सर्दियों की सुस्ती: सिर्फ ठंड नहीं, शरीर की इंटरनल क्लॉक का खेल, जानिए इसके पीछे छुपा बायोलॉजिकल सच
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संवाद 24 डेस्क। सर्दियों के मौसम में अगर आपको दिन भर नींद-सी, काम में मन न लगना, शरीर में भारीपन या बार-बार थकान महसूस होती है, तो इसे केवल “ठंड का असर” कहकर नज़रअंदाज़ करना सही नहीं है। यह स्थिति दरअसल हमारे शरीर की एक स्वाभाविक बायोलॉजिकल प्रतिक्रिया होती है, जो ठंडे तापमान, कम धूप और हार्मोनल असंतुलन से जुड़ी होती है। पब्लिक हेल्थ से जुड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है कि सर्दियों में शरीर की आंतरिक घड़ी और ऊर्जा संतुलन प्रभावित होता है, जिससे सुस्ती बढ़ना एक सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेत बन जाता है।
कम धूप और शरीर की इंटरनल क्लॉक का संबंध
पब्लिक हेल्थ जर्नल BioMed Central (BMC) में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, सर्दियों में सूरज की रोशनी कम मिलने से शरीर की सर्कैडियन रिदम यानी वह जैविक घड़ी जो हमारे सोने-जागने, भूख और हार्मोन रिलीज़ को नियंत्रित करती है, डिस्टर्ब हो जाती है। जब सुबह की प्राकृतिक रोशनी पर्याप्त नहीं मिलती, तो दिमाग को दिन और रात के बीच फर्क समझने में परेशानी होती है। इसका सीधा असर हमारी एनर्जी, एकाग्रता और अलर्टनेस पर पड़ता है।
मेलाटोनिन बढ़ने से क्यों आती है नींद और सुस्ती
सूरज की रोशनी कम होने का एक और बड़ा असर मेलाटोनिन हार्मोन पर पड़ता है। यह हार्मोन शरीर को नींद के लिए तैयार करता है। सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी होने से मेलाटोनिन का स्तर सामान्य से अधिक समय तक ऊँचा बना रहता है। नतीजा यह होता है कि दिन के समय भी दिमाग “स्लीप मोड” में रहने लगता है। इसी कारण लोग पर्याप्त नींद लेने के बावजूद खुद को थका हुआ और अनमोटिवेटेड महसूस करते हैं।
ठंडा मौसम और एनर्जी कंज़र्वेशन मोड
ठंड के मौसम में शरीर का एक स्वाभाविक उद्देश्य होता है, गर्मी को बचाए रखना। इसके लिए शरीर अधिक ऊर्जा आंतरिक तापमान बनाए रखने में खर्च करता है। जब ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इस प्रक्रिया में चला जाता है, तो बाकी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों के लिए कम एनर्जी बचती है। यही वजह है कि सर्दियों में बिना ज्यादा काम किए भी थकान जल्दी महसूस होती है।
फिजिकल एक्टिविटी में कमी भी एक बड़ा कारण
सर्दियों में लोग स्वाभाविक रूप से घर के अंदर ज्यादा समय बिताने लगते हैं। सुबह जल्दी टहलने या एक्सरसाइज़ करने की आदत छूट जाती है। धूप में निकलने का समय कम हो जाता है। यह फिजिकल इनएक्टिविटी मेटाबॉलिज़्म को धीमा कर देती है, जिससे शरीर सुस्त पड़ने लगता है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहे तो यह वजन बढ़ने, मसल स्टिफनेस और मानसिक थकान का कारण भी बन सकती है।
एक्सपर्ट की राय: शरीर क्यों भेजता है थकान का संकेत
इस विषय पर एक्सपर्ट बताते हैं कि सर्दियों में सुस्ती के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। ठंडी हवा, दिन की कम रोशनी, हार्मोनल बदलाव, शारीरिक गतिविधि में गिरावट और शरीर की बढ़ी हुई ऊर्जा आवश्यकता ये सभी मिलकर थकान और आलस का अनुभव कराते हैं। यह शरीर का एक तरह का संकेत होता है कि उसे अपनी दिनचर्या और देखभाल में बदलाव की ज़रूरत है।
क्या यह स्थिति हर किसी के लिए समान होती है?
हालांकि सर्दियों की सुस्ती आम है, लेकिन इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। बुज़ुर्गों, पहले से किसी क्रॉनिक बीमारी से जूझ रहे लोगों, और अनियमित लाइफस्टाइल वालों में यह समस्या अधिक स्पष्ट रूप से दिखती है। वहीं जो लोग संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और धूप के संपर्क में रहते हैं, उनमें इसके लक्षण अपेक्षाकृत हल्के रहते हैं।
विंटर लेजीनेस को मैनेज कैसे करें?
इस समस्या से निपटने के लिए बड़े बदलाव करने की ज़रूरत नहीं होती। कुछ छोटे लेकिन नियमित कदम काफी प्रभावी साबित हो सकते हैं। सुबह के समय पर्दे खोलकर प्राकृतिक रोशनी को घर में आने दें। अगर संभव हो तो रोज़ाना कम से कम 20–30 मिनट धूप में बैठें। हल्की एक्सरसाइज़, योग या स्ट्रेचिंग को दिनचर्या में शामिल करें, ताकि शरीर का ब्लड सर्कुलेशन और मेटाबॉलिज़्म सक्रिय रहे।
डाइट और हाइड्रेशन की भूमिका
सर्दियों में प्यास कम लगती है, लेकिन शरीर को पानी की उतनी ही ज़रूरत होती है। डिहाइड्रेशन भी थकान को बढ़ाता है। इसके अलावा, बहुत भारी और ज्यादा कैलोरी वाला भोजन सुस्ती को और बढ़ा सकता है। प्रोटीन, फाइबर और मौसमी सब्ज़ियों से भरपूर संतुलित आहार शरीर को स्थिर ऊर्जा देता है, जिससे आलस कम होता है।
नींद का संतुलन बनाए रखना क्यों ज़रूरी है
ठंड में देर तक सोने का मन करता है, लेकिन अनियमित स्लीप पैटर्न सर्कैडियन रिदम को और बिगाड़ देता है। हर दिन लगभग एक ही समय पर सोना और जागना शरीर की इंटरनल क्लॉक को दोबारा सेट करने में मदद करता है। सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना भी मेलाटोनिन के संतुलन के लिए फायदेमंद है।
कब डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है?
अगर सर्दियों की सुस्ती लंबे समय तक बनी रहे, रोज़मर्रा के कामों को प्रभावित करने लगे, या इसके साथ उदासी, चिड़चिड़ापन, बहुत ज्यादा नींद या वजन में असामान्य बदलाव दिखें, तो इसे सामान्य मानकर टालना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से परामर्श ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि यह विटामिन डी की कमी, थायरॉयड समस्या या सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD) जैसी स्थितियों का संकेत भी हो सकती है।
सुस्ती को समझें, नज़रअंदाज़ न करें
विंटर लेजीनेस कोई कमजोरी या आलस नहीं, बल्कि शरीर की एक वैज्ञानिक और जैविक प्रतिक्रिया है। इसे समझकर अगर हम अपनी दिनचर्या, खानपान और एक्टिविटी में छोटे-छोटे बदलाव करें, तो सर्दियों के इस असर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। ज़रूरत की खबर यही है कि शरीर के संकेतों को समय पर समझा जाए, क्योंकि जागरूकता ही बेहतर स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है।






