मोक्षदा एकादशी, पिता के उद्धार और मोक्ष का उपव्रत
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री।
सनातन धर्म में एकादशी तिथि को प्रभु विष्णु की उपासना का श्रेष्ठ दिवस माना गया है। वर्षभर में आने वाली चौबीस एकादशियों में से “मोक्षदा एकादशी” विशेष महत्व रखती है। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी केवल उपासक का ही नहीं, बल्कि उसके पूर्वजों का भी उद्धार करने वाली बताई गई है। यह व्रत मानव जीवन के उच्च लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति का सुलभ और पवित्र माध्यम है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मोक्ष की इच्छा रखने वाले, पितरों का उद्धार चाहने वाले और पाप-क्षय की आकांक्षा रखने वाले सभी जन इस व्रत का पालन श्रद्धा से करते हैं।
व्रत कथा
एक दिन अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए विनम्र स्वर में निवेदन किया “हे प्रभु! आपने कृष्ण पक्ष की एकादशी का महत्व विस्तार से बताया। अब कृपा करके मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी के विषय में भी बताएं, उसका नाम, उपास्य देवता, विधि तथा फल क्या है।”
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले “हे अर्जुन! तुमने अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी मोक्षदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन श्रीदामोदर भगवान की उपासना करने से बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और नारकीय वेदनाओं से ग्रस्त पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यह व्रत मनुष्य को मोक्ष प्रदान करने वाला है।”
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने एक प्राचीन कथा सुनाई
पुरातन काल में वैखानस नामक एक धर्मशील राजा राज्य करता था। उसके राज्य में वेद-वेदांग के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे और प्रजा सुखी थी। एक रात्रि राजा ने स्वप्न में अपने पिता को अत्यंत दुःखद नरक-यातनाएँ भोगते देखा। पिता ने व्याकुल होकर राजा से कहा “पुत्र! मेरे पापों के कारण मैं घोर कष्ट झेल रहा हूँ, मुझे यहां से मुक्त करो।”
स्वप्न से जागते ही राजा का हृदय विषाद से भर गया। न राज्य प्रिय लगा, न ऐश्वर्य। सुबह होते ही उसने ब्राह्मणों को बुलाकर अपना दु:स्वप्न बताया और अपने पिता के उद्धार का उपाय पूछा। ब्राह्मणों ने विचार कर कहा “राजन, वर्तमान, भूत और भविष्य के ज्ञाता पर्वत मुनि सब जानते हैं। उनसे मार्गदर्शन लें।” राजा तुरंत ही पर्वत मुनि के आश्रम पहुँचा। महर्षि ने उसे स्नेहपूर्वक बैठाया। राजा ने अपने स्वप्न और अपने पिता के दु:ख का वर्णन कर उपाय की याचना की।
कुछ देर ध्यानमग्न रहने के बाद पर्वत मुनि बोले “हे राजन! तुम्हारे पिता ने पूर्व जन्म में अपनी पत्नियों में भेदभाव किया था; इसी अधर्म फलस्वरूप वह नरक में गए। परंतु उनके उद्धार का सरल उपाय है, मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी। तुम इस व्रत को श्रद्धा से करो और इसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दो। इससे उनका उद्धार निश्चित है।”
व्रत का फल
राजा वैखानस ने पूरे नियम-विधान से मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और अपने तप तथा उपवास का पुण्य अपने पिता को समर्पित कर दिया। तुरंत स्वर्गीय विमानों के साथ उसके पिता प्रकट हुए और आशीर्वाद देते हुए बोले “पुत्र! तुम्हारे व्रत-फल से मुझे मुक्ति मिली। तुम्हारा कल्याण हो।” इतना कहकर वे स्वर्ग लोक को चले गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा “हे पाण्डुपुत्र! यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है। जो इसे भक्ति से करते हैं, वे उत्तम लोकों की प्राप्ति करते हैं। इसका श्रवण और पठन भी मनुष्य को अनंत फल प्रदान करता है।”
कथा–सार
मोक्षदा एकादशी व्रत केवल व्यक्तिगत पवित्रता का साधन नहीं, बल्कि पितरों तथा प्रियजनों के उद्धार का अद्भुत माध्यम है।
यह व्रत –
पापों का क्षय करता है
पितरों को स्वर्गीय गति देता है
उपासक को मोक्ष-साधना में स्थिरता देता है
मन, कर्म और विचारों को पवित्र बनाता है
जो साधक श्रद्धा से इस एकादशी का पालन करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।







