जरत्कारु ऋषि और आस्तिक ऋषि: तप, कर्तव्य और नाग जाति के उद्धार की महान कथा
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। भारतीय पौराणिक साहित्य, विशेष रूप से महाभारत के आदिपर्व में, महर्षि जरत्कारु और उनके पुत्र आस्तिक ऋषि का वृत्तांत धर्म, तपस्या, पितृ-ऋण (पूर्वजों के प्रति कर्तव्य) और क्षमाशीलता के उच्च आदर्शों का एक महत्वपूर्ण आख्यान है। यह कथा न केवल एक ऋषि के व्यक्तिगत संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि सर्प जाति के विनाश को रोकने वाले एक ऐतिहासिक घटनाक्रम की भी पृष्ठभूमि तैयार करती है।
जरत्कारु ऋषि: तपस्या, वंश और पितृ-ऋण का संकट
नाम की व्युत्पत्ति और कठोर तप
महर्षि जरत्कारु का नामकरण उनकी जीवनशैली और तपस्या की कठोरता को दर्शाता है। संस्कृत में, ‘जरत्’ का अर्थ है ‘जीर्ण’, ‘क्षीण’, या ‘कमजोर’, और ‘कारु’ का अर्थ है ‘करने वाला’। इस प्रकार, जरत्कारु का अर्थ हुआ ‘वह जिसने तपस्या द्वारा अपने शरीर को क्षीण कर लिया हो’। उनका जीवन कठोर ब्रह्मचर्य, अल्पाहार (केवल वायु सेवन), और निरंतर भ्रमण (यायावर वृत्ति) में व्यतीत होता था। उनका दृढ़ संकल्प था कि वह अखंड ब्रह्मचर्य का पालन कर सीधे स्वर्ग प्राप्त करेंगे, और इसलिए उन्होंने विवाह न करने की प्रतिज्ञा ली थी। वे यायावर नामक प्रतिष्ठित ऋषि कुल से संबंधित थे।
पितरों से भेंट और वंश-विनाश का भय
एक दिन, अपनी यात्रा के दौरान, जरत्कारु ऋषि ने एक भयानक दृश्य देखा। उन्होंने देखा कि उनके पितर (पूर्वज) एक गहरे गड्ढे में उल्टे लटके हुए हैं। वे सभी एक मात्र खस के तिनके की जड़ को पकड़कर लटके हुए थे, और उस तिनके को एक चूहा लगातार कुतर रहा था। इस दयनीय अवस्था को देखकर ऋषि करुणा से भर उठे।
पितरों ने ऋषि को बताया कि वे उनके ही पूर्वज हैं, और उन्हें यह दुख इसलिए भोगना पड़ रहा है क्योंकि उनके वंश में केवल एक ही व्यक्ति शेष है—उनका पुत्र जरत्कारु। उन्होंने कहा कि उनका वह पुत्र तपस्वी तो बन गया, किंतु उसने विवाह करके वंश परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया।
प्रतीकवाद:
खस का तिनका: यह जरत्कारु ऋषि के अविवाहित होने के कारण उनके वंश का एकमात्र और कमजोर सहारा था।
चूहा: यह महाबली काल (समय) का प्रतीक था, जो धीरे-धीरे वंश की अंतिम कड़ी (जरत्कारु) को भी नष्ट कर रहा था।
उल्टे लटके पितर: यह वंशहीनता के कारण प्राप्त होने वाले नरक की स्थिति थी।
पितरों ने जरत्कारु से उनकी सारी तपस्या का फल देने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि तपस्या का बल तो उनके पास भी है, किंतु वंश-परंपरा के नाश के कारण वे इस घोर संकट में हैं। उन्होंने ऋषि से विवाह करने और वंश को बचाने का आग्रह किया। अपने पूर्वजों की आज्ञा और उनके प्रति कर्तव्य-बोध से विवश होकर, जरत्कारु ने अपनी ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा को त्यागकर विवाह करने का निर्णय लिया।
नागवंश से संबंध और आस्तिक ऋषि का गर्भ में आगमन
नागराज वासुकि की प्रतिज्ञा और चिंता
जिस समय जरत्कारु ऋषि विवाह के लिए विवश हुए, उसी समय नागराज वासुकि भी एक बड़ी चिंता से ग्रस्त थे। कद्रू के श्राप के कारण (जो नागों की माता थीं), नागवंश पर आने वाले समय में राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्पदाह यज्ञ का संकट मंडरा रहा था। यह भविष्य नागों के संहार का था। ब्रह्मा जी ने स्वयं वासुकि को बताया था कि नागों का उद्धार केवल जरत्कारु ऋषि से उनकी बहन के विवाह द्वारा उत्पन्न पुत्र ही कर सकता है।
विवाह की कठोर शर्तें
नागराज वासुकि ने अपने दूतों के माध्यम से ऋषि जरत्कारु को खोजा और अपनी बहन जरत्कारु (जिसे बाद में मनसा देवी के नाम से जाना गया) का विवाह उनसे करने का प्रस्ताव रखा। ऋषि ने अपनी शर्तों पर अटल रहते हुए तीन मुख्य शर्तें रखीं:
- वह पत्नी का भरण-पोषण नहीं करेंगे और न ही धन देंगे।
- वह स्वयं कन्या की याचना नहीं करेंगे, बल्कि जो उन्हें कन्या देगा, उसी से विवाह करेंगे (वासुकि ने यह शर्त पूरी की)।
- यदि उनकी पत्नी ने कभी भी उनका अपमान किया या उनके मन के प्रतिकूल कोई कार्य किया, तो वे उसे उसी क्षण त्याग कर चले जाएंगे।
वासुकि ने नागवंश के भविष्य की रक्षा के लिए सभी शर्तों को स्वीकार कर लिया।
शर्त भंग और पति द्वारा त्याग
विवाह के उपरांत, नाग कन्या जरत्कारु शीघ्र ही गर्भवती हो गईं। एक दिन, ऋषि जरत्कारु अपनी पत्नी की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। सूर्यास्त का समय हो गया, और यदि ऋषि समय पर नहीं उठते तो उनकी संध्या वंदन का नियम भंग हो जाता।
नाग कन्या धर्म-संकट में पड़ गईं। ऋषि को जगाना उनकी शर्त का उल्लंघन था (“मन के प्रतिकूल कार्य”), जबकि न जगाना पति के धर्म (संध्या वंदन) का उल्लंघन था। उन्होंने धर्म को प्राथमिकता देते हुए ऋषि को जगाकर संध्या करने का अनुरोध किया।
जागने पर जरत्कारु ऋषि को अत्यंत क्रोध आया। उन्होंने इसे अपना घोर अपमान माना, यह घोषणा करते हुए कि सूर्य में इतनी शक्ति नहीं कि वह उनकी उपासना के बिना अस्त हो जाए। अपनी शर्त के अनुसार, उन्होंने उसी क्षण अपनी गर्भवती पत्नी को त्याग दिया और वन की ओर प्रस्थान किया। नाग कन्या ने अत्यंत शोकपूर्वक ऋषि से प्रार्थना की कि वे उनके गर्भ में पल रहे संतान को देखकर जाएं, जो नागों की रक्षा के लिए ही जन्मा है। इस पर ऋषि ने केवल इतना कहा: “तुम्हारे गर्भ में ‘अस्ति’ (है) यानी एक तेजस्वी और महान पुत्र मौजूद है। वह अपने कुल और मातृकुल का उद्धार करेगा।” यह कहकर ऋषि चले गए।
आस्तिक ऋषि का जन्म और नागसत्र यज्ञ का समापन
नामकरण और शिक्षा
अपने पति द्वारा त्यागी गई नाग कन्या जरत्कारु अपने भाई वासुकि के पास लौट आईं। उन्होंने शीघ्र ही एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम पिता के अंतिम शब्द ‘अस्ति’ पर आधारित होकर आस्तिक रखा गया। आस्तिक नाम का अर्थ है ‘जो अस्तित्व में विश्वास रखता हो’ (आस्तिक)। नागलोक में उनका पालन-पोषण हुआ। उन्होंने बाल्यकाल में ही महर्षि च्यवन जैसे विद्वानों से वेदों, वेदांगों, और नीतिशास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया था। उनकी असाधारण मेधा और सात्विक बुद्धि ने उन्हें अल्पायु में ही एक सिद्ध ऋषि बना दिया।
जनमेजय का नागदाह यज्ञ
इधर पृथ्वी पर पांडुवंश के राजा जनमेजय (अर्जुन के पौत्र परीक्षित के पुत्र) का शासन था। परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए, जनमेजय ने पृथ्वी से संपूर्ण नाग जाति का समूल नाश करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने पुरोहितों के नेतृत्व में एक महायज्ञ का आयोजन किया, जिसे ‘नागदाह यज्ञ’ या ‘सर्प सत्र यज्ञ’ कहा गया। इस यज्ञ के मंत्र इतने शक्तिशाली थे कि नाग जाति के सर्प, उनके नाम के उच्चारण मात्र से, आकाश में खिंचते चले आते थे और भयानक चीखों के साथ यज्ञ कुंड की अग्नि में भस्म हो जाते थे। नागों का संहार होने लगा, और तक्षक नाग भी भयभीत होकर देवराज इंद्र की शरण में चला गया।
आस्तिक का यज्ञ-मंडप में प्रवेश और वरदान
नागवंश पर आए इस महासंकट से वासुकि अत्यंत व्याकुल हो उठे। उन्होंने अपनी बहन जरत्कारु को ब्रह्मा के वचन की याद दिलाई और आस्तिक को यज्ञ रोकने के लिए प्रेरित किया।
आस्तिक मुनि ने हस्तिनापुर जाकर यज्ञ-मंडप में प्रवेश किया। उन्होंने अपनी मधुर और ज्ञानपूर्ण वाणी से राजा जनमेजय, पुरोहितों, और सभासदों की ऐसी स्तुति की, जो धर्म, यज्ञ, और राजा के शौर्य का बखान करती थी। आस्तिक के ज्ञान और तपस्या से प्रभावित होकर, राजा जनमेजय ने उन्हें वरदान मांगने को कहा।
आस्तिक ने विनम्रतापूर्वक वरदान के रूप में यज्ञ को तत्काल समाप्त करने का आग्रह किया। पहले तो राजा क्रुद्ध हुए और उन्हें धन, सोना, और अन्य वस्तुएं लेने को कहा, किंतु आस्तिक अपनी मांग पर अटल रहे। अंततः, उपस्थित ऋषियों और विद्वानों के समझाने पर, राजा जनमेजय ने विवश होकर आस्तिक के वचन का सम्मान किया और सर्प सत्र यज्ञ को तत्काल रोक दिया। इस प्रकार, आस्तिक ऋषि ने नागों को अभयदान दिया, और तक्षक नाग सहित संपूर्ण नाग जाति के अस्तित्व की रक्षा की।
सर्प भय से मुक्ति का महाभारत में दिया गया मंत्र
आस्तिक मुनि द्वारा नाग यज्ञ को रोके जाने के बाद, सर्पों ने आस्तिक से वरदान मांगा कि जो मनुष्य उनका नाम स्मरण करेगा, उसे नागों से कोई भय नहीं होगा। इस पर आस्तिक ने सर्पों को वचन दिया और यह उपाख्यान (कथा) दिया कि जो भी इस कथा का पाठ करेगा या उससे संबंधित मंत्रों का स्मरण करेगा, वह सर्प भय से मुक्त होगा। महाभारत के आदिपर्व में वर्णित कुछ मुख्य मंत्र और श्लोक इस प्रकार हैं, जिनका जाप या स्मरण सर्प दंश के भय को समाप्त करने वाला माना जाता है:
आस्तिक का स्मरण मंत्र (असुरक्षा के समय):
आस्तीकः सर्पसत्रे वः पन्नगान् योऽभ्यरक्षत।
तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ॥
अर्थ: (हे महाभाग सर्पों!) जरत्कारु ऋषि से जरत्कारु नाग कन्या में जो आस्तिक नामक यशस्वी ऋषि उत्पन्न हुए और जिन्होंने सर्प यज्ञ में तुम सर्पों की रक्षा की, मैं उनका स्मरण कर रहा हूँ। अतः तुम लोग मुझे हानि न पहुँचाओ।
सर्प को जाने का आदेश (आस्तिक वचन):
सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर॥
अर्थ: हे महाविषधर सर्प! तुम भाग जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। तुम जनमेजय के यज्ञ के अंत में दिए गए आस्तिक के वचन को याद करो।
नागों के लिए शाप/प्रतिज्ञा:
आस्तिकस्य वचः श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते।
शतधा भिद्यते मूर्ध्नि शिंशवृक्षफलं यथा॥
अर्थ: जो सर्प आस्तिक के वचन की शपथ सुनने के बाद भी (वहां से) नहीं लौटेगा, उसका सिर शिंशवृक्ष (शीशम) के फल की तरह सौ टुकड़ों में फट जाएगा।
इन श्लोकों के अलावा, नागों द्वारा आस्तिक को यह वर भी दिया गया था कि जो मनुष्य असित, आर्तिमन्त और सुनीत नामक नागों का स्मरण दिन या रात में करेगा, उसे भी सर्प भय नहीं होगा।
चंद्रवंशियों (सोमवंशियों) में आस्तिक ऋषि का स्थान
आस्तिक ऋषि का संबंध चंद्रवंश से कर्म के आधार पर स्थापित होता है, जो उन्हें इस राजवंश के इतिहास में एक अविस्मरणीय हस्तक्षेपकर्ता का स्थान देता है।
- हस्तक्षेपकर्ता और वंश का रक्षक
राजा जनमेजय चंद्रवंश के कुरु कुल से संबंधित थे (परीक्षित के पुत्र, अभिमन्यु के पौत्र, अर्जुन के प्रपौत्र)। नागदाह यज्ञ जनमेजय द्वारा किया गया एक भयानक प्रतिशोधात्मक कार्य था। यदि यह यज्ञ पूर्ण होता, तो यह न केवल नाग जाति का विनाश करता, बल्कि राजधर्म और न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता।
आस्तिक ऋषि ने अपनी मेधा, ज्ञान और धर्म के बल पर एक चंद्रवंशी राजा को प्रतिशोध की विनाशकारी राह से रोका। उन्होंने एक राजा को अहिंसा और क्षमा का महत्व समझाया, जो चंद्रवंश के आदर्शों (विशेषकर भगवान कृष्ण द्वारा स्थापित) के अनुरूप था। - धर्माचार्य और पूजनीय पद
हालांकि आज के समय में चंद्रवंश से जुड़े विभिन्न समुदाय आस्तिक ऋषि की सीधी वंश पूजा नहीं करते, उन्हें एक महान धर्माचार्य और ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में सम्मान दिया जाता है। - सामाजिक प्रासंगिकता
आस्तिक ऋषि का स्थान राजधर्म के नैतिक संतुलन को बनाए रखने वाले ऋषि के रूप में है, जिसने राजा को व्यक्तिगत प्रतिशोध से ऊपर उठकर समग्र प्रजा (नाग जाति) के हित में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। यह उन्हें एक ऐसा धार्मिक स्तंभ बनाता है, जिसका स्मरण प्रत्येक वंश के लोगों के लिए कर्तव्य पालन और क्षमाशीलता के प्रतीक के रूप में आवश्यक है।
आस्तिक ऋषि की आधुनिक पूजा-अर्चना का स्वरूप
आस्तिक ऋषि की पूजा-अर्चना का स्वरूप सीधे तौर पर उनके सर्पों के संरक्षक होने के कार्य से जुड़ा हुआ है, जिसके कारण उन्हें एक विशिष्ट धार्मिक पहचान प्राप्त है। उनकी पूजा मुख्य रूप से सर्प भय से मुक्ति और नागों के सम्मान के लिए की जाती है, जो कि किसी विशिष्ट समुदाय तक सीमित न होकर व्यापक भारतीय जनमानस में व्याप्त है।
सबसे पहले, आस्तिक मुनि को सर्प भय से मुक्ति दिलाने वाले देवता या मुनि के रूप में पूजा जाता है। यह पूजा मुख्य रूप से नागों के भक्त करते हैं, साथ ही वे व्यक्ति भी करते हैं जिन्हें सर्प दंश का खतरा होता है या जो सर्प भय वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
उनकी पूजा का विशेष दिवस नाग पंचमी है, जो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन आस्तिक ऋषि ने राजा जनमेजय के नागदाह यज्ञ को रुकवाकर नाग जाति को अभयदान दिया था, और तभी से यह दिन नागों की पूजा और रक्षा के दिवस के रूप में मनाया जाता है।
एक सबसे महत्वपूर्ण प्रचलित मान्यता यह है कि सर्प दंश से बचाव के लिए आज भी भारत के कई हिस्सों में लोग अपने घरों की बाहरी दीवारों पर यह वाक्य लिखते हैं: “आस्तिक मुनि की दुहाई” या “आस्तिक मुनि की आन है।” यह वाक्य नागों को दिए गए आस्तिक मुनि के वचन का स्मरण कराता है कि जहाँ उनका नाम लिखा होगा, वहाँ नाग दंश नहीं करेंगे। नाग भी इस वचन से बंधे हुए माने जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, भारत में कुछ स्थानों पर उन्हें समर्पित मंदिर भी हैं, जैसे कि उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में आस्तिक देव मंदिर, जहाँ सावन माह की चतुर्थी को विशेष मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु सर्प दोषों से मुक्ति के लिए उनकी आराधना करते हैं। इस प्रकार, आस्तिक ऋषि की पूजा-अर्चना का स्वरूप उनके महान परोपकारी कार्य और नागों के साथ उनके शाश्वत संबंध पर केंद्रित है।
जरत्कारु ऋषि और आस्तिक ऋषि की कथा भारतीय धर्मग्रंथों में एक अत्यंत मूल्यवान अध्याय है। यह जरत्कारु ऋषि की तपस्या की कठोरता और पितृ-ऋण के प्रति उनके महान कर्तव्य-बोध से शुरू होती है, और आस्तिक ऋषि के ज्ञान, क्षमा, और असाधारण कूटनीति से समाप्त होती है, जिसने एक पूरे वंश (नाग जाति) को विनाश से बचाया। आस्तिक ऋषि ने यह सिद्ध किया कि धर्म, ज्ञान और विवेक का बल, राज्यसत्ता और प्रतिशोध की भावना से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। आज भी उनका स्मरण और उनके वचन सर्प भय से मुक्ति दिलाने वाले एक दिव्य कवच के रूप में पूजनीय हैं, और वह भारतीय इतिहास में नैतिकता और दया के सबसे महान प्रतीक माने जाते हैं।






