खुले आसमान तले ठिठुरते गोवंश और खेतों में जागते किसान
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संवाद 24 संवाददाता। दिसंबर की कड़कती सर्दी में जब पूरा शहर गर्म कंबलों में दुबका रहता है, तब जिले की सड़कें और खेत एक करुण दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। एक तरफ सड़कों, हाई-वे और खाली प्लॉटों पर सैकड़ों-हजारों अन्ना गोवंश (बेसहारा पशु) रात-रात भर ठिठुरते दिखते हैं, तो दूसरी तरफ अपनी फसलें बचाने के लिए किसान कड़ाके की ठंड में खेतों में अलाव जला कर पहरा दे रहे हैं। यह दोहरी त्रासदी अब जिले की नियति बन चुकी है।
सरकारी आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि तमाम गोआश्रय स्थलों और करोड़ों के बजट के बावजूद स्थिति जस की तस है। जिले में 95 गोआश्रय गृह हैं, जिनमें महज 10,283 गोवंश ही संरक्षित हैं। यानी करीब दस हजार से ज्यादा गोवंश आज भी खुले आसमान के नीचे भटक रहे हैं। अकबरपुर, रसूलाबाद, शिवली, गजनेर, रूरा, मूसानगर, जैनपुर औद्योगिक क्षेत्र से लेकर राजपुर तक – हर कस्बे, हर गाँव की सड़कें अब गोवंशों के अस्थायी आश्रय बन गई हैं।
रात का अंधेरा जैसे ही गहराता है, गोवंशों के झुंड फसलों पर टूट पड़ते हैं। सुबह तक गेहूं, सरसों, आलू, चना – जो भी लगा हो, सब साफ। हताश किसान बताते हैं, “एक रात की चूक और महीनों की मेहनत बर्बाद।” मजबूरी में वे अब खेतों में ही प्लास्टिक-तिरपाल की झोपड़ी डाल कर रहने लगे हैं। बुजुर्ग माता-पिता, छोटे बच्चे – सब अलाव के इर्द-गिर्द सिमट कर रात काटते हैं। सर्द हवाएँ शरीर को चीरती हैं, पर फसल से ज्यादा कीमती कुछ नहीं।
लेकिन खतरा सिर्फ फसल का नहीं है। भूख और ठंड से बेचैन ये गोवंश अब आक्रामक हो चले हैं। कई जगह किसानों और राहगीरों पर हमले की खबरें आ रही हैं। हाई-वे पर पड़े गोवंश रात में दुर्घटनाओं का सबब बन रहे हैं। अचानक सड़क पर आ जाने से वाहन असंतुलित हो जाते हैं। पिछले एक महीने में ही कई गंभीर हादसे हो चुके हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतना बजट, इतनी योजनाएँ होने के बावजूद गोवंश सड़कों पर क्यों हैं? गोआश्रय स्थलों में जगह खाली पड़ी है, चारे की कमी बताई जाती है, कर्मचारी नहीं हैं, रख-रखाव नहीं हो रहा। नतीजा – गोवंश भटक रहे हैं, किसान रातें जाग रहे हैं और सड़कें मौत के मुहाने पर खड़ी हैं।
यह सिर्फ कानपुर देहात की नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की कहानी है। जब तक गोआश्रय स्थलों को वास्तव में कार्यशील नहीं बनाया जाएगा, जब तक पशुओं के लिए चारा-पानी और सुरक्षा की ठोस व्यवस्था नहीं होगी, तब तक न ठिठुरते गोवंश की करुणा खत्म होगी, न किसानों की मजबूरी।
सर्दी बढ़ रही है। अलाव की लपटें कमजोर पड़ रही हैं। लेकिन सवाल अभी भी वही है – कब तक खुले आसमान के नीचे ठिठुरेंगे ये मूक प्राणी और कब तक खेतों में जागते रहेंगे हमारे अन्नदाता?






