60 लाख का सपना, 5 हजार की कीमत और एक ज़िंदगी का अंत
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संवाद 24 संवाददाता। 3 दिसंबर 2025 की सुबह पांडु नदी का किनारा। एक युवक का शव। हाथ रस्सी से बंधे, गला घोंटा हुआ, सिर पर पत्थरों के कई वार, मुँह पर बोरी कसी हुई। नाम था विपिन तिवारी, उम्र सिर्फ़ 30 साल। ज़िंदगी शुरू ही हुई थी। मगर लालच ने उसे हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया।
पुलिस ने महज़ पाँच दिन में जो खुलासा किया, वो किसी भयावह फ़िल्म से कम नहीं। हत्या का मकसद: 60 लाख रुपये का सरकारी मुआवजा। हत्यारे: विपिन के अपने ही साथी, जिनके साथ वो रोज़ हँसता-बोलता था, पान मसाला फैक्ट्री में पसीना बहाता था।
लालच की आँधी में खो गया इंसानियत का नामोनिशान
मनोज दीक्षित – सुपरवाइज़र, जिस पर विपिन भरोसा करता था।
अरविंद चंदेल – सहकर्मी, जिसके साथ चाय पीता था।
प्रदीप साहू – पुराना साथी, जो फैक्ट्री छोड़ चुका था।
इन तीनों को पता चला कि विपिन की ज़मीन के बदले 60 लाख का मुआवजा आने वाला है। बस यही बात काफी थी। दिमाग़ में सिर्फ़ एक विचार कौंधा: “ये पैसे हमारे होने चाहिए।”
फिर शुरू हुई वो ठंडे दिमाग़ वाली साजिश जो रोंगटे खड़े कर देती है।
वो ख़ौफ़नाक दिन – एक-एक क़दम मौत की ओर
सुबह मनोज का फ़ोन: “यार बारादेवी चौराहा आना, ज़रूरी काम है।”
वहाँ पहले से तैयार ऑटो। ड्राइवर – प्रदीप।
कोल्ड ड्रिंक में मिलाई नशीली गोली।
शराब ठेके पर ले जाकर यूपीआई से पेमेंट करवाया, चुपके से पिन चुरा लिया। जरौली रोड का भदौरिया गेस्ट हाउस। कमरा बुक। बहाना – “दोस्तों की पार्टी”। कमरे में लगातार शराब। जब तक विपिन होश खो न दे। मोबाइल अनलॉक करवाया। जैसे ही विपिन को शक हुआ, उसने काँपते स्वर में कहा “भैया… तुम लोग गलत कर रहे हो।”
बस। यही उसकी ज़िंदगी की आख़िरी सच्ची बात थी।
उसके बाद जो हुआ, वो इंसानियत को शर्मसार करने वाला था।
ऑटो में बिठाया। हाथ बाँधे। गला घोंटा। सिर पर पत्थरों से बार-बार वार। मुँह पर बोरी। फिर लाश को नदी किनारे फेंककर चले आए। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
हत्या के बाद भी नहीं रुका नशा
लाश फेंकने के बाद भी इनका दिल नहीं भरा। विपिन के फ़ोन से खाता चेक किया – सिर्फ़ 5,000 रुपये। गुस्से में उसी पैसे से फिर शराब ख़रीदी, पी। रात को गेस्ट हाउस लौटे तो नशे में होटल वाले से बोल पड़े “हमने अपने दोस्त को मार डाला।” होटल वाला हँस दिया। मज़ाक समझा। उन्हें बाहर निकाल दिया। बचे हुए पैसे नौबस्ता में एक्सचेंज कर बाँट लिए। सुबह फिर क्राइम सीन देखने पहुँच गए जैसे पर्यटक घूमने आए हों।
कानपुर पुलिस ने फिर दिखाया दम
डीसीपी साउथ दीपेंद्र नाथ चौधरी और उनकी टीम ने कमाल कर दिया।
सीसीटीवी, कॉल रिकॉर्ड, होटल एंट्री, यूपीआई ट्रांजेक्शन हर कड़ी जोड़ी।
पाँच दिन। सिर्फ़ पाँच दिन में तीनों शातिर गिरफ़्त में। सभी ने जुर्म कबूल कर लिया। कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। अब भी एक सवाल कचोटता है। 60 लाख के लालच में एक ज़िंदगी लील ली गई।
मिला क्या? महज़ पाँच हज़ार। क्या कोई रकम इंसान की जान की कीमत हो सकती है? क्या दोस्ती, भरोसा, इंसानियत – सब इतने सस्ते हो गए? ये केस सिर्फ़ एक हत्याकांड नहीं है। ये उस लालच की कहानी है जो इंसान को हैवान बना देता है। और ये सबक है कि अपराध की कोई भी प्लानिंग परफ़ेक्ट नहीं होती, कानून ज़रूर पकड़ता है।
विपिन तिवारी अब हमारे बीच नहीं है। लेकिन उसकी मौत ने एक बार फिर चीख़-चीख़कर बताया है लालच बुरी बला है।
और दोस्ती… वो आजकल सबसे महँगी पड़ती है।






