यंजन), ‘चुंगुड़ी मलाई’ (प्रॉन करी) और मीठे में ‘छेना पोड़ा’ और ‘खाजा’ का स्वाद चखना न भूलें। मंदिर का खाजा तो प्रसाद के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
यात्रियों के लिए विशेष निर्देश और सुझाव
- मंदिर के नियम: जगन्नाथ मंदिर के भीतर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। इसके अलावा, मोबाइल, कैमरा, चमड़े का बेल्ट और जूते-चप्पल मंदिर के बाहर बने स्टैंड पर ही जमा करने होते हैं।
- पंडों से संवाद: मंदिर में दर्शन के लिए स्थानीय पुजारियों (पंडों) की सहायता ली जा सकती है, लेकिन दान-दक्षिणा पहले से तय कर लेना उचित रहता है।
- समुद्र में सावधानी: पुरी का समुद्र काफी गहरा और लहरें तेज होती हैं, इसलिए गहरे पानी में जाने से बचें और ‘नोलिया’ (स्थानीय लाइफगार्ड्स) के निर्देशों का पालन करें।
- स्वच्छता: पुरी एक पवित्र नगरी है, अतः समुद्र तट और मंदिर परिसर में प्लास्टिक का उपयोग न करें।
अंततः हम कह सकते हैं कि जगन्नाथ पुरी की यात्रा केवल एक भौगोलिक भ्रमण नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर उतरने और उस असीम सत्ता को महसूस करने का अवसर है। यहाँ की ‘मृदंग’ की थाप, ‘शंख’ की ध्वनि और ‘जय जगन्नाथ’ का जयघोष आपके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार करता है। संवाद 24 के पाठकों के लिए सलाह है कि जीवन की भागदौड़ में एक विराम लें और नीलाचल की इस पावन धरा पर आकर भगवान जगन्नाथ की कृपा का अनुभव करें। यह नगरी आपको सिखाती है कि अंततः सब कुछ उसी ‘महाप्रभु’ में विलीन हो जाना है।






