मौत के सामान में आराम का सफर स्लीपर बसें क्यों बन रही हैं सबसे बड़ा खतरा?
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संवाद 24 संवाददाता। आरामदायक सफर का वादा करने वाली स्लीपर एसी बसें आज यात्रियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। बीते वर्षों में बसों में आग लगने की ज्यादातर घटनाएं इन्हीं स्लीपर बसों में सामने आई हैं, जहां हादसा होते ही यात्रियों को बचने का मौका तक नहीं मिल पाता। पड़ताल में जो सच सामने आया है, वह चौंकाने वाला और डराने वाला है।
अत्याधुनिक बस, लेकिन सुरक्षा सबसे कमजोर
विशेषज्ञों के मुताबिक स्लीपर बसें बाहर से जितनी आधुनिक दिखती हैं, अंदर से उतनी ही असुरक्षित हैं। इन बसों में कमजोर और पुराने तारों की वायरिंग, जरूरत से ज्यादा सीटें, भारी मात्रा में फोम और लकड़ी का इंटीरियर, हादसे को भयावह बना देता है। जरा-सी चिंगारी पूरी बस को आग के गोले में बदल देती है। हादसे के वक्त कई बार चालक और परिचालक यात्रियों को बचाने की बजाय खुद भाग खड़े होते हैं।
आग लगने की असली वजह
आगरा कॉलेज के रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डाॅ. अमित अग्रवाल बताते हैं कि अधिकतर बसें डीजल या सीएनजी से चलती हैं।डीजल की आग पेट्रोल के मुकाबले धीरे फैलती है, जबकि सीएनजी में आग बहुत तेजी से भड़कती है।
यदि डीजल या गैस का रिसाव बस के फोम या इंटीरियर तक पहुंच जाए तो आग बेकाबू हो जाती है। इसके अलावा एसी की नियमित सर्विस नहीं होती, जिससे शॉर्ट सर्किट की आशंका बढ़ जाती है। कई बसों में नए तारों की जगह पुराने और घटिया तार लगाए जाते हैं, जो चिंगारी बनते ही आग फैला देते हैं।
आपातकालीन खिड़की सिर्फ नाम की
आरटीओ के अनुसार नियमों में बस में चार निकास होने चाहिए—
- यात्रियों के चढ़ने-उतरने का मुख्य दरवाजा
- चालक का दरवाजा
- पीछे की आपातकालीन खिड़की
- साइड की आपातकालीन खिड़की
लेकिन हकीकत यह है कि आपातकालीन खिड़कियां छोटी, ऊंची और शीशे से जड़ी होती हैं, जिन्हें यात्री समय पर खोल ही नहीं पाते। ऊंचाई ज्यादा होने के कारण कूदकर निकलना भी आसान नहीं होता।
एक ही दरवाजा बना जानलेवा
ज्यादातर स्लीपर बसों में यात्रियों के चढ़ने और उतरने के लिए सिर्फ एक ही दरवाजा होता है, जो चालक के केबिन से होकर निकलता है। सामने से टक्कर होने पर यही दरवाजा जाम हो जाता है। चालक की खिड़की से भी बाहर निकलना संभव नहीं हो पाता।
खासकर स्लीपर बसों की ऊपरी बर्थ सबसे खतरनाक होती है। यहां से उतरना कठिन होता है और हादसे के समय यात्री अंदर ही फंस जाते हैं।
नशा, नींद और थकान—तीन बड़े दुश्मन
डाॅ. अमित अग्रवाल बताते हैं कि बसों की खराब डिजाइन के साथ-साथ अप्रशिक्षित चालक और परिचालक भी हादसों की बड़ी वजह हैं। चेकिंग की कमी के कारण कई चालक नशे में वाहन चलाते हैं, यातायात नियमों की अनदेखी करते हैं, जल्दी पहुंचने के दबाव में नींद और थकान को नजरअंदाज करते हैं। यह लापरवाही स्लीपर बसों को चलते-फिरते खतरे में बदल देती है।
बचाव के उपाय क्या हों?
रिटायर्ड सीओ बीएस त्यागी के अनुसार, घने कोहरे में वाहन को सुरक्षित स्थान पर रोक देना चाहिए, फॉग लाइट अनिवार्य की जाए, सड़क की सफेद पट्टियों को और गहरा किया जाए, टोल प्लाजा पर एनाउंसमेंट के जरिए यात्रियों को इमरजेंसी गेट और खिड़कियों की जानकारी दी जाए।जब यात्रियों को पता होगा कि संकट में कैसे निकलना है, तभी जान बचाने की संभावना बढ़ेगी।
सवाल बड़ा है
स्लीपर बसों का सफर वाकई आरामदायक है, लेकिन जब सुरक्षा मानकों की अनदेखी हो, तो यही आराम मौत के सामान बन जाता है। अब सवाल यह है कि क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रहेंगे, या हर सफर को सच में सुरक्षित बनाने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे?
यात्रियों की जान की कीमत पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।






