तनाव: वर्तमान समय का साइलेंट किलर, क्या आप इसकी पकड़ में हैं?
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संवाद 24 डॉ अजय सिंह पटेल। सर्द हवाओं के मौसम में जब जीवन की रफ्तार और भी तेज हो जाती है, तब मनुष्य का मन सबसे अधिक दबाव में आ जाता है। आधुनिक दौर की भागदौड़, बढ़ती जिम्मेदारियाँ, आर्थिक चिंताएँ और सामाजिक अपेक्षाएँ मिलकर एक ऐसी अदृश्य कैद बना देती हैं, जिससे निकलना आसान नहीं होता।
यही कारण है कि तनाव आज बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है। आयुर्वेद इस मानसिक स्थिति को मानसिक दोषों की विकृति में गिनता है, जबकि आधुनिक विज्ञान इसे हार्मोनल असंतुलन और न्यूरो-केमिकल प्रतिक्रियाओं में होने वाले बदलावों से जोड़ता है। दोनों ही प्रणालियाँ इस बात पर सहमत हैं कि लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर के हर अंग, हर प्रणाली और हर मानसिक क्षमता पर गंभीर प्रभाव डालता है।
तनाव को समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है। आयुर्वेदिक दृष्टि से तनाव रजस और तमस गुणों के बढ़ जाने से उत्पन्न होता है। यह वृद्धि मन में भय, चिंता, अस्थिरता और नकारात्मकता पैदा करती है, जिससे मन अशांत हो जाता है और शरीर में वात दोष बढ़ने लगता है। वात दोष की वृद्धि तंत्रिका तंत्र को असंतुलित करती है, जिसके कारण बेचैनी, अनिद्रा, सिरदर्द, थकान और पाचन संबंधी समस्याएँ उभरने लगती हैं। इसीलिए आयुर्वेद मन–शरीर के संतुलन को तनाव प्रबंधन का मूल मानता है।
वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो तनाव तब पैदा होता है जब मस्तिष्क किसी खतरे, दबाव या चुनौती को महसूस करता है। इस स्थिति में शरीर “फाइट-ऑर-फ्लाइट” प्रतिक्रिया सक्रिय करता है, जिसके परिणामस्वरूप Cortisol और Adrenaline जैसे तनाव हार्मोन तेजी से बढ़ जाते हैं। यह प्रक्रिया अल्पकाल के लिए उपयोगी है, लेकिन जब यही अवस्था प्रतिदिन और लंबे समय तक बनी रहे, तब शरीर पर इसके हानिकारक प्रभाव दिखने लगते हैं। लगातार बढ़ा हुआ Cortisol दिल की धड़कन बढ़ा देता है, पाचन को कमजोर कर देता है, नींद के चक्र को बाधित करता है, स्मरण शक्ति और निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है और सबसे महत्वपूर्ण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है।
तनाव के दीर्घकालिक प्रभाव कई बार तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर के भीतर यह कई गंभीर समस्याओं को जन्म देता रहता है। हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों से लेकर पेट की जलन, IBS और भूख में बदलाव तक, तनाव के प्रभाव बेहद व्यापक होते हैं। अनिद्रा इसकी सबसे सामान्य परिणति है, क्योंकि बढ़ा हुआ Cortisol नींद की प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर देता है। इसके अलावा बाल झड़ना, त्वचा का निस्तेज होना, लगातार थकान, चिड़चिड़ापन और शरीर में क्रॉनिक इंफ्लेमेशन बढ़ जाना भी लंबे तनाव के संकेत हैं। महिलाओं में PCOS और मासिक चक्र की अनियमितता भी अनेक अध्ययनों में तनाव से जुड़ी हुई पाई गई है। इन सभी कारणों से तनाव को एक “साइलेंट किलर” माना जाता है।
तनाव से राहत के लिए कई पारंपरिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी अत्यंत प्रभावी माने जाते हैं। अश्वगंधा उन औषधियों में से एक है जिसने आधुनिक शोधों में उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि अश्वगंधा Cortisol स्तर को 30–40 प्रतिशत तक कम कर सकती है, जिससे मन शांत होता है, ऊर्जा बढ़ती है और नींद की गुणवत्ता सुधरती है। सामान्यतया इसका 300 mg एक्सट्रैक्ट या एक चम्मच चूर्ण रात को लिया जाता है, लेकिन हर व्यक्ति के स्वास्थ्य के अनुसार इसकी मात्रा भिन्न हो सकती है, इसलिए उपयोग चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।
जटामांसी एक और प्रभावी औषधि है, जो तंत्रिका तंत्र को शांत करने के लिए जानी जाती है। यह अनिद्रा और मानसिक बेचैनी में विशेष लाभ देती है। वहीं शंखपुष्पी को मस्तिष्क का सर्वोत्तम टॉनिक माना जाता है, जो मानसिक थकान को कम करके एकाग्रता और स्मरण शक्ति को बढ़ाने में मदद करती है। यह छात्रों, पेशेवरों और मानसिक तनाव वाले लोगों के लिए उपयोगी मानी जाती है। परंपरागत रूप से लिया जाने वाला दूध और जायफल का मिश्रण भी रात को मानसिक शांति प्रदान करता है। जायफल मस्तिष्क की अतिरिक्त उत्तेजना को शांत करता है और गहरी नींद लाने में सहायता करता है।
तिल के तेल की सिर पर मालिश आयुर्वेद में “शिरो-अभ्यंग” कहलाती है और इसे वात दोष को संतुलित करने का प्रभावी उपाय माना जाता है। यह तनाव, सिरदर्द और अनिद्रा जैसी समस्याओं को कम करता है। इसके अलावा सुबह खाली पेट गर्म पानी में शहद लेने से शरीर के टॉक्सिन बाहर निकलते हैं, पाचन सुधरता है और मन हल्का महसूस होता है। तुलसी और दालचीनी की चाय सर्दियों में मानसिक और शारीरिक तनाव दोनों को कम करने में सहायक होती है। तुलसी प्राकृतिक रूप से Nervous System को संतुलित करती है, जबकि दालचीनी शरीर की थकान को कम करती है।
तनाव से त्वरित राहत पाने के लिए 4-7-8 ब्रीदिंग तकनीक आज विश्वभर में लोकप्रिय है। Harvard Medical School सहित अनेक संस्थान इसे तुरंत प्रभाव देने वाली तकनीक मानते हैं। इस प्रक्रिया में चार सेकंड तक साँस लेना, सात सेकंड तक रोकना और आठ सेकंड तक धीरे-धीरे छोड़ना होता है। केवल दो मिनट तक यह अभ्यास करने से दिल की धड़कन शांत होती है, मस्तिष्क के तनाव रिसेप्टर्स धीमे पड़ते हैं और व्यक्ति तत्काल मानसिक राहत महसूस करता है।
तनाव के समय आहार भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केले प्राकृतिक सेरोटोनिन बूस्टर होते हैं, जबकि अखरोट और बादाम ओमेगा-3 फैटी एसिड के कारण मस्तिष्क को शक्ति देते हैं। गुड़ शरीर में खनिज संतुलन बनाए रखता है और गुनगुना दूध नींद को गहरा और शांत बनाता है। सूप, खिचड़ी और दलिया जैसे हल्के भोजन पाचन को सहज रखते हैं और मानसिक बोझ को कम करते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक चाय-कॉफी, रात में देर तक जागना, तला-भुना भोजन और देर रात मोबाइल स्क्रीन का उपयोग तनाव को कई गुना बढ़ा देता है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि तनाव कोई मामूली समस्या नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे शरीर, मन और भावनाओं को कमजोर करने वाली अवस्था है। यदि समय पर सही कदम उठाए जाएँ जैसे आयुर्वेदिक औषधियाँ, संतुलित आहार, जीवनशैली में सुधार और वैज्ञानिक श्वसन तकनीक तो तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में तनाव रहित जीवन जीना ही सबसे बड़ी औषधि है। यदि तनाव लंबे समय से बना हुआ है, तो किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।
डिस्क्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। यह किसी भी प्रकार से चिकित्सकीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी लक्षण, निर्णय या उपचार के लिए अपने व्यक्तिगत चिकित्सक, या किसी योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें। samvad24.com प्रस्तुत जानकारी की चिकित्सकीय सटीकता, पूर्णता या उपयुक्तता के लिए उत्तरदायी नहीं है तथा इसके उपयोग से होने वाली किसी भी हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होगा।






