कानपुर नगर निगम में एससी-एसटी आयोग सदस्य का कथित अपमान: सम्मान की कमी या संयोग?
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संवाद 24 संवाददाता। उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के सदस्य रमेश कुंडे मंगलवार को कानपुर नगर निगम मुख्यालय पहुंचे। उनका उद्देश्य एक महत्वपूर्ण बैठक करना था, जिसके लिए उन्होंने तीन दिन पहले ही प्रोटोकॉल भेज दिया था। लेकिन मुख्यालय पहुंचने पर न तो किसी अधिकारी ने उनका स्वागत किया, न अगुवाई की और न ही पानी तक पूछा गया। इससे क्षुब्ध होकर रमेश कुंडे ने हंगामा कर दिया और इसे अपना अपमान बताया।
रमेश कुंडे, जो वाल्मीकि समाज से आते हैं, ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यहां मेरा अपमान किया गया है। मैं वाल्मीकि समाज से हूं, इसलिए अधिकारियों ने पानी तक नहीं पूछा। किसी ने अगुवाई भी नहीं की।” उन्होंने महापौर प्रमिला पांडेय पर भी भेदभाव का आरोप लगाया और कहा कि यदि महापौर हैं तो क्या हुआ, वाल्मीकि समाज का होने के कारण अपमान सहना पड़ेगा? उन्होंने चेतावनी दी कि अब सभी संबंधित अधिकारियों और महापौर को भी आयोग में तलब किया जाएगा।
यह घटना उस समय और भी चर्चा में आई जब रमेश कुंडे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री कुंभ मेले में वाल्मीकि समाज के लोगों के पैर धोकर सम्मान करते हैं, लेकिन यहां के अफसर समाजवादी पार्टी की मानसिकता वाले हैं, जो पानी तक नहीं पूछते।” बैठक किए बिना लौटते समय उन्होंने कहा, “अभी भी प्यासा हूं, यहां पानी तक नहीं मिला। मैं भटकता रहा। प्रोटोकॉल भेजा था, फिर भी कोई लेने क्यों नहीं आया?”
हंगामे की सूचना मिलते ही अपर नगर आयुक्त मोहम्मद अवेश खान सहित कई अधिकारी और कर्मचारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों का पक्ष था कि वे रमेश कुंडे को पहचान नहीं पाए। यदि कोई फोन कर देता तो शहर में प्रवेश करते ही अगुवाई कर ली जाती। अधिकारियों ने उन्हें मनाने की काफी कोशिश की, लेकिन रमेश कुंडे नहीं माने और गाड़ी में बैठकर रवाना हो गए।
दूसरी ओर, सूत्रों के अनुसार उस दिन महापौर प्रमिला पांडेय शहर में मौजूद ही नहीं थीं, जिससे प्रोटोकॉल का पालन न हो पाने की संभावना जताई जा रही है।
यह घटना एक बार फिर प्रशासनिक संवेदनशीलता और प्रोटोकॉल के पालन पर सवाल उठाती है। एक ओर जहां आयोग सदस्य ने इसे जातिगत भेदभाव से जोड़ा, वहीं अधिकारियों ने इसे अनजाने में हुई चूक बताया। अब देखना यह होगा कि आयोग इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और क्या यह घटना मात्र एक प्रशासनिक लापरवाही थी या इससे गहरा कोई मुद्दा जुड़ा है। समाज में समानता और सम्मान की बात करने वाले नेतृत्व से उम्मीद की जाती है कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता बरती जाए, ताकि किसी की गरिमा आहत न हो।






