
संवाद 24 डॉ. धरवेश कठेरिया। भारतीय धार्मिक परंपराओं में कुछ पर्वों का महत्त्व केवल उनके बाहरी उत्सव तक सीमित नहीं रहता। उनके साथ जुड़ी पूजा-पद्धतियाँ, मान्यताएँ और आध्यात्मिक विचार भी लंबे समय में विकसित होते रहे हैं। दीपावली की कार्तिक अमावस्या ऐसी ही एक तिथि है। देश के अधिकांश हिस्सों में इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, वहीं पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा सहित पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में इसी रात देवी महाकाली की विशेष आराधना की जाती है। इसे काली पूजा अथवा श्यामा पूजा कहा जाता है।
बंगाल में काली पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व काफी व्यापक है। इतिहासकार रैचेल फेल मैकडरमॉट ने अपनी पुस्तक Revelry, Rivalry, and Longing for the Goddesses of Bengal में बंगाल के देवी-उपासना संबंधी पर्वों और उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया है। काली पूजा इस क्षेत्र की विशिष्ट शाक्त परंपरा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
कार्तिक अमावस्या और महाकाली की उपासना
देवी काली का स्वरूप भारतीय शक्ति परंपरा में विशिष्ट स्थान रखता है। उनका गहरा वर्ण, मुंडमाला, हाथों में अस्त्र और उग्र रूप पहली दृष्टि में भय का भाव उत्पन्न कर सकता है, लेकिन शाक्त दर्शन में उनका अर्थ इससे कहीं व्यापक है। उन्हें काल, परिवर्तन, संहार और उस परम शक्ति का प्रतीक माना जाता है जिसके सामने सृष्टि की समस्त सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। काली पूजा में देवी को केवल संहार की शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता। भक्तों के लिए वे करुणामयी माता भी हैं। यही कारण है कि उनके उग्र स्वरूप के साथ मातृत्व और संरक्षण का भाव भी जुड़ा हुआ है।
कार्तिक अमावस्या की रात उनकी पूजा का विशेष महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि यह उपासना मुख्यतः रात्रि में संपन्न होती है। बंगाल में मंदिरों, पूजा पंडालों और घरों में देवी की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं। श्रद्धालु पुष्प, भोग और दीप अर्पित कर उनकी आराधना करते हैं। पूजा की स्थानीय विधियों में परिवार, मंदिर और क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है। कार्तिक अमावस्या की काली पूजा के संदर्भ में ‘कालरात्रि’ शब्द का उल्लेख करते समय एक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय संदर्भ सामने आता है। मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत आने वाले देवी माहात्म्य के प्रथम अध्याय में ब्रह्मा देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं-
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा। त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥
इसका भावार्थ है- हे देवी! आप कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि हैं; आप ही श्री, ईश्वरी, ह्री और चेतना स्वरूपा बुद्धि हैं। यहाँ देवी को व्यापक शक्ति और चेतना के विभिन्न आयामों के रूप में संबोधित किया गया है।
इस श्लोक में ‘दारुणा’ शब्द का अर्थ भयंकर अथवा प्रचंड है। इसे चार अलग-अलग पर्वों या चार विशिष्ट रात्रियों की सूची के रूप में समझना उचित नहीं होगा। बाद की कुछ धार्मिक व्याख्याओं में इन रात्रियों को अलग-अलग पर्वों से जोड़ा गया है, लेकिन इस प्रकार का वर्गीकरण उक्त श्लोक में सीधे नहीं मिलता। इस श्लोक का उल्लेख काली पूजा के संदर्भ में देवी के व्यापक स्वरूप और शक्ति की अवधारणा समझने के लिए किया जा सकता है। इसे कार्तिक अमावस्या की काली पूजा का प्रत्यक्ष विधान या विशेष मंत्र नहीं समझना चाहिए।
महानिशा और निशीथ काल का महत्त्व
काली पूजा की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक इसका मध्यरात्रि के आसपास संपन्न होना है। हिंदू पंचांग में रात्रि के मध्य भाग को निशीथ काल कहा जाता है। शाक्त परंपरा में इस समय को देवी उपासना के लिए विशेष महत्त्व दिया गया है। कार्तिक अमावस्या की इस रात्रि को कुछ परंपराओं में महानिशा के भाव से भी देखा जाता है। इस नाम का आशय केवल रात की अवधि से नहीं, बल्कि उस धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व से है जो साधक इस समय को देते हैं। हालाँकि, महानिशा और निशीथ काल के प्रयोग तथा उनके अर्थ में अलग-अलग परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है।
वर्ष 2026 में काली पूजा के लिए दिल्ली में निशीथ काल का समय रात 11 बजकर 39 मिनट से 9 नवंबर की मध्यरात्रि के बाद 12 बजकर 31 मिनट तक निर्धारित है। यह लगभग 52 मिनट की अवधि है। यह समय नई दिल्ली के स्थानीय पंचांग पर आधारित है। इसे देश के सभी शहरों के लिए समान नहीं माना जाना चाहिए। श्रद्धालुओं को अपने नगर के पंचांग में दिया गया स्थानीय मुहूर्त देखना चाहिए। यहाँ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि काली पूजा और दीपावली पर होने वाली लक्ष्मी पूजा के मुहूर्त अलग आधारों पर निर्धारित हो सकते हैं। लक्ष्मी पूजा सामान्यतः प्रदोष काल से जुड़ी होती है, जबकि बंगाल की काली पूजा में अमावस्या की मध्यरात्रि का महत्त्व रहता है।
महाकाली का ध्यान और तांत्रिक मंत्र परंपरा
महाकाली की उपासना में ध्यान और मंत्र का विशेष स्थान है। शाक्त परंपरा में देवी का ध्यान केवल उनके बाहरी स्वरूप का स्मरण नहीं माना जाता, बल्कि उनके व्यापक आध्यात्मिक स्वरूप को समझने का माध्यम भी है। देवी की प्रतिमा, उनके आयुध, आभूषण और मुद्रा धार्मिक प्रतीकों के रूप में देखे जाते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से शक्ति, काल, परिवर्तन और अज्ञान के विनाश जैसे भाव व्यक्त होते हैं। काली उपासना में ध्यान के अलग-अलग श्लोक और मंत्र विभिन्न ग्रंथों तथा संप्रदायों में मिलते हैं। इनका पाठ हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है। बंगाल की शाक्त परंपरा, तांत्रिक ग्रंथों में वर्णित उपासना-पद्धतियाँ और सामान्य भक्तिपरक काली स्तुति- इन सभी के अपने अलग संदर्भ हैं। इसलिए किसी एक ध्यान-श्लोक को कार्तिक अमावस्या की हर काली पूजा का अनिवार्य अंग बताना उचित नहीं होगा।
तांत्रिक परंपरा में बीजाक्षरों का विशेष महत्त्व है। इनमें ‘क्रीं’ को काली अथवा कालिका से संबंधित प्रमुख बीजाक्षर माना जाता है। बीजाक्षर का अर्थ है ऐसा संक्षिप्त ध्वनि-रूप जिसे संबंधित देवी या देवता की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह सामान्य नाम-मंत्र से अलग अवधारणा है। इसका एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ-संदर्भ तोडल तंत्र में मिलता है। इस ग्रंथ के छठे अध्याय में पार्वती द्वारा कालिका के मंत्र-विधान के विषय में प्रश्न किया जाता है और भगवान शिव उनके बीज-मंत्र तथा मंत्र-परंपरा का वर्णन करते हैं। यहाँ ‘क्रीं’ को कालिका के बीज-मंत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आगे ग्रंथ में इसके साथ अन्य बीजाक्षरों के संयोजन से बनने वाली मंत्र-संरचनाओं का भी उल्लेख है।
तंत्र की दृष्टि में मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं है। तोडल तंत्र में मंत्र और देवी के स्वरूप के बीच संबंध समझाते हुए मंत्र को देवी का ध्वनि-रूप बताया गया है। जिस प्रकार प्रतिमा देवी के दृश्य स्वरूप का माध्यम होती है, उसी प्रकार मंत्र को उनके ध्वनि-स्वरूप से जोड़ा जाता है। इस विचार के कारण तांत्रिक उपासना में मंत्र-जप, ध्यान और न्यास जैसे विषयों को विशेष स्थान मिला है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए। सामान्य नाम-मंत्र में देवी के प्रति नमन और भक्ति का भाव प्रमुख होता है, ध्यान-श्लोक में उनके स्वरूप का वर्णन होता है, जबकि बीज-मंत्र तांत्रिक दर्शन में विशिष्ट ध्वनि और शक्ति की अवधारणा से जुड़ा है। इन तीनों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।
तांत्रिक मंत्रों के पाठ और उनके प्रयोग में संप्रदाय तथा गुरु-परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक मंत्र को सभी शाक्त परंपराओं का सार्वभौमिक विधान बताने के बजाय उसके मूल ग्रंथ और धार्मिक संदर्भ का उल्लेख करना अधिक प्रामाणिक है।
तंत्र परंपरा में महाकाली की आराधना
महाकाली की उपासना का तांत्रिक पक्ष भारतीय शाक्त परंपरा के सबसे महत्त्वपूर्ण विषयों में से एक है। तंत्र को केवल रहस्यमय क्रियाओं, चमत्कारों या गुप्त अनुष्ठानों तक सीमित कर देना इसके व्यापक धार्मिक और दार्शनिक स्वरूप को समझने में बाधा बन सकता है। तांत्रिक परंपराओं में मंत्र, ध्यान, देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप, दर्शन और उपासना-पद्धतियों का विस्तृत विवेचन मिलता है। शाक्त तंत्र में देवी को परम शक्ति के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टि में महाकाली केवल किसी विशेष कथा की देवी नहीं, बल्कि समय और परिवर्तन के व्यापक सिद्धांत से जुड़ा स्वरूप हैं। ‘काली’ नाम का संबंध भी काल की अवधारणा से जोड़ा जाता है। सृष्टि का निर्माण, उसका परिवर्तन और अंत—इन सभी को शक्ति के व्यापक स्वरूप में समझा जाता है।
महाकाली के स्वरूप में दिखाई देने वाली उग्रता का भी एक दार्शनिक अर्थ है। उनका गहरा वर्ण असीम और अगम्य सत्ता का प्रतीक माना जाता है। मुंडमाला को अहंकार और नश्वरता के बोध से जोड़ा जाता है, जबकि उनके हाथों में दिखाई देने वाले आयुध शक्ति और अधर्म के विनाश का संकेत देते हैं। अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इन प्रतीकों की व्याख्या में अंतर भी मिलता है। तांत्रिक उपासना में मंत्र और ध्यान के साथ देवी के स्वरूप का आंतरिक चिंतन भी महत्त्वपूर्ण माना गया है। तोडल तंत्र में काली की उपासना का वर्णन केवल बीज-मंत्र तक सीमित नहीं है। उसमें मंत्र, न्यास, ध्यान और पूजा से जुड़े विभिन्न पक्षों का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि तांत्रिक परंपरा में देवी की आराधना एक व्यवस्थित धार्मिक पद्धति के रूप में विकसित हुई है।
इस परंपरा में मंत्र को देवी के ध्वनि-स्वरूप से जोड़ने का विचार विशेष महत्त्व रखता है। साधक के लिए मंत्र केवल उच्चारण नहीं, बल्कि देवी के साथ आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का माध्यम माना जाता है। इसी कारण तांत्रिक ग्रंथों में मंत्र के अक्षरों, उनके क्रम और उनके धार्मिक अर्थ पर विस्तार से चर्चा की जाती है। हालाँकि, इन विधानों का स्वरूप हर ग्रंथ और संप्रदाय में समान नहीं है।
महाकाली की उपासना का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका मातृरूप है। बंगाल की धार्मिक संस्कृति में काली को ‘माँ’ के रूप में पुकारने की परंपरा बहुत गहरी है। अठारहवीं शताब्दी के कवि रामप्रसाद सेन की काली-भक्ति से जुड़ी रचनाओं ने इस मातृभाव को व्यापक लोकप्रियता दी। बाद में रामकृष्ण परमहंस की साधना और विचारों में भी देवी काली के प्रति गहरी भक्ति दिखाई देती है। इस प्रकार महाकाली की उपासना में तांत्रिक दर्शन और भक्तिपरक भाव एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। एक ओर तंत्र में देवी को परम शक्ति और चेतना के रूप में समझा जाता है, वहीं भक्ति परंपरा में वही देवी भक्त की माता, रक्षक और आराध्य बन जाती हैं। बंगाल में काली पूजा की लोकप्रियता के पीछे इन दोनों धाराओं का योगदान रहा है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तंत्र की सभी परंपराएँ एक जैसी नहीं हैं। कुछ में मंत्र और ध्यान प्रमुख हैं, तो कुछ में विशेष पूजा-विधान और दार्शनिक चिंतन को अधिक महत्त्व दिया जाता है। इसलिए महाकाली की तांत्रिक उपासना को किसी एक विधि या एक मंत्र तक सीमित करना सही नहीं होगा।
देवी माहात्म्य में काली और रक्तबीज का प्रसंग
देवी काली के उग्र स्वरूप का प्रसिद्ध वर्णन देवी माहात्म्य के आठवें अध्याय में रक्तबीज वध के प्रसंग में मिलता है। कथा के अनुसार, रक्तबीज नामक असुर को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की प्रत्येक बूंद धरती पर गिरने पर उसके समान एक अन्य असुर उत्पन्न हो जाता था। युद्ध के दौरान जब देवी की शक्तियाँ उस पर प्रहार करती हैं, तो उसके रक्त से अनेक नए असुर पैदा होने लगते हैं। इस संकट को समाप्त करने के लिए चण्डिका देवी काली से रक्त को धरती पर गिरने से पहले ग्रहण करने को कहती हैं। काली ऐसा ही करती हैं और रक्त से उत्पन्न होने वाले असुरों को भी समाप्त करती हैं। अंततः रक्तबीज का वध होता है।
इस प्रसंग में काली को चामुण्डा नाम से भी संबोधित किया गया है। यह कथा देवी की शक्ति और अधर्म के विनाश का महत्त्वपूर्ण धार्मिक आख्यान है। देवी माहात्म्य में काली का यह वर्णन उनके उग्र स्वरूप और शक्ति के व्यापक अर्थ को समझने में सहायता करता है।
अंधकार का आध्यात्मिक अर्थ और आधुनिक दृष्टिकोण
महाकाली के स्वरूप में अंधकार को केवल भय या नकारात्मकता से जोड़कर नहीं देखा जाता। आध्यात्मिक व्याख्याओं में यह अज्ञान, मोह, अहंकार और जीवन की अनिश्चितताओं का प्रतीक भी है। देवी का उग्र स्वरूप इन बाधाओं पर विजय पाने वाली शक्ति के रूप में समझा जाता है। इसी कारण काली पूजा का अर्थ केवल अमावस्या की रात किया जाने वाला अनुष्ठान नहीं है। इसके व्यापक आध्यात्मिक भाव में आत्मचिंतन, विवेक, भय से मुक्ति और आंतरिक शक्ति की अनुभूति भी शामिल है।
दूसरी ओर, अमावस्या की रात में नकारात्मक शक्तियों के सक्रिय होने, किसी विशेष समय पर अदृश्य ऊर्जा बढ़ जाने या कुछ अनुष्ठानों से असाधारण परिणाम मिलने जैसे दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इन्हें धार्मिक मान्यता या लोकविश्वास के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को डराकर धन माँगना या चमत्कार का दावा करके उसका शोषण करना आस्था का दुरुपयोग है।
दीपावली की कार्तिक अमावस्या की रात्रि महाकाली की उपासना के कारण शाक्त परंपरा में विशेष स्थान रखती है। बंगाल और पूर्वी भारत में प्रचलित काली पूजा इस रात्रि को एक विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान देती है। महानिशा, निशीथ काल, देवी माहात्म्य का श्लोक और तांत्रिक बीजाक्षर इस उपासना के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। महाकाली की उपासना को समझने के लिए उनके ध्यान, मंत्र-परंपरा और तांत्रिक दर्शन को साथ रखकर देखना आवश्यक है। इन परंपराओं में देवी केवल उग्र शक्ति नहीं, बल्कि चेतना, मातृत्व और संरक्षण का भी स्वरूप हैं। यही व्यापकता कार्तिक अमावस्या की काली पूजा को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशिष्ट बनाती है।







