म्यूचुअल फंड निवेशकों को राहत देने की तैयारी, फीस घटाने और IPO नियम आसान करने पर सेबी बोर्ड की अहम बैठक
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संवाद 24, नई दिल्ली ।
शेयर बाजार नियामक सेबी (SEBI) म्यूचुअल फंड निवेशकों के हित में बड़े नीतिगत बदलावों पर विचार करने जा रहा है। 17 दिसंबर को प्रस्तावित सेबी बोर्ड की बैठक में म्यूचुअल फंड की फीस संरचना में संशोधन, आईपीओ प्रक्रिया को सरल बनाने और निवेशकों से जुड़े खर्चों में पारदर्शिता बढ़ाने जैसे अहम प्रस्तावों पर फैसला हो सकता है। इसके अलावा सेबी अपने अधिकारियों से जुड़े हितों के टकराव (कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) पर एक्सपर्ट पैनल की रिपोर्ट पर भी चर्चा करेगा।
करीब 30 वर्षों में पहली बार म्यूचुअल फंड नियमों की इतनी व्यापक समीक्षा की जा रही है। मौजूदा समय में यह इंडस्ट्री 80 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन कर रही है, जिससे इसके फैसलों का सीधा असर करोड़ों निवेशकों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
खर्च घटाने की दिशा में कदम
सेबी ने हाल ही में इक्विटी और डेट म्यूचुअल फंड्स में टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) को कम करने का प्रस्ताव रखा था। TER वह शुल्क होता है, जो फंड हाउस निवेशकों से प्रबंधन और संचालन खर्चों के लिए लेते हैं। सेबी के सुझाव के मुताबिक, मौजूदा TER में 15 से 20 बेसिस पॉइंट्स तक की कटौती की जा सकती है। अभी यह शुल्क फंड के आकार के आधार पर अलग-अलग स्लैब में लागू होता है।
ब्रोकरेज फीस में बड़ी कटौती का प्रस्ताव
सेबी कैश मार्केट सौदों पर ब्रोकरेज को मौजूदा 12 बेसिस पॉइंट्स से घटाकर 2 बेसिस पॉइंट्स करने पर भी विचार कर रहा है। वहीं, डेरिवेटिव ट्रांजैक्शन में ब्रोकरेज को 5 बेसिस पॉइंट्स से घटाकर 1 बेसिस पॉइंट करने का प्रस्ताव है। बाजार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इस फैसले को लेकर बिचौलिया संस्थानों में असंतोष है।
निवेशकों को क्या लाभ?
सेबी का तर्क है कि ब्रोकरेज संस्थाएं रिसर्च और सौदे कराने के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूलती हैं, जबकि रिसर्च करना फंड हाउस की जिम्मेदारी है। इससे निवेशकों पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और उन्हें एक ही सेवा के लिए दो बार भुगतान करना पड़ता है। प्रस्तावित बदलावों से निवेश की कुल लागत घटने और पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।
इंडस्ट्री की राय बंटी
हालांकि, म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में इस प्रस्ताव को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। आनंद राठी ग्रुप के चेयरमैन आनंद राठी का कहना है कि ब्रोकरेज में बड़ी कटौती से लंबे समय में निवेशकों को नुकसान भी हो सकता है, क्योंकि फंड्स का प्रदर्शन काफी हद तक ब्रोकर्स की सेल-साइड रिसर्च पर निर्भर करता है।
अब सभी की निगाहें 17 दिसंबर को होने वाली सेबी बोर्ड बैठक पर टिकी हैं, जहां इन प्रस्तावों पर अंतिम फैसला लिया जा सकता है।






