कानपुर रजिस्ट्री कार्यालय में आयकर सर्वे: स्टांप शुल्क डेटा में करोड़ों का अंतर, बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर?
Share your love

संवाद 24 संवाददाता। कानपुर के सिविल लाइंस स्थित रजिस्ट्री कार्यालय (जोन वन) में हाल ही में आयकर विभाग की टीम ने अचानक सर्वे ऑपरेशन चलाया। यह कार्रवाई स्टांप एवं निबंधन विभाग द्वारा आयकर विभाग को भेजे गए डेटा और वास्तविक रजिस्ट्री रिकॉर्ड में भारी विसंगति सामने आने के बाद की गई। सूत्रों के अनुसार, स्टांप शुल्क से जुड़े आंकड़ों में करोड़ों रुपये का अंतर पाया गया है, जो सरकारी राजस्व को बड़ा नुकसान पहुंचाने वाला हो सकता है।
सर्वे की वजह और प्रक्रिया
आयकर विभाग की क्राइम इन्वेस्टिगेशन विंग की टीम ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में कार्यालय पहुंचकर दस्तावेजों की गहन जांच की। यह सर्वे विशेष रूप से हाल की रजिस्ट्रियों से जुड़े स्टांप शुल्क के डेटा पर केंद्रित था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विभाग को भेजा गया डेटा वास्तविक अभिलेखों से मेल नहीं खा रहा था। यह अंतर किसी एक दिन या कुछ रजिस्ट्रियों का नहीं, बल्कि कुल स्टांप शुल्क संग्रह में बड़ा गैप दिखाता है।
हालांकि कुछ शुरुआती खबरों में 2500 करोड़ की संपत्ति रजिस्ट्री में गड़बड़ी और इससे 500 करोड़ के टैक्स नुकसान की बात कही गई, लेकिन विश्वसनीय स्रोतों (जैसे अमर उजाला) से मिली जानकारी में यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से “करोड़ों” तक सीमित है। जांच अभी प्रारंभिक चरण में है, और अफसरों को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए समय दिया गया है। फर्जीवाड़े की गहराई का पता आगे की जांच से चलेगा।
संभावित फर्जीवाड़े के तरीके
रजिस्ट्री प्रक्रिया में स्टांप शुल्क राज्य सरकार का प्रमुख राजस्व स्रोत है। यदि डेटा में हेराफेरी की जाती है, तो यह न केवल स्टांप ड्यूटी में कमी दिखाता है, बल्कि आयकर विभाग को भी गलत जानकारी मिलती है। संभावित तरीके हो सकते हैं:
संपत्तियों को कम मूल्य पर दिखाना।
कृषि भूमि का लाभ देकर कम स्टांप ड्यूटी लगवाना।
पैन कार्ड या अन्य विवरणों में मनमानी।
ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं, जहां रजिस्ट्री में फर्जी पैन या गलत मोबाइल नंबर लिखकर टैक्स चोरी की कोशिश की गई।
व्यापक प्रभाव और सबक
यह घटना एक बार फिर सरकारी विभागों में डिजिटलाइजेशन और डेटा सत्यापन की जरूरत को रेखांकित करती है। स्टांप एवं निबंधन विभाग का IGRS (Integrated Grievance Redressal System) पोर्टल पहले से ही ऑनलाइन रजिस्ट्री को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन डेटा की सटीकता सुनिश्चित करना चुनौती बनी हुई है। यदि बड़ा फर्जीवाड़ा साबित होता है, तो इससे न केवल सरकारी खजाने को नुकसान होता है, बल्कि आम नागरिकों का भरोसा भी प्रभावित होता है।






