क्या हिन्दू समाज का जागरण ही विश्वगुरु बनने की कुंजी है? कैसे जागेगी वह चेतना जो भारत को फिर से गौरव दिलाएगी?

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संवाद 24 जौनपुर। तिलकधारी महाविद्यालय जौनपुर के प्रांगण में आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन ने एक बार पुनः उस विचारधारा को केंद्र में ला दिया है, जिसने आज़ादी के पूर्व से लेकर आधुनिक भारत तक सांस्कृतिक चेतना को जगाने का काम किया है। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हिन्दू समाज का जागरण एवं संगठन ही संघ का उद्देश्य है।” यह केवल एक घोषणापत्र नहीं, बल्कि वह भाव-बोध है जिसे संघ ने पिछले सौ वर्षों में व्यवहारिक रूप से स्थापित करने का प्रयास किया है।

वसुधैव कुटुम्बकम” संस्कृति का मूल स्वर
सम्मेलन में प्रदीप जोशी जी ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्व धर्म समभाव” पर आधारित है। यह केवल दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि वह जीवन-दर्शन है, जो व्यक्तिमंगल को विश्वमंगल से जोड़ता है। दुनिया के अनेक देशों में जहां धार्मिक वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा दिखती है, वहीं भारत की संस्कृति सबको साथ लेकर चलने की बात करती है। यह दृष्टि केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और वैश्विक नेतृत्व की आधारशिला है।

1925 से 2025 – शताब्दी वर्ष की सतत यात्रा
कार्यक्रम में यह तथ्य प्रमुखता से रखा गया कि संघ ने वर्ष 1925 में हिन्दू समाज के जागरण का कार्य आरंभ किया था और आज 2025 में यह यात्रा अपने सौ वर्षों के पड़ाव पर खड़ी है। शताब्दी वर्ष में राष्ट्रव्यापी जागरण अभियान और हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन इसी क्रम का हिस्सा है। वक्ताओं ने बताया कि पिछले सौ वर्षों में संघ केवल संगठन नहीं बना, बल्कि एक विचार, एक चरित्र और एक अनुशासन की संस्कृति का निर्माण किया। यही कारण है कि आज समाज में राष्ट्र, धर्म और संस्कृति पर सकारात्मक विमर्श प्रारंभ हो रहा है।

संगठन और अनुशासन” – विश्वगुरु भारत की अनिवार्य शर्त
मुख्य वक्ता के अनुसार, जब हिन्दू समाज संगठित, संयमित और अनुशासित होगा, तभी भारत विश्वगुरु बनेगा। आज वैश्विक परिदृश्य में भारत जिस भूमिका की ओर अग्रसर है, उसके लिए समाज में एकता, सद्भाव और कर्तव्यबोध का होना आवश्यक है। व्यक्तित्व निर्माण से लेकर समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण तक संघ का मॉडल ‘नीचले स्तर से शीर्ष तक’ परिवर्तन की रेखा पर आधारित है। वक्ता ने बल देते हुए कहा कि “एक संगठित समाज ही राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जा सकता है।”

शताब्दी वर्ष के पाँच आयाम – सामाजिक परिवर्तन की दिशा
कार्यक्रम के दौरान संघ द्वारा शताब्दी वर्ष में संचालित पाँच प्रमुख आयामों पर विस्तृत चर्चा हुई—
सामाजिक समरसता
जाति, पंथ, वर्ग विभाजन से ऊपर उठकर एकता
पर्यावरण संरक्षण
प्रकृति आधारित जीवन-दृष्टि और संवेदनशीलता
कुटुम्ब प्रबोधन
परिवार, संस्कार और मूल्यपरक जीवन की पुनर्स्थापना
स्वदेशी भाव का जागरण
आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादों का सम्मान
नागरिक कर्तव्यों का बोध
राष्ट्रहित में जिम्मेदार नागरिक चेतना
इन पाँच क्षेत्रों को सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मूल आधार बताया गया। वक्ता के अनुसार यह मॉडल केवल हिन्दू समाज का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के उत्थान का सूत्र है।

युवा वर्ग और नए विमर्श की चुनौती
सम्मेलन में यह भी स्पष्ट किया गया कि आज का संघर्ष केवल जमीन का नहीं, विचारों का है। आज पश्चिमी सभ्यता के अति-प्रभाव, उपभोक्तावादी सोच और पहचान संकट ने भारतीय युवाओं के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। प्रदीप जोशी जी ने कहा कि “युवा को पश्चिम के झूठे और छद्म विचारों को चुनौती देनी होगी।” इसके लिए सकारात्मक विमर्श, तार्किक प्रतिवाद और आत्मविश्वासी दृष्टिकोण जरूरी है। संघ की दृष्टि में युवा केवल परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि परिवर्तन का नेतृत्व भी है।

सनातन ही जोड़ता है संसार – गायत्री परिवार का दृष्टिकोण
सम्मेलन के मुख्य अतिथि गायत्री परिवार के आचार्य राम सिंह जी ने कहा कि सनातन धर्म की विशिष्टता इस बात में है कि यह किसी को बांधता नहीं, बल्कि जोड़ता है। उन्होंने रेखांकित किया कि विश्व को जोड़ने का मंत्र, सह-अस्तित्व का सिद्धांत और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन केवल सनातन संस्कृति में संभव है। उनके अनुसार, वैश्विक संकटों का समाधान किसी “वाद” में नहीं, बल्कि “सनातन” के शाश्वत मूल्यों में छिपा है।

कुटुम्ब प्रबोधन – आधुनिक युग की अनिवार्यता
विशिष्ट अतिथि प्रो. शिखा श्रीवास्तव जी ने कहा कि आज वैश्वीकरण, सोशल मीडिया और व्यक्तिवादी सोच ने परिवार और कुटुंब व्यवस्था को सबसे अधिक प्रभावित किया है। ऐसे समय में परिवारिक मूल्यों, परम्पराओं और संस्कारों का संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ की सौ वर्षों की साधना और संतों की प्रेरणा के परिणामस्वरूप आज समाज में सांस्कृतिक जागरण तीव्र हुआ है। “आज लोग आत्मविश्वास से ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ बोलने लगे हैं।”

समरसता पर बल – जातीय विभाजन से ऊपर उठने की दिशा
विशिष्ट अतिथि फूलचंद सोनकर जी ने कहा कि “जब हिन्दू समाज जाति-पाति और ऊँच-नीच के भेदभाव से ऊपर उठ जाएगा, तभी एक मजबूत भारत का निर्माण संभव है।” यह कथन केवल सामाजिक अपील नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की अनिवार्य शर्त है। भारत की संरचना विविधता पर आधारित है, लेकिन यह विविधता विभाजन का कारण नहीं, बल्कि पूरक सद्भाव का आधार बन, यही लक्ष्य है।

सम्मेलन का संचालन और भावनात्मक समापन
कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत एवं धन्यवाद डॉ. उत्तम गुप्ता जी ने किया तथा सम्मेलन का संचालन डॉ. उदय जी द्वारा संयमित और प्रभावी ढंग से किया गया। वातावरण में एक सांस्कृतिक और राष्ट्रभावना का समन्वित स्वर उपस्थित था, जिसने सभा को केवल भाषण का मंच नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकल्प का स्वरूप दिया।

क्या यह जागरण आने वाले भारत का मार्ग निर्धारित करेगा?
इस विराट हिन्दू सम्मेलन का संदेश स्पष्ट और प्रखर है –
संगठन में शक्ति है
संस्कार में स्थिरता है
संस्कृति में मार्गदर्शन है
2025 में संघ का यह शताब्दी वर्ष केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का अवसर है। यदि समाज समरसता, अनुशासन, कर्तव्यबोध और स्वदेशी सोच को अपनाता है, तो न केवल हिन्दू समाज का जागरण होगा, बल्कि भारत का विश्वगुरु बनने का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

Samvad 24 Office
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