“ट्रंप को नोबेल मिलना चाहिए” भारत–रूस कूटनीति पर पूर्व पेंटागन अधिकारी का तंज आखिर क्या संकेत देता है?
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में आरोप–प्रत्यारोप, संवाद–विवाद और रणनीतिक व्याख्याएँ नई बात नहीं हैं। परंतु जब किसी देश के पूर्व उच्च-स्तरीय सुरक्षा विश्लेषक अपने ही राष्ट्रपति पर कटाक्ष करें, और उस टिप्पणी के केंद्र में भारत–रूस संबंध हों, तो चर्चा अपने आप ही वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाल ही में अमेरिका के पूर्व पेंटागन अधिकारी माइकल रुबिन ने दावा किया कि नई दिल्ली में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को जो सम्मान मिला, उसका वास्तविक श्रेय रूस को नहीं बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जाता है। रुबिन का तर्क है कि ट्रंप की नीतियों ने भारत को रूस के और करीब धकेला, और यदि यह ‘उपलब्धि’ मानी जाए तो ट्रंप को नोबेल पुरस्कार तक मिलना चाहिए। यह स्वीकारोक्ति जितनी व्यंग्यात्मक है, उतनी ही अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन और अमेरिकी विदेश नीति की दिशा पर सवाल भी उठाती है।
भारत–रूस संबंध: दशकों की रणनीतिक साझेदारी
भारत–रूस संबंध किसी एक राष्ट्रपति, किसी एक घटना या किसी एक भू-राजनीतिक परिस्थिति पर आधारित नहीं हैं। यह साझेदारी इतिहास, आपसी भरोसे और दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग पर खड़ी है।
- शीत युद्ध से आधुनिक युग तक की निरंतरता
सोवियत संघ ने 1971 के भारत–पाक युद्ध में जिस तरह भारत का साथ दिया, वह दोनों देशों के रिश्ते की नींव को मजबूत करने वाला निर्णायक क्षण माना जाता है। रक्षा सहयोग, अंतरिक्ष एवं तकनीकी साझेदारी ऊर्जा सुरक्षा, बहुध्रुवीय विश्व की अवधारणा, ये वे स्तंभ हैं, जिन पर भारत–रूस साझेदारी आज तक कायम है। - सैन्य सहयोग का unmatched ट्रैक रिकॉर्ड
भारत की सैन्य संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दशकों से रूसी तकनीक पर आधारित रहा है। सुखोई 30 एमकेआई, ब्रह्मोस मिसाइल, एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी की लीज। यह सूची बताती है कि रूस भारत के लिए केवल एक साझेदार नहीं, बल्कि सुरक्षा परिदृश्य में एक भरोसेमंद रणनीतिक सहायक है।
ट्रंप प्रशासन की नीतियाँ:
क्या उन्होंने वास्तव में भारत–रूस को और करीब किया?
माइकल रुबिन का मुख्य तर्क इसी सवाल के इर्द–गिर्द घूमता है।
- प्रतिबंधों की राजनीति (Sanctions Regime)
ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किए गए CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) ने उन देशों को निशाना बनाया जो रूस के साथ रक्षा सौदे कर रहे थे। भारत जैसे लोकतांत्रिक, स्वतंत्र विदेश नीति चलाने वाले राष्ट्र के लिए यह यह संकेत था कि अमेरिका मित्र होने के बावजूद दबाव बना सकता है। भारत ने CAATSA के बावजूद रूस से S-400 डील रद्द नहीं की। यह अमेरिकी नीति की विफलता का प्रतीक भी था और भारत–रूस विश्वास का संकेत भी। - अमेरिका की अप्रत्याशित विदेश नीति
माइकल रुबिन का संकेत स्पष्ट है ट्रंप के दौरान अमेरिकी विदेश नीति में स्थिरता और पूर्वानुमान की कमी रही। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और दृढ़ की, रूस ने दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को संरक्षित रखा, अमेरिका को विश्वास-आधारित साझेदारी की सीमाओं का अहसास हुआ - अमेरिका–रूस संबंधों का ऐतिहासिक निम्न स्तर
ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका और रूस के बीच वैचारिक व सामरिक तनाव बढ़ा। रुबिन का कहना यह है कि अमेरिका–रूस तनाव का सीधा फायदा भारत–रूस संबंधों को मिला, क्योंकि दोनों देश अपनी साझेदारी को नई स्फूर्ति देना चाहते थे।
रुबिन के बयान के निहितार्थ: कटाक्ष या कूटनीतिक संदेश?
पूर्व पेंटागन अधिकारी का कथन महज मज़ाक नहीं बल्कि अमेरिकी नीति-निर्माताओं के बीच बढ़ती चिंता को दर्शाता है।
- अमेरिका का diminishing influence?
भारत आज अमेरिका का क्वाड पार्टनर है, रूस का रक्षा सहयोगी, यूरोप का विश्वसनीय व्यापार भागीदारपश्चिम एशिया का संतुलित कूटनीतिक केंद्र है। यह सभी वैश्विक शक्तियों के लिए संदेश है कि भारत किसी एक धुरी का हिस्सा नहीं बन सकता। - भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ कूटनीति की सफलता
भारत का कूटनीतिक मॉडल “non-alignment” नहीं बल्कि “multi-alignment” है, जहाँ भारत हर पक्ष के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध रखता है। रुबिन के बयान से यह सिद्ध होता है कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति में इतना सक्षम है कि अमेरिका की नीतियाँ भी उसके रूसी संबंधों को प्रभावित नहीं कर पाईं। - ट्रंप को नोबेल? एक व्यंग्य, लेकिन संकेतपूर्ण
रुबिन का कहना कि “ट्रंप को इसके लिए नोबेल मिलना चाहिए” वास्तव में अमेरिकी विदेश नीति की असंगति पर एक तीखा तंज है। यह संदेश है कि आपने अपने सहयोगियों को असहज किया, इससे भू-राजनीतिक संतुलन बदला और इसके परिणामस्वरूप रूस को अप्रत्याशित कूटनीतिक लाभ मिला
भारत के दृष्टिकोण से समीकरण: राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
भारत–रूस संबंधों को केवल अमेरिका की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जा सकता। भारत के लिए रूस ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा तकनीक, अंतरिक्ष सहयोग, रणनीतिक संतुलन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- पश्चिम और रूस के बीच संतुलन
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए। भारत ने रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखी, कूटनीतिक संवाद बनाए रखा, G20 में मध्यस्थता की भूमिका निभाई। यह संतुलन भारत के राष्ट्रीय हितों पर आधारित था, न कि किसी तीसरे देश के दबाव या टिप्पणी पर। - रूस–भारत ऊर्जा साझेदारी का तेजी से विस्तार
पिछले वर्षों में रूस भारत का प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बदलता चरित्र
रुबिन का बयान सिर्फ ट्रंप पर टिप्पणी नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में आए बदलाव का संकेत भी है।
- बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ता कदम
आज का विश्व अमेरिका बनाम चीन, रूस बनाम पश्चिम, क्षेत्रीय समूहों का उदय, भारत, सऊदी, ब्राजील जैसे देशों का बढ़ता प्रभाव आदि बदलावों से गुजर रहा है। भारत इस प्रणाली में संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है। - कूटनीति में ‘स्वायत्तता’ की बढ़ती स्वीकार्यता
भारत ने दिखाया है कि “साझेदारी हो सकती है, पर निर्भरता नहीं।” यह संदेश अमेरिका, रूस और चीन—तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
रुबिन की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह बताती है भारत अब वैश्विक कूटनीति का केंद्र है, महासत्ताओं की नीतियाँ भी भारत की रणनीतियों को परिभाषित नहीं कर सकतीं, अमेरिका के भीतर भी यह स्वीकार्यता बढ़ रही है कि भारत अपनी राह स्वयं तय करता है।
रुबिन का कथन अमेरिकी विदेश नीति के लिए चेतावनी भी है यदि अमेरिका ने अपने साझेदारों के साथ सम्मानपूर्ण और पूर्वानुमान योग्य संबंध नहीं बनाए, तो वह प्रभाव खो सकता है।
भारत की कूटनीति का वैश्विक प्रभाव बढ़ा है
पूर्व पेंटागन अधिकारी माइकल रुबिन ने चाहे व्यंग्य में कहा हो कि “ट्रंप को नोबेल मिलना चाहिए”, पर उनका यह कथन कई गहरी बातें उजागर करता है। जैसे अमेरिका की विदेश नीति में अस्थिरता ने भू-राजनीतिक समीकरण बदले, भारत–रूस संबंधों की मजबूती किसी एक घटना या व्यक्ति पर निर्भर नहीं, भारत विश्व राजनीति में संतुलनकारी शक्ति बन चुका है, भारत की कूटनीति की विश्वसनीयता और रणनीतिक स्वायत्तता को वैश्विक मान्यता मिल रही है।
आज भारत न तो किसी धुरी का हिस्सा बनना चाहता है, और न ही किसी दबाव के अधीन निर्णय लेता है। भारत का लक्ष्य स्पष्ट है राष्ट्रीय हित सर्वोपरि, और विश्व में शांति, संतुलन और स्थिरता की दिशा में सक्रिय भूमिका। माइकल रुबिन की टिप्पणी इस नई विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव की एक अनजानी स्वीकृति भी मानी जा सकती है।






