क्या भजन केवल शब्द हैं? या चेतना की एक अवस्था! जहाँ क्रिया विलीन हो जाती है। अर्थात जहाँ ध्यान है, क्या वहीं भक्ति है।
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में भजन शब्द को सामान्यतः ईश्वर के नाम-स्मरण, कीर्तन या मंत्र-जप से जोड़कर देखा जाता है। आम धारणा यह है कि जो व्यक्ति माला लेकर मंत्र बोल रहा है या किसी देवता के सामने बैठकर जप कर रहा है, वही भजन कर रहा है। किंतु भारतीय दर्शन की गहराई में उतरने पर यह स्पष्ट होता है कि भजन किसी विशिष्ट क्रिया, शब्द या विधि तक सीमित नहीं है, बल्कि वह चेतना की अवस्था है। यह अवस्था वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ मन पूरी तरह वर्तमान में स्थिर हो जाता है और व्यक्ति अपने “मैं” से ऊपर उठकर जागरूकता में प्रवेश करता है।
भारतीय परंपरा में भक्ति, ध्यान और ज्ञान इन तीनों को अलग अलग मार्ग बताया गया है, लेकिन इनका अंतिम लक्ष्य एक ही है: चित्त की पूर्ण एकाग्रता और अहंकार का क्षय। इसी बिंदु पर यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या केवल मंत्रोच्चार ही भजन है, या फिर कोई भी क्रिया, यदि पूर्ण जागरूकता से की जाए, भजन बन सकती है?
चेतना का केंद्र: भारतीय दर्शन क्या कहता है
भारतीय दर्शन में मनुष्य के बाहरी आचरण से अधिक महत्व उसकी आंतरिक अवस्था को दिया गया है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि योग वह है जिसमें मन स्थिर हो जाए “योगः कर्मसु कौशलम्”। यहाँ कौशल का अर्थ केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि पूर्ण तन्मयता है। अर्थात जो कर्म पूरे होश, सजगता और एकाग्रता से किया जाए, वही योग है। इसी प्रकार योगसूत्र में ध्यान की परिभाषा दी गई है “तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्”। अर्थात जहाँ चित्त एक ही बिंदु पर निरंतर ठहर जाए, वही ध्यान है। ध्यान की इस परिभाषा में मंत्र, मूर्ति या विधि का कोई अनिवार्य उल्लेख नहीं है। केंद्र में केवल एकाग्र चेतना है।
ॐ जप: साधना या आदत?
ॐ को भारतीय संस्कृति में ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। उपनिषदों में इसे नाद-ब्रह्म कहा गया है, वह ध्वनि जिससे सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई। किंतु प्रश्न यह है कि क्या हर ॐ जप स्वतः भजन बन जाता है?
यदि कोई व्यक्ति ॐ का जप करते समय भीतर ही भीतर सांसारिक विचारों में उलझा हो, शब्द केवल आदत या संख्या पूरी करने के लिए दोहरा रहा हो, मन भूत या भविष्य में भटक रहा हो
तो ऐसा जप, भारतीय दर्शन की दृष्टि से, यांत्रिक क्रिया है, भजन नहीं। यह वही स्थिति है जिसे ग्रंथों में अविचारित जप कहा गया है।
इसके विपरीत, जब ॐ जप के साथ श्वास का पूरा बोध जुड़ता है
मन वर्तमान क्षण में स्थिर हो जाता है, जप करने वाला स्वयं जप का साक्षी बन जाता है, तो वही जप ध्यान, भजन और योग तीनों बन जाता है। यहाँ शब्द गौण हो जाता है और चेतना प्रधान।
संतुलन की साधना: क्या यह भी भजन हो सकता है?
अब उस उदाहरण पर विचार करें जिसमें एक व्यक्ति अपने सिर पर सेब रखकर धीरे-धीरे चलता है और उसका पूरा ध्यान केवल इस बात पर है कि सेब गिरे नहीं। देखने में यह क्रिया न तो धार्मिक लगती है, न ही आध्यात्मिक। इसमें कोई मंत्र नहीं, कोई मूर्ति नहीं, कोई परंपरागत विधि नहीं। फिर भी यदि इस क्रिया के दौरान मन पूरी तरह वर्तमान क्षण में हो, शरीर और चेतना में कोई विभाजन न रहे, विचारों का प्रवाह रुक जाए, केवल सजगता शेष रह जाए, तो भारतीय दर्शन के अनुसार यह शुद्ध ध्यान की अवस्था है। और जहाँ ध्यान है, वहीं भजन है। क्योंकि भजन का मूल तत्व ईश्वर नहीं, बल्कि अहंकार का लोप और जागरूकता की उपस्थिति है।
इसका एक अत्यंत प्रसिद्ध उदाहरण महाभारत में मिलता है, अर्जुन का लक्ष्यभेद। जब गुरु द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों से पूछा कि उन्हें पेड़ पर क्या दिखाई दे रहा है, तो किसी ने पत्ते बताए, किसी ने डालियाँ, किसी ने पूरा वृक्ष। अर्जुन ने कहा “मुझे केवल मछली की आँख दिखाई दे रही है।”
यह कोई धार्मिक क्रिया नहीं थी, कोई मंत्र-जप नहीं था, लेकिन अर्जुन की चेतना इतनी एकाग्र थी कि उसका मन केवल एक बिंदु पर स्थिर हो गया था। यही अवस्था भारतीय दर्शन में ध्यान कही जाती है। यदि यही एकाग्रता ईश्वर-स्मरण के साथ जुड़ जाए, तो वह भक्ति बन जाती है। अर्थात अंतर क्रिया का नहीं, चित्त की स्थिति का है।
भक्ति और ध्यान का संगम
भारतीय परंपरा में भक्ति और ध्यान को अलग नहीं किया गया। रामकृष्ण परमहंस, कबीर, मीरा, तुलसी सभी के जीवन में भक्ति का अर्थ केवल भावुकता नहीं था, बल्कि पूर्ण तल्लीनता था। कबीर स्पष्ट कहते हैं “माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।” अर्थात यदि मन नहीं बदला, तो बाहरी जप का कोई अर्थ नहीं। यह कथन सीधे-सीधे इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भजन का संबंध क्रिया से नहीं, चेतना से है।
आधुनिक संदर्भ में इस विचार की प्रासंगिकता
आज के समय में जब ध्यान और माइंडफुलनेस को वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्वीकार किया जा रहा है, भारतीय दर्शन का यह सिद्धांत और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि जब व्यक्ति किसी क्रिया को पूरी जागरूकता के साथ करता है, तो उसका मानसिक तनाव घटता है, निर्णय क्षमता बढ़ती है और चित्त स्थिर होता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो—
किसान का खेत जोतते समय पूरी तन्मयता में होना
कलाकार का चित्र बनाते समय स्वयं को भूल जाना
संगीतकार का सुर में डूब जाना
ये सभी अवस्थाएँ, यदि अहंकार से मुक्त हों, भजन की ही अवस्थाएँ हैं।
भजन की एकमात्र शर्त
भारतीय संस्कृति का मूल संदेश अत्यंत स्पष्ट है। भजन कोई विशेष क्रिया नहीं, कोई निश्चित शब्द नहीं, कोई अनिवार्य विधि नहीं। भजन की केवल एक शर्त है पूर्ण उपस्थित चेतना।
यदि ॐ जप करते समय मन भटक रहा है, तो वह भजन नहीं। यदि संतुलन साधते समय चेतना पूर्ण जागरूक है, तो वह भजन ही नहीं, ध्यान की उच्च अवस्था है। जहाँ “मैं” विलीन हो जाता है, जहाँ केवल सजगता शेष रह जाती है, वहीं ईश्वर है, वहीं भक्ति है, वहीं भजन है।
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