राष्ट्रहित की साधना के सौ वर्ष: डॉ. अखिलेश की कलम से निकली प्रेरणा की अमृतधारा
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संवाद 24 डॉ अखिलेश कुमार।
संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आगरा के प्रतिष्ठित साहित्यकार संघ के पूर्व प्रचारक डॉ. अखिलेश कुमार द्वारा रचित यह प्रेरणादायी गीत राष्ट्रनिर्माण, संगठन शक्ति और नागरिक कर्तव्य के सामूहिक भाव को समर्पित है। गीत में सौ वर्षों की साधना, विश्वगुरु भारत के स्वप्न, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और स्वदेशी संकल्प की भावना को बड़े ही सहज एवं प्रभावशाली शब्दों में पिरोया गया है। राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर लिखी गई यह रचना न केवल संघ की वैचारिक यात्रा को उद्घाटित करती है, बल्कि आने वाले शताब्दी-युग के संकल्पों की ओर भी मार्गदर्शन करती है।
लोकहित की कामना के, संघ के सौ वर्ष पूरे!
राष्ट्र हित की साधना में, संघ के सौ वर्ष पूरे!
राष्ट्रहित की साधना में…..
स्वप्न युग दृष्टा नयन का, हो रहा साकार देखो!
विश्व गुरू का आज फिर, बढ़ता हुआ आधार देखो!!
कर्म हों निष्काम अपने, हो सुनहरे स्वप्न पूरे !!1!!
राष्ट्र हित की साधना में…..
कार्य की गति का बने अब, केंद्र मंडल गाँव बस्ती!
संगठन का मंत्र गूंजे, हर डगर हर नगर बस्ती !!
मिलन शाखा मंडली से, हों अधूरे कार्य पूरे!!2!!
राष्ट्र हित की साधना में…..
नागरिक कर्तव्य पालन, आज हर घर में प्रबोधन!
शैल सरिता और कानन, हो सुरक्षित आज गोधन!!
धरा पर हों वृक्ष सुंदर, फूल फल से भरे पूरे!!3!!
राष्ट्र हित की साधना में…..
संगठित हों सबल सब जन, एक मन एक ध्येय हों !
जाति भाषा पंथ मत, सबके सभी श्रद्धेय हों !!
ले स्वदेशी व्रत भरें हम, देश के भंडार पूरे !!4!!
राष्ट्र हित की साधना में…..






