सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर वोटर लिस्ट और EVM का विवाद: चुनावी सुधारों और संस्थागत शुचिता के बीच क्यों छिड़ा सियासी संग्राम?

संवाद 24 नई दिल्ली। देश में चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी ‘इंडी’ (INDI) गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची अपडेशन (SIR) और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के तकनीकी ढांचे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस याचिका में चुनाव आयोग की आंतरिक फाइलों, आपत्तियों, लॉग-डिटेल्स और बैठकों के मिनट्स की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक-तकनीकी जांच समिति गठित करने की मांग की गई है। ​हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को अगर कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता सूची का शुद्धिकरण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना एक निरंतर और सुव्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसे आधुनिक तकनीक के जरिए और अधिक सशक्त बनाया जा रहा है।

​विपक्ष की दलीलें और सुप्रीम कोर्ट में रखी गई मांगें
​याचिका में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, टीएमसी के सौगत रॉय, आरजेडी के तेजस्वी यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत और एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले समेत गठबंधन के प्रमुख दलों के नेता शामिल हैं।
​विपक्ष का कहना है कि:
1- ​मतदाता सूची संशोधन (SIR) के तहत कथित तौर पर कुछ मतदाताओं के नाम बिना समुचित सुनवाई या पूर्व सूचना के हटाए गए हैं।
2- ​फॉर्म 6 (नए मतदाताओं के पंजीकरण फॉर्म) में किए गए संशोधनों को लेकर सवाल उठाए गए हैं कि इससे नए मतदाताओं पर अनावश्यक प्रक्रियात्मक बोझ पड़ता है।
3- ​ECINET और ERONET जैसे डिजिटल डेटाबेस को लेकर अधिक स्पष्टता और बूथवार विवरणी प्रकाशित करने की मांग की गई है।
4- ​उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति बनाकर EVM प्रोटोकॉल और मतदाता सूची के आर्किटेक्चर की समीक्षा कराई जाए।
​विपक्ष के प्रतिनिधिमंडल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए कहा कि उनका यह कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से उठाया गया है।

​संस्थागत सुधार और चुनाव आयोग की तकनीकी मजबूती
​विपक्षी आपत्तियों से इतर, चुनाव आयोग और सरकारी मशीनरी का रुख हमेशा से मतदाता सूची को त्रुटिरहित और पारदर्शी बनाने पर केंद्रित रहा है। भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसकी कार्यप्रणाली देश के संविधान और चुनाव नियमों के तहत संचालित होती है।
​पारदर्शी और डिजिटल मतदाता सूची: आयोग द्वारा अपनाए जा रहे आधुनिक डिजिटल टूल्स (जैसे ERONET) का मुख्य उद्देश्य डुप्लीकेट वोटरों, स्थानांतरित हो चुके नागरिकों और मृत मतदाताओं के नाम सूची से हटाकर एक प्रामाणिक एवं पारदर्शी डेटाबेस तैयार करना है। सरकार और आयोग का यह प्रयास रहा है कि फर्जी मतदान की किसी भी संभावना को जड़ से समाप्त किया जा सके, जिससे चुनावी शुचिता पर कोई आंच न आए।
​EVM की विश्वसनीयता: भारतीय ईवीएम प्रणाली दशकों से न्यायिक समीक्षा और तकनीकी कसौटियों पर खरी उतरती आई है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी वीवीपैट (VVPAT) और ईवीएम की सुरक्षा व्यवस्था को तकनीकी रूप से अभेद्य और विश्वसनीय माना है। किसी भी चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में फर्स्ट-लेवल चेकिंग (FLC) और मॉक पोल जैसी कठोर मानक प्रक्रियाओं (SOPs) का पालन किया जाता है।
​संस्थागत मर्यादा और कानून का राज: मुख्य न्यायाधीश की ओर से भी यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी शिकायत के समाधान का उचित मार्ग संविधान सम्मत न्यायिक प्रक्रिया ही है। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा याचिका की तकनीकी त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाए जाने के बाद कानूनी प्रक्रिया अपने तय नियमों के अनुरूप आगे बढ़ेगी।

​राजनीति बनाम लोकतांत्रिक विश्वास
​लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी सुधारों पर स्वस्थ विमर्श और पारदर्शिता की मांग निसंदेह महत्वपूर्ण है। किंतु साथ ही, देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी तकनीकी निष्पक्षता पर बार-बार सवाल खड़े करने के बजाय तय कानूनी व संस्थागत मंचों के माध्यम से संवाद स्थापित करना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। अब सभी की निगाहें शीर्ष अदालत पर टिकी हैं कि वह इस याचिका और चुनाव आयोग की वर्तमान व्यवस्था के संतुलन पर क्या दिशा-निर्देश तय करती है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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