वास्तु की 10 दिशाएं: आपकी सफलता का गुप्त कोड

संवाद 24 डेस्क। प्राचीन भारतीय विज्ञान, वास्तु शास्त्र, केवल भवन निर्माण का तरीका नहीं है; यह ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के साथ मानव जीवन को संतुलित करने का एक दर्शन है। वास्तु का आधार दिशाएँ हैं, जो प्रकृति के तत्वों और दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

अधिकांश लोग केवल चार या आठ दिशाओं के बारे में जानते हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र में दस दिशाएँ होती हैं, और प्रत्येक दिशा का हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं स्वास्थ्य, धन, संबंध और करियर पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

मुख्य दिशाएँ (The Cardinal Directions)
ये चार दिशाएँ सबसे मूलभूत हैं और किसी भी संरचना के ऊर्जा प्रवाह को निर्धारित करती हैं।

  1. पूर्व (East)
    अधिष्ठाता देव: इंद्र और सूर्य देव।
    प्रतिनिधित्व: समृद्धि, स्वास्थ्य, प्रकाश, और वंश वृद्धि। यह दिशा जीवन की शुरुआत और नई ऊर्जा का प्रतीक है।
    वास्तु उपयोग: घर का मुख्य द्वार, लिविंग रूम, या पूजा घर इस दिशा में होना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिशा में खिड़कियाँ और बालकनी होने से सुबह की सूर्य ऊर्जा (पॉजिटिव आयन) घर में आती है।
    टालने योग्य: इस दिशा में भारी निर्माण, सीढ़ियाँ, या शौचालय नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि यह प्रगति और स्वास्थ्य को अवरुद्ध करता है।
  2. पश्चिम (West)
    अधिष्ठाता देव: वरुण देव (जल के देवता)।
    प्रतिनिधित्व: स्थिरता, संतुष्टि, व्यावसायिक सफलता और भाग्य। यह दिशा जीवन के अंत या आराम की ओर संकेत करती है।
    वास्तु उपयोग: इस दिशा में डाइनिंग रूम, ओवरहेड वॉटर टैंक (यदि आवश्यक हो), या बच्चों का कमरा बनाया जा सकता है।
    टालने योग्य: प्रवेश द्वार या मुख्य बेडरूम (मास्टर बेडरूम) को पश्चिम दिशा में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि यह कुछ मामलों में अस्थिरता ला सकता है।
  3. उत्तर (North)
    अधिष्ठाता देव: कुबेर (धन के देवता) और बुध (ज्ञान)।
    प्रतिनिधित्व: धन, संपत्ति, करियर में प्रगति, नए अवसर और व्यापार। इसे वास्तु में सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय दिशा माना जाता है।
    वास्तु उपयोग: कैशियर काउंटर, लॉकर (मुख उत्तर की ओर), अध्ययन कक्ष, या मुख्य प्रवेश द्वार के लिए यह दिशा सर्वोत्तम है।
    टालने योग्य: रसोई या शौचालय इस दिशा में बनाने से धन और अवसरों का नुकसान होता है।
  4. दक्षिण (South)
    अधिष्ठाता देव: यमराज (मृत्यु/अनुशासन के देवता)।
    प्रतिनिधित्व: आराम, ख्याति, और दृढ़ता। यह दिशा स्थिरता और शांति प्रदान करती है।
    वास्तु उपयोग: मास्टर बेडरूम (मालिक के लिए), स्टोर रूम, या सीढ़ियाँ बनाने के लिए यह दिशा आदर्श है, क्योंकि यहाँ भारी निर्माण से सकारात्मक स्थिरता आती है।
    टालने योग्य: प्रवेश द्वार या जल से संबंधित कोई भी तत्व (सेप्टिक टैंक/बोरवेल) इस दिशा में नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह स्वास्थ्य और वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

उप-दिशाएँ/कोणीय दिशाएँ (The Inter-Cardinal Directions)
ये चार दिशाएँ मुख्य दिशाओं के तत्वों और ऊर्जाओं को जोड़कर एक विशेष परिणाम उत्पन्न करती हैं।

  1. ईशान कोण (North-East)
    अधिष्ठाता देव: शिव और बृहस्पति।
    प्रतिनिधित्व: ज्ञान, बुद्धि, मन की शांति और आध्यात्मिकता। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश द्वार है।
    वास्तु उपयोग: पूजा घर, ध्यान कक्ष, या बच्चों के पढ़ने का कमरा इस कोण में होना अत्यंत शुभकारी है। इस कोने को हमेशा साफ और हल्का रखना चाहिए।
    टालने योग्य: इस सबसे पवित्र कोण में शौचालय, जूते-चप्पल या कूड़ादान रखना गंभीर वास्तु दोष उत्पन्न करता है।
  2. आग्नेय कोण (South-East)
    अधिष्ठाता देव: अग्नि देव (अग्नि तत्व)।
    प्रतिनिधित्व: ऊर्जा, स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और नकदी का प्रवाह।
    वास्तु उपयोग: रसोई (अग्नि तत्व के कारण) या विद्युत मीटर/जनरेटर रखने के लिए यह कोण सबसे उत्तम है।
    टालने योग्य: इस कोण में जल तत्व (भूमिगत टैंक, बोरवेल) या सोने का कमरा (बेडरूम) नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह ऊर्जा को अस्थिर कर सकता है और कलह पैदा कर सकता है।
  3. नैऋत्य कोण (South-West)
    अधिष्ठाता देव: निरृति/पृथ्वी तत्व।
    प्रतिनिधित्व: स्थिरता, रिश्ते (संबंध), सुरक्षा और जीवन में दक्षता।
    वास्तु उपयोग: मास्टर बेडरूम, तिजोरी या भारी निर्माण के लिए यह दिशा सर्वोत्तम है। यह गृहस्वामी को स्थिरता और दीर्घायु प्रदान करता है।
    टालने योग्य: इस कोण में प्रवेश द्वार, खुला स्थान, या सेप्टिक टैंक नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह रिश्तों में अस्थिरता और दुर्घटना का कारण बन सकता है।
  4. वायव्य कोण (North-West)
    अधिष्ठाता देव: वायु देव और चंद्रमा।
    प्रतिनिधित्व: सामाजिक समर्थन, संपर्क, यात्रा, और परिवर्तनशीलता।
    वास्तु उपयोग: तैयार माल का भंडारण, गेस्ट रूम, या अविवाहित लड़कियों का कमरा बनाने के लिए यह दिशा अच्छी है।
    टालने योग्य: गृहस्वामी का बेडरूम इस दिशा में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वायु तत्व के कारण वहाँ रहने वाला व्यक्ति चंचल हो सकता है।

ऊर्ध्वाधर दिशाएँ (The Vertical Directions)
वास्तु शास्त्र में इन दो दिशाओं को प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि ये ऊर्जा के ऊर्ध्वाधर प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  1. ऊर्ध्व (Up/Zenith)
    अधिष्ठाता देव: ब्रह्मा (अंतरिक्ष तत्व)।
    प्रतिनिधित्व: ब्रह्मांडीय ऊर्जा, कनेक्शन, और सर्वोच्च चेतना। यह घर की छत और ऊपर के आकाश का प्रतिनिधित्व करती है।
    वास्तु उपयोग: घर का ब्रह्मस्थान (केंद्र)। इस स्थान को खुला, साफ और अवरोधों से मुक्त रखना चाहिए ताकि ऊर्जा का ऊर्ध्वाधर प्रवाह सुचारु रहे।
    टालने योग्य: ब्रह्मस्थान में सीढ़ियाँ, खंभे, या कोई भारी निर्माण नहीं होना चाहिए।
  2. अधो (Down/Nadir)
    अधिष्ठाता देव: शेषनाग/पाताल लोक।
    प्रतिनिधित्व: पृथ्वी तत्व का आंतरिक भाग, स्थिरता और नींव। यह घर के फर्श और नींव के नीचे की भूमि का प्रतिनिधित्व करती है।
    वास्तु उपयोग: नींव को मजबूत रखना और किसी भी प्रकार के नकारात्मक या प्रदूषित तत्वों से मुक्त रखना। भूमिगत जल स्रोत (जैसे बोरवेल) को केवल ईशान कोण में ही अनुमति दी जाती है।
    टालने योग्य: घर की नींव में दरारें या दोष नहीं होने चाहिए, क्योंकि यह घर की स्थिरता और सुरक्षा को खतरे में डालता है।

संतुलन ही सफलता है
वास्तु शास्त्र के अनुसार, एक सुखी और सफल जीवन के लिए आवश्यक है कि इन दसों दिशाओं के तत्व और ऊर्जाएँ एक-दूसरे के साथ सद्भाव में रहें। किसी भी दिशा में असंतुलन, चाहे वह अनुचित निर्माण हो या गलत रंग का उपयोग, जीवन के संबंधित पहलू में नकारात्मक परिणाम ला सकता है। इन नियमों का पालन करके, हम अपने आवास को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक शक्तिशाली संवाहक बना सकते हैं, जो निवासियों के लिए स्वास्थ्य, समृद्धि और सफलता सुनिश्चित करता है।

Samvad 24 Office
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