2047 की राह में सबसे बड़ी अड़चन: तेज विकास के बिना अधूरा रह सकता है ‘विकसित भारत’ का सपना
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य पर एक अहम चेतावनी सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव ने कहा है कि मौजूदा आर्थिक रफ्तार इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए पर्याप्त नहीं है। उनका साफ कहना है कि अगर भारत को विकसित देशों की श्रेणी में पहुंचना है, तो उसे अगले दो दशकों तक लगातार 8 प्रतिशत या उससे अधिक की आर्थिक वृद्धि दर्ज करनी होगी—जो अब तक देश के लिए अपवाद ही रही है।
आय का अंतर पाटना सबसे बड़ी चुनौती
सुब्बाराव के अनुसार, भारत की मौजूदा प्रति व्यक्ति आय करीब 2,700 डॉलर है, जबकि विकसित देशों में यह 20 हजार डॉलर से अधिक है। इस अंतर को पाटने के लिए आय में कई गुना वृद्धि जरूरी होगी। उन्होंने आगाह किया कि केवल कुछ वर्षों की तेज ग्रोथ से काम नहीं चलेगा, बल्कि लंबे समय तक स्थिर और उच्च विकास दर बनाए रखना अनिवार्य है।
निवेश और रोजगार में कमजोरी
पूर्व गवर्नर ने कहा कि भले ही देश की मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति फिलहाल संतुलित दिखती हो—जैसे नियंत्रित महंगाई और स्थिर चालू खाता घाटा—लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। निजी क्षेत्र का निवेश अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ रहा है। इसके साथ ही रोजगार सृजन और घरेलू आय में बढ़ोतरी, जीडीपी की गति से पीछे चल रही है।
उनका कहना है कि अगर आर्थिक विकास आम लोगों की आय और नौकरियों में तब्दील नहीं होता, तो ऐसी वृद्धि लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकती।
‘संख्याओं’ से आगे की सोच जरूरी
सुब्बाराव ने यह भी स्पष्ट किया कि विकसित देश की पहचान केवल ऊंची आय से नहीं होती। असली सवाल यह है कि विकास का लाभ कितने व्यापक स्तर पर समाज तक पहुंच रहा है। अगर समृद्धि कुछ वर्गों तक सीमित रही, तो विकास का उद्देश्य ही अधूरा रह जाएगा।
बैंकिंग सुधार के बिना अधूरा विकास
उन्होंने बैंकिंग सेक्टर, खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में गहरे सुधार की जरूरत पर जोर दिया। उनका मानना है कि मौजूदा संरचनात्मक और संस्थागत समस्याएं क्रेडिट की दक्षता को बाधित कर रही हैं। जब तक सरकारी स्वामित्व और आंतरिक कार्यसंस्कृति में बदलाव के लिए ठोस रोडमैप नहीं बनेगा, तब तक बड़े सुधार संभव नहीं हैं।
संवाद24 विश्लेषण
सुब्बाराव की चेतावनी साफ संकेत देती है कि ‘विकसित भारत 2047’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि कठोर नीतिगत फैसलों और निरंतर आर्थिक सुधारों की मांग करता है। निजी निवेश को बढ़ावा, बैंकिंग प्रणाली का कायाकल्प और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन—इन्हीं तीन स्तंभों पर भारत का 2047 का सपना टिका है। इनके बिना यह सपना समय से पहले ही चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।






