सफला एकादशी व्रत कथा (पौष मास, कृष्ण पक्ष)
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री।
तिथि : 15 दिसंबर, सोमवार।
पारण : अगले दिन सूर्योदय के पश्चात्।
भारतीय सनातन परंपरा में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। एकादशी भगवान श्रीहरि को अत्यंत प्रिय है। प्रत्येक एकादशी का अपना विशेष नाम, महत्व और फल बताया गया है। पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी कहा गया है।
इस व्रत का उद्देश्य केवल उपवास नहीं, बल्कि मन, कर्म और भावना की शुद्धि है। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान की कृपा पाप और पुण्य का भेद नहीं देखती, केवल भाव देखती है।
मोक्षदा एकादशी की महिमा सुनकर अर्जुन अत्यंत प्रसन्न हुए और भगवान श्रीकृष्ण से बोले हे कमलनयन! मोक्षदा एकादशी की कथा सुनकर मैं कृतार्थ हो गया। अब कृपा करके पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम, उसके देवता और व्रत विधान विस्तार से बताइए।
अर्जुन की जिज्ञासा सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे कुंतीपुत्र! तुमने उत्तम प्रश्न किया है। अब तुम पौष कृष्ण पक्ष की एकादशी का माहात्म्य सुनो। इस एकादशी का नाम सफला है और इसके आराध्य देव भगवान नारायण हैं। इस व्रत के द्वारा श्रीहरि शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण आगे बोले हे पार्थ! जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, यज्ञों में अश्वमेध और देवताओं में श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। जो मनुष्य श्रद्धा से सफला एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण करता है, उसे पाँच हजार वर्ष की तपस्या का फल प्राप्त होता है।
प्राचीन काल में चम्पावती नगरी में महिष्मान नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। सबसे बड़ा पुत्र लुम्पक अत्यंत दुष्ट, पापी और कुकर्मी था। वह परस्त्री-गमन करता, वेश्याओं के यहाँ जाकर राज्य का धन नष्ट करता और ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा देवताओं की निंदा करता था। प्रजा उसके अत्याचारों से दुखी थी, किंतु युवराज होने के कारण कोई विरोध न कर सका।
एक दिन राजा को उसके कुकर्मों का ज्ञान हुआ और क्रोधित होकर राजा ने लुम्पक को राज्य से निष्कासित कर दिया। पिता के त्यागते ही समाज ने भी उसे त्याग दिया। वन में रहने लगा लुम्पक दिन में जंगल में रहता और रात्रि में चोरी के लिए नगर आता। वह निर्दोष पशु-पक्षियों का वध कर जीवन यापन करता।
जिस वन में वह रहता था, वह भगवान को प्रिय था। वहाँ एक प्राचीन पीपल का वृक्ष था, जिसे देवताओं का क्रीड़ा-स्थल माना जाता था।
पौष मास की दशमी की रात्रि को लुम्पक वस्त्रहीन होने के कारण भीषण ठंड से मूर्छित हो गया। पूरी रात जागता रहा, न सो सका। इस प्रकार अनजाने में ही उसका एकादशी उपवास और जागरण हो गया। दोपहर को उसे होश आया। भूख से व्याकुल होकर वह वन में फल खोज लाया और पीपल के वृक्ष की जड़ में रखकर बोला हे ईश्वर! ये फल आपको अर्पित हैं। यदि आप तृप्त हों। उस रात वह रोता रहा, सो न सका।
भगवान श्रीहरि उसके अनजाने व्रत, जागरण और अर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुए। प्रातः एक दिव्य रथ आया और आकाशवाणी हुई, हे युवराज! तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गए हैं। भगवान नारायण की कृपा से तुम अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त करो।”
लुम्पक ने “जय श्रीहरि” कहकर पिता से क्षमा मांगी। राजा ने उसे राज्य सौंप दिया और स्वयं वन चले गए। लुम्पक ने शास्त्रानुसार धर्मपूर्वक राज्य किया और अंत में भगवान विष्णु का भजन करते हुए वैकुंठ को प्राप्त हुआ।
सफला एकादशी की यह कथा हमें यह सिखाती है कि भगवान भाव के भूखे हैं, अनजाने में किया गया धर्मकर्म भी फल देता है। कोई भी प्राणी प्रभु की कृपा से वंचित नहीं, सच्चा पश्चाताप जीवन को बदल देता है। लुम्पक जैसा महापापी भी श्रीहरि की कृपा से मुक्त हो गया।
कहा गया है कि जो मनुष्य श्रद्धा से सफला एकादशी व्रत करता है, कथा सुनता या पढ़ता है, उसे राजसूय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।






