संघ के 100 वर्ष: जब प्रतिबंध के दौर में एबीवीपी बन गई RSS की छाया
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों के सफर में कई ऐसे प्रसंग छिपे हैं, जिन्होंने संगठन को न सिर्फ दिशा दी बल्कि उसके विस्तार का रास्ता भी तैयार किया। इन्हीं प्रसंगों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के जन्म और उसकी प्रारंभिक भूमिकाओं से जुड़ा है। वह दौर, जब प्रतिबंध के कारण RSS के अधिकारी खुले मंच पर गतिविधियां नहीं चला सकते थे, और विद्यार्थी परिषद ही उनकी बैठकों व अभियानों का प्रमुख माध्यम बनी।
आज राजनीति के बदलते परिदृश्य में विद्यार्थी परिषद पर जितनी नजरें रहती हैं, शायद ही किसी अन्य छात्र संगठन पर रहती हों। इसके पीछे कारण भी स्पष्ट हैं। पिछले ढाई दशकों में भारतीय राजनीति में उभरे ज्यादातर कद्दावर चेहरे अमित शाह, अरुण जेटली, जगत प्रकाश नड्डा, सुनील बंसल, मोहन यादव, पुष्कर सिंह धामी, सभी की वैचारिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि का एक बुनियादी सूत्र छात्र राजनीति और ABVP से जुड़ता है। संघ परिवार के नेतृत्व में भी ABVP के पुराने कार्यकर्ताओं को लगातार बड़ी भूमिकाएँ सौंपी जाती रही हैं। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले हों या अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर दोनों विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे हैं। परिषद के वरिष्ठ प्रचारक वरिष्ठ संगठन विश्व हिंदू परिषद, किसान संघ जैसे संगठनों में भेजे जाते रहे।
लेकिन यह आज की कहानी नहीं है। यह यात्रा 1940 के दशक के उस कठिन समय में शुरू हुई थी, जब भारत स्वतंत्र हुआ था, पर नए राष्ट्र की दिशा और संरचना को लेकर भ्रम और संघर्ष बराबर जारी था।
एबीवीपी की सोच कैसे बनी? स्वतंत्र भारत में संघ का ‘पुनर्निर्माण’ अभियान
आधुनिक ABVP का संदर्भ समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है। आजादी के बाद RSS ने अपने लिए एक नया लक्ष्य निर्धारित किया, राष्ट्र का पुनर्निर्माण। यह विचार भी उभरा कि यदि देश के विभिन्न आयु वर्ग अपनी-अपनी क्षमता से इस काम में जुड़ें, तो परिवर्तन तेज होगा। चूंकि उस समय तक संघ शाखाओं के विस्तार में विद्यार्थियों की भूमिका अत्यंत प्रमुख थी और कई राज्यों में पहली शाखाओं की स्थापना विद्यार्थियों ने ही करवाई, इसलिए अलग छात्र संगठन बनाने की जरूरत पहले महसूस नहीं हुई।
लेकिन स्वतंत्रता के बाद की हलचल, राजनीतिक आरोप, सामाजिक अस्थिरता और फिर 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध ने परिस्थितियों को बिल्कुल बदल दिया। यही वह मोड़ था जहां संघ नेतृत्व ने निर्णय लिया कि एक स्वतंत्र छात्र संगठन की आवश्यकता है, जो राष्ट्रीय विचारधारा के आधार पर छात्रों को संगठित कर सके और खुले मंच पर उनकी बात रख सके।
1948: प्रतिबंध का समय और ABVP के जन्म की पृष्ठभूमि
प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित ग्रंथ ‘ध्येय यात्रा’ में साफ लिखा है कि संघ पर लगे प्रतिबंध के तुरंत बाद छात्र संगठन की स्थापना का निर्णय लिया गया। जून 1948 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का विचार जन्म ले चुका था। जुलाई 1948 के पांचजन्य में इसकी घोषणा भी प्रकाशित हो गई, जिसमें कहा गया कि छात्र राजनीति की गुटबंदी और दूषित वातावरण से परेशान देश के “प्रगतिशील तत्वों” ने एक नए विद्यार्थी संगठन की स्थापना का निश्चय किया है।
एबीवीपी का औपचारिक पंजीयन 9 जुलाई 1949 को हुआ। परिषद की वेबसाइट बताती है कि इसका पहला सम्मेलन 1948 में अंबाला में आयोजित हुआ था, जिसमें प्रो. ओमप्रकाश बहल पहले अध्यक्ष और केशव देव वर्मा पहले महामंत्री बने।
इसी अवधि में पंजाब और जम्मू के युवाओं द्वारा गठित ‘स्टूडेंट्स नेशनलिस्ट एसोसिएशन’ नामक एक संगठन भी उभरा, जिसका 1952 में ABVP में विलय कर दिया गया। इससे संगठन का प्रभाव और व्यापक हुआ।
प्रतिबंध के दिनों में RSS की गुप्त बैठकें एबीवीपी के बैनर तले
ABVP की प्रारंभिक भूमिका सिर्फ एक छात्र संगठन तक सीमित नहीं रही। प्रतिबंध के दौरान संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर जेल में थे या कानूनी लड़ाई में व्यस्त। ऐसे में संघ के वरिष्ठ प्रचारक भैयाजी दाणी, बालासाहेब देवरस और अन्य ABVP के मंच, उसके दफ्तर और उसके आयोजनों का उपयोग संघ की रणनीतिक बैठकों के लिए करते थे।
ABVP के पूर्व पदाधिकारी और BJP के वैचारिक स्तंभ रहे के.एन. गोविंदाचार्य ने एक साक्षात्कार में इस दिलचस्प तथ्य का खुलासा किया कि संघ अधिकारियों की गुप्त बैठकें इन्हीं दिनों ABVP के बैनर तले होती थीं। यह वह दौर था, जब संगठन को बचाए रखना ही सबसे बड़ा संघर्ष था, और परिषद ने न सिर्फ यह जिम्मेदारी निभाई बल्कि एक राष्ट्रीय स्तर की पहचान भी बना ली।
संघ के दिग्गज जिन्हें एबीवीपी पदों पर काम करना पड़ा
प्रतिबंध के समय ABVP में संघ के बड़े नेताओं को भी महत्वपूर्ण पद संभालने पड़े। जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर बताते हैं कि दत्तोपंत ठेंगड़ी विद्यार्थी परिषद के विदर्भ प्रांत में संगठन मंत्री बनाए गए।अटल बिहारी वाजपेयी खुद संयुक्त प्रांत में परिषद के ‘भारतीयकरण उद्योग’ अभियान के संयोजक बने। इससे पता चलता है कि प्रतिबंध के दिनों में ABVP की भूमिका कितनी निर्णायक थी। वह सिर्फ छात्रों का संगठन नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय चिंतन और विरोध की आवाज का अग्रिम मोर्चा था।
क्या कारण था कि ABVP की जरूरत पड़ी?
इलाहाबाद से प्रकाशित दो खंडों के अध्ययन “छात्र आंदोलन का इतिहास” के अनुसार यह कहानी और रोचक है। आजादी से ठीक पहले संयुक्त प्रांत में मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने अचानक छात्रों की फीस बढ़ा दी। छात्र संगठनों ने इसका विरोध किया, पर पंत ने छात्रों से बातचीत से साफ इनकार करते हुए कहा “बातचीत बराबरी वालों से होती है, मैं मुख्यमंत्री होते हुए छात्रों से बात कैसे करूं?”
इसके बाद आंदोलन भड़क उठा। 2 अगस्त 1947 को बनारस में आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस गोली चला दी गई। संदेश स्पष्ट था, नई सरकार ने अंग्रेजों की सख्ती को ही जारी रखा है। इसी पृष्ठभूमि में कई छात्र संगठन बने, जिनमें से कुछ बाद के वर्षों में ABVP की मुख्य धारा में शामिल हो गए।
‘नेता नहीं, गुरु मार्गदर्शक हों’ ABVP की संरचना तय हुई
जब संघ से प्रतिबंध हट गया, तब भी यह सवाल बना रहा कि क्या ABVP को आगे बढ़ाया जाए या भंग कर दिया जाए? पर संगठन चलाने वाले कार्यकर्ताओं ने इसे रुकने नहीं दिया।कई चरणों के गहरे चिंतन के बाद ABVP का स्वरूप तय किया गया-
- यह एक स्वतंत्र संगठन होगा, किसी राजनीतिक दल का अंग नहीं।
- संघ से विचार-सहायता और मार्गदर्शन ले सकता है, लेकिन संगठनात्मक रूप से अलग रहेगा।
- प्रत्येक इकाई का अध्यक्ष अध्यापक होगा, ताकि मार्गदर्शन शिक्षा-जगत से मिले, न कि राजनीति से।
- संगठन में अध्यापकों और शिक्षाविदों का महत्वपूर्ण स्थान रहेगा ताकि यह बेकाबू छात्र राजनीति का रूप न ले।
यही कारण है कि ABVP के “आर्किटेक्ट” प्रो. यशवंतराव केलकर माने जाते हैं। बाद के वर्षों में प्रोफेसर राजकुमार भाटिया जैसे अध्यापकों ने अरुण जेटली और रजत शर्मा जैसे नेताओं को भी छात्र जीवन में तैयार किया।
विद्यार्थी परिषद का सबसे बड़ा अभियान ‘भारतीयकरण उद्योग’
1949 में जब संविधान सभा में चर्चाएं चल रही थीं, तब ABVP ने एक बड़ा अभियान शुरू किया, भारतीयकरण उद्योग आंदोलन। अटल बिहारी वाजपेयी इस अभियान के संयुक्त प्रांत प्रभारी थे। इस अभियान के तहत 24 से 31 जुलाई 1949 को एक विशाल जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें 26 लाख लोगों ने भाग लिया। इसमें पूछा गया:
- देश का नाम क्या हो?
- राष्ट्रगीत कौन सा हो?
- विधान की भाषा कौन सी हो?
जनता की राय इस प्रकार रही:
देश के नाम पर –
भारत: 23,72,152
इंडिया: 71,329
विधान की भाषा –
हिंदी: 25,27,364
अंग्रेज़ी: 7,873
राष्ट्रगीत –
वंदेमातरम्: 5,19,435
जन गण मन: 73,472
यह सर्वे इतना प्रभावशाली था कि उसके निष्कर्ष उस समय की राजनीतिक बहसों का हिस्सा बन गए। सबसे रोचक तथ्य यह था कि इस सर्वे में मुस्लिम समाज की भी उल्लेखनीय भागीदारी हुई।
एबीवीपी की वैचारिक लकीर और दिशा: स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता और शिक्षा
‘ध्येय यात्रा’ में प्रकाशित आरंभिक अखबारी कतरनों में एबीवीपी को ऐसे संगठन के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जो
विदेशी सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त,
भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा नीति चाहता है,
राजनीतिक दलों के पिछलग्गू संगठनों से अलग है,
हड़ताल के बजाय रचनात्मक मार्ग अपनाने पर विश्वास रखता है।
इन कतरनों में यह भी लिखा गया था कि विद्यार्थियों ने विदेशी कवियों और नेताओं को ही आदर्श बना लिया है, जबकि भारतीय सांस्कृतिक चिन्तन से दूरी बढ़ रही है। इसलिए एक ऐसे संगठन की जरूरत थी जो राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करे।
1970 का दशक: संपूर्ण क्रांति और एबीवीपी
समय बीतने के साथ ABVP छात्र आंदोलनों के केंद्र में आ गई। गुजरात आंदोलन की सफलता के बाद जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में ABVP की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। यही आंदोलन बाद में सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, हरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे कई राष्ट्रीय नेताओं की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत बना।
प्रतिबंध हटने के बाद संघ का फोकस बदला, पर ABVP अपनी गति से आगे बढ़ता रहा
प्रतिबंध हटने के बाद जनसंघ की स्थापना हो चुकी थी और संघ परिवार के बड़े चेहरे वहां सक्रिय हो गए थे। देश विभाजन की समस्याएं, शरणार्थियों की पीड़ा, गोहत्या विरोधी आंदोलन, इन सबने संघ के ध्यान को अलग दिशाओं में बांटा। लेकिन उल्लेखनीय यह है कि ABVP न तो भंग की गई और न ही उपेक्षित। जो पदाधिकारी संगठन चला रहे थे, वे लगातार मेहनत करते रहे और धीरे-धीरे यह संगठन देश के सबसे प्रभावी छात्र संगठनों में बदल गया।
आज का एबीवीपी: छात्र राजनीति से लेकर वैश्विक मंच तक
ABVP आज दुनिया के कई देशों में WOSY (World Organisation of Students and Youth) के माध्यम से गतिविधियां चला रहा है। उत्तरी पूर्व राज्यों और मुख्यधारा भारत के युवाओं को जोड़ने के लिए SEIL प्रकल्प (Students’ Experience in Interstate Living) इसकी एक अनूठी पहल है। संगठन की यह निरंतर सक्रियता दर्शाती है कि 1948 की परिस्थितियों में उठाया गया एक छोटा कदम आज एक विशाल राष्ट्रीय संगठन में बदल चुका है।
हम कह सकते हैं कि RSS के 100 वर्षों की कहानी में ABVP की भूमिका एक विशेष अध्याय की तरह दर्ज है, एक ऐसा अध्याय, जहां छात्र शक्ति न सिर्फ राष्ट्र-निर्माण का आधार बनी, बल्कि प्रतिबंध के कठिन समय में संघ के अस्तित्व और उसकी विचारधारा की रक्षा का मजबूत माध्यम भी बनी।
1948 के तनावपूर्ण दिनों में लिया गया एक निर्णय आज करोड़ों युवाओं का मंच बन चुका है। संघ के विस्तार, भारतीय राजनीति के निर्माण और छात्र आंदोलन की दिशा सभी पर ABVP की गहरी छाप है। यह कहानी सिर्फ एक संगठन की नहीं, बल्कि उस विचारधारा की भी है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने मार्ग की खोज कर लेती है।






