ययाति, देवयानी और शर्मिष्ठा: प्रेम, प्रतिशोध और नैतिक संघर्ष की अनोखी गाथा
Share your love

संवाद 24 डेस्क। प्राचीन भारतीय साहित्य में ययाति, देवयानी और शर्मिष्ठा की कथा एक ऐसी गाथा है जिसमें प्रेम, अहंकार, प्रतिद्वंद्विता और मानवीय दुर्बलताओं के साथ-साथ मोक्ष और वैराग्य का गहरा संदेश समाया है। यह कथा महाभारत के आदिपर्व में वर्णित है और भारतीय सामाजिक दार्शनिक चिंतन को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
देवयानी और शर्मिष्ठा का परिचय
देवयानी असुर गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थीं। शुक्राचार्य न केवल असुरों के महान गुरू थे बल्कि तप, विद्या और नीति के भी सर्वोच्च आचार्य माने जाते थे। देवयानी विलक्षण सौंदर्य, बुद्धिमत्ता और गर्व के लिए प्रसिद्ध थीं। दूसरी ओर शर्मिष्ठा, असुरों के राजा वृषपर्वा की पुत्री थी। सौन्दर्य, सामर्थ्य और राजसी तेज से संपन्न। दोनों के बीच मित्रता थी, परंतु यह मित्रता अधिकतर अहंकार और प्रतिस्पर्धा से भरी थी।
जलक्रीड़ा से उत्पन्न विवाद
एक दिन देवयानी और शर्मिष्ठा अपनी सहेलियों के साथ वन में जलक्रीड़ा कर रही थीं। संयोग से उस स्थान पर देवताओं के राजा इंद्र की वायु चली, जिससे उनके वस्त्र आपस में मिल गए। वस्त्रों को पहचानने में हुए भ्रम के कारण दोनों के बीच विवाद बढ़ा। वाद–विवाद इतना बढ़ा कि राजकुमारी शर्मिष्ठा ने क्रोध में आकर देवयानी को कुआँ में धकेल दिया। सहेलियाँ भय से भाग गईं और देवयानी कुएँ में फँसी रहीं।
ययाति का आगमन और देवयानी का उद्धार
संयोगवश उसी समय चंद्रवंशी राजा ययाति, जो राजा नहुष के पुत्र थे, वन में विचरण कर रहे थे। जब उन्होंने कुएँ में गिरने की आवाज़ सुनी, तो झाँककर देखा और देवयानी को बाहर निकालकर बचाया। देवयानी ययाति की सौम्यता से प्रभावित हुई और उन्हें अपना पति बनाने का निश्चय किया।
उधर शुक्राचार्य ने जब अपनी पुत्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की बात सुनी, तो वृषपर्वा के सामने क्रोध से भर उठे। असुर गुरु के श्राप से भयभीत होकर वृषपर्वा ने शर्मिष्ठा को अपनी दासी के रूप में देवयानी के साथ भेजने का निर्णय लिया। यह निर्णय आगे चलकर कथा का सबसे बड़ा मोड़ बनता है।
देवयानी और ययाति का विवाह
देवयानी शुक्राचार्य के साथ ययाति के पास पहुँचीं। वहाँ उन्होंने ययाति से विवाह की इच्छा जताई। शुक्राचार्य ने भी इस विवाह को उचित माना, किंतु एक कठोर शर्त के साथ “ययाति कभी भी शर्मिष्ठा के साथ संबंध स्थापित नहीं करेंगे।”
ययाति ने यह प्रतिज्ञा स्वीकार कर देवयानी से विवाह कर लिया और उसे अपने राज्य में सम्मान के साथ रानी बनाकर ले आए। शर्मिष्ठा दासी के रूप में देवयानी के साथ ही रहती रही।
शर्मिष्ठा का अनुरोध और नैतिक संघर्ष
समय बीता और शर्मिष्ठा के मन में भी एक स्त्री का स्वाभाविक अधिकार मातृत्व की इच्छा जाग उठी। उसने ययाति से एक दिन विनती की कि वह उन्हें संतान प्राप्त करने में सहायता दें, क्योंकि वह दासी होते हुए भी राजा की सेवा और निष्ठा का धर्म निभा रही है।
ययाति ने पहले इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया, क्योंकि उन्होंने देवयानी और शुक्राचार्य से वचन दिया था। लेकिन शर्मिष्ठा की प्रार्थना, समर्पण और भावनाओं को देखकर वे विचलित हो गए। अंततः उन्होंने वचनभंग कर शर्मिष्ठा के साथ संबंध स्थापित किए। कुछ समय बाद शर्मिष्ठा तीन पुत्रों की माता बनी।
सत्य का पता चलना और देवयानी का क्रोध
जब देवयानी को यह सच्चाई पता चली तो वह दीप की लौ की तरह भड़क उठीं। यह केवल पति का विश्वासघात ही नहीं था, बल्कि उनकी प्रतिद्वंद्वी और दासी पर मिली हुई सफलता का भी अपमान था। देवयानी क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास पहुँचीं और अपने अपमान की कथा सुनाई।
शुक्राचार्य, जो नीति और धर्म के प्रवक्ता थे, परंतु पुत्री के दर्द से विचलित होकर उन्होंने ययाति को भारी श्राप दिया “तू कामभावना से ग्रस्त होकर युवा अवस्था में ही वृद्धत्व प्राप्त करेगा!”
ययाति की विनती और भाग्य परिवर्तन
ययाति ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और कहा कि वह अपने कर्मों के लिए दंड स्वीकार करता है, लेकिन राज्य और परिवार के हित में वह अकाल वृद्धावस्था को सहन नहीं कर सकेगा। शुक्राचार्य ने अपने क्रोध को न्यून किया और एक विकल्प दिया “यदि तुम्हारा कोई पुत्र अपनी युवा अवस्था तुम्हें दे दे, तो तुम पुनः युवा हो सकते हो।”
ययाति के सभी पुत्रों में से पुत्र पुरु ने निस्वार्थ भाव से अपना युवा काल पिता को दे दिया। ययाति फिर से युवा होकर काम, भोग और संसार का भरपूर उपभोग करने लगे।
ययाति का वैराग्य और जीवन का सत्य
लंबे समय तक भोग-विलास में डूबे रहने के बाद भी ययाति को तृप्ति नहीं मिली। अंततः उन्होंने जीवन का गहरा सत्य समझा कि “इच्छाएँ तृप्ति से नहीं, त्याग से समाप्त होती हैं।”
वह युवा अवस्था पुरु को लौटाकर स्वयं वानप्रस्थ चले गए। पुरु को राजा बनाकर उन्होंने उसके त्याग को सर्वोच्च सम्मान दिया। ययाति की इस घटना ने पुरुवंश की स्थापना की, जिसे आगे चलकर भारतवर्ष के अनेक महान राजाओं ने गौरवान्वित किया।
कथा का दार्शनिक संदेश
ययाति–देवयानी–शर्मिष्ठा की कथा मात्र तीन व्यक्तियों का प्रेम–संघर्ष नहीं है, बल्कि यह जीवन के गहरे सिद्धांतों को उजागर करती है –
- अहंकार का पतन
देवयानी और शर्मिष्ठा दोनों अहंकार से भरी थीं। उनकी प्रतिद्वंद्विता ही समस्त घटनाओं का बीज बनी। - वचन का महत्व
ययाति द्वारा दिया गया वचन टूटने पर जन्मा संकट दिखाता है कि वचनभंग से बड़े से बड़ा राजा भी विनाश का पात्र बन सकता है। - इच्छाओं का अंत
ययाति का जीवन बताता है कि इच्छाएँ अनंत हैं, और उन्हें संतुष्ट करने का उपाय त्याग है, न कि भोग। - कर्तव्य और त्याग
पुरु का त्याग न केवल पिता के प्रति आदर का उदाहरण है, बल्कि यह बताता है कि धर्म और कर्तव्य का पालन ही व्यक्ति को महान बनाता है।
ययाति, देवयानी और शर्मिष्ठा की कथा अनेक स्तरों पर मानवीय मनोविज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिकता से जुड़ती है। इसमें प्रेम की जटिलता है, वचन की मर्यादा है, कर्म का दंड है, और अंत में प्राप्त होने वाली आत्मचेतना भी। यह हमें सिखाती है कि जीवन के मूल में संतोष और संयम ही वास्तविक सुख का मार्ग खोलते हैं।






