धनु संक्रांति : सूर्य के धनु राशि में प्रवेश से संयम, साधना और दान का पावन काल
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। वैदिक काल-गणना में सूर्य की गति केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि मानव जीवन, समाज और संस्कृति को दिशा देने वाला आधार मानी गई है। सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तब उसे संक्रांति कहा जाता है। इन्हीं में से एक है धनु संक्रांति, जो प्रत्येक वर्ष सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के साथ घटित होती है।धनु संक्रांति का विशेष महत्व इस कारण है कि इसी दिन से खरमास का आरंभ माना जाता है, जो सनातन धर्म में संयम और साधना का काल कहा गया है।
???? धनु संक्रांति क्या है?
जब सूर्य वृश्चिक राशि से निकलकर धनु राशि में प्रवेश करता है, तब यह संक्रांति धनु संक्रांति कहलाती है। धनु राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं, जिन्हें ज्ञान, धर्म और सदाचार का प्रतीक माना गया है।अर्थात धनु संक्रांति का अर्थ केवल सूर्य का राशि परिवर्तन नहीं, बल्कि धर्मप्रधान ऊर्जा का सक्रिय होना है।
???? ज्योतिष में धनु संक्रांति को क्यों महत्व दिया गया? ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा, तेज, चेतना और समय (काल) का प्रतिनिधि माना गया है। जब सूर्य गुरु की राशि में प्रवेश करता है, तब उसकी ऊर्जा भौतिक उपलब्धियों से हटकर आध्यात्मिक परिष्कार की ओर उन्मुख हो जाती है। इसी कारण शास्त्रों ने इस काल को
विवाह
भौतिक शुभारंभ
ऐश्वर्य विस्तार
के लिए अनुपयुक्त और
तप
व्रत
दान
आत्मसंयम
के लिए श्रेष्ठ बताया है।
खगोल विज्ञान (Astronomy) के दृष्टिकोण से संक्रांति सूर्य की आभासी गति का परिणाम है, जो पृथ्वी के अक्षीय झुकाव और परिक्रमण से उत्पन्न होती है।
धनु संक्रांति के समय सूर्य दक्षिणायन की दिशा में होता है।दिन छोटे और रात्रियाँ लंबी होने लगती हैं। प्रकृति में शीत ऋतु का प्रभाव बढ़ता है।इस परिवर्तन का प्रभाव मानव शरीर, पाचन, मनोवृत्ति और जैविक लय पर पड़ता है। इसी वैज्ञानिक कारण से वैदिक संस्कृति ने इस काल में हल्का आहार संयम मानसिक स्थिरता पर विशेष बल दिया।
सनातन हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति में महत्व
सनातन परंपरा में धनु संक्रांति को आत्मनिरीक्षण धर्ममार्ग पर पुनः स्थिर होने अहंकार और भोग से विरक्ति का अवसर माना गया है।
धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश है कि गुरु की राशि में सूर्य होने पर विवाहादि मांगलिक कर्म वर्जित होते हैं।
इसी से खरमास परंपरा का विधान बना।
???? खरमास का आरंभ
धनु संक्रांति से लेकर मकर संक्रांति तक का समय खरमास कहलाता है। यह काल निषेध का नहीं बल्कि संयम और शुद्धि का अवसर है।
⛔ धनु संक्रांति और खरमास में वर्जित कार्य
इस अवधि में सामान्यतः निम्न कार्य नहीं किए जाते –
विवाह, सगाई
गृहप्रवेश
मुंडन, उपनयन
नवीन निर्माण या व्यापार शुभारंभ
मांगलिक संस्कार
✅ धनु संक्रांति में करने योग्य कर्म
शास्त्रों के अनुसार यह काल विशेष रूप से निम्नलिखित कर्मों के लिए श्रेष्ठ है –
विष्णु एवं सूर्य उपासना
एकादशी, प्रदोष व्रत
गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम
अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान
दीपदान और तीर्थ स्नान
साधना, जप और ध्यान
???? धनु संक्रांति का आध्यात्मिक संदेश
धनु संक्रांति हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन केवल भोग और उपलब्धि नहीं,बल्कि आत्मसंयम, धर्म और विवेक का मार्ग भी है। जब प्रकृति विश्राम की ओर जाती है, तब मनुष्य को भी आत्मिक संतुलन की ओर बढ़ना चाहिए।
पर्व: धनु संक्रांति
तिथि: 15 दिसंबर
विशेष: सूर्य का धनु राशि में प्रवेश
संबंधित काल: खरमास आरंभ
समाप्ति: मकर संक्रांति (14 जनवरी)
स्वभाव: संयम, साधना और दान







