
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजधानी में हर साल सर्दियों की दस्तक के साथ ही प्रदूषण का खौफनाक मंजर लौटने लगता है। सरकारी तंत्र की बैठकों में सड़कों की मशीनीकृत सफाई, निरंतर पानी के छिड़काव और एंटी-डस्ट अभियानों के बड़े-बड़े दावे पेश किए जाते हैं। फाइलों में दर्ज यह आंकड़े बताते हैं कि राजधानी की सड़कें चकाचक हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) द्वारा चलाए गए एक औचक निरीक्षण अभियान ‘ऑपरेशन क्लीन एयर’ ने राजधानी के वीआईपी और प्रमुख मार्गों के दावों की हवा निकाल दी है। दिल्ली की लाइफलाइन कहे जाने वाले इनर और आउटर रिंग रोड पर जब आयोग की टीमें उतरीं, तो हर तरफ उड़ती धूल, मलबे के ढेर और प्रशासनिक लापरवाही के खुले सबूत मिले।
’ऑपरेशन क्लीन एयर’ में सामने आई चौंकाने वाली हकीकत
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के क्षेत्राधिकार वाली सड़कों की जमीनी सच्चाई परखने के लिए चार विशेष उड़न दस्तों (Flying Squads) का गठन किया था। इन टीमों को इनर और आउटर रिंग रोड पर सफाई व्यवस्था, धूल नियंत्रण उपायों और मैकेनिकल स्वीपिंग के दावों की पड़ताल का जिम्मा सौंपा गया था। करीब 35 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर कुल 25 अलग-अलग सड़क पट्टियों (road stretches) का गहन मुआयना किया गया।
जांच के नतीजे बेहद चिंताजनक रहे। 25 में से 17 महत्वपूर्ण हिस्सों पर भारी मात्रा में विजिबल रोड डस्ट (सड़क पर प्रत्यक्ष दिखने वाली धूल) और निर्माण व विध्वंस (C&D) कचरा खुले में पड़ा पाया गया। इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग 68 फीसदी हिस्सों पर सफाई और डस्ट कंट्रोल का काम केवल कागजों तक ही सीमित था। जिस मार्ग से प्रतिदिन लाखों वाहन गुजरते हैं, वहां प्रशासन की यह लापरवाही सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ साबित हो रही है।
पहियों के नीचे पिसती जिंदगी और उड़ता ज़हर
आयोग की रिपोर्ट में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि सड़क किनारे जमी धूल केवल गंदगी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जहरीले पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों को जन्म देती है। रिंग रोड पर चौबीसों घंटे तेज रफ्तार वाहनों का आवागमन रहता है। जैसे ही भारी और हल्के वाहन इन सड़कों से गुजरते हैं, किनारों पर जमी महीन धूल हवा में दोबारा रिसर्कुलेट (Re-suspend) हो जाती है। यह उड़ती हुई धूल हवा को इस कदर जहरीला बना देती है कि राहगीरों, दोपहिया चालकों और आसपास रहने वाले लोगों के लिए सांस लेना भी दूभर हो जाता है। सीएंडडी वेस्ट (निर्माण मलबा) खुले में पड़े रहने के कारण वाहनों के पहियों के नीचे आकर बारीक पाउडर में तब्दील हो जाता है। सर्दियों की शुरुआत के दौरान हवा की गति धीमी होने और तापमान गिरने की वजह से यह धूल वायुमंडल की निचली सतह पर ही कैद होकर घने स्मॉग की चादर बना लेती है।
पीडब्ल्यूडी और संबंधित एजेंसियों को सख्त फटकार
सफाई और धूल नियंत्रण के दावों की धज्जियां उड़ते देख आयोग ने लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और संबंधित सड़क प्रबंधन एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाई है। आयोग ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि निर्धारित डस्ट मिटिगेशन नियमों और झाड़ू लगाने की व्यवस्था को बिना किसी कोताही के तुरंत जमीन पर लागू किया जाए।
आयोग ने सभी जिम्मेदार विभागों को प्राथमिकता के आधार पर सुधारात्मक कदम उठाने को कहा है। इसमें सड़कों की नियमित वैक्यूम और वाटर-स्प्रिंकलिंग आधारित मशीनीकृत सफाई, निर्माण कचरे का तुरंत सुरक्षित उठान और अनपेव्ड शोल्डर्स (सड़क के किनारों की कच्ची पटरियों) को पक्का या ग्रीन कवर से ढकना शामिल है, ताकि वाहनों के गुजरने पर मिट्टी हवा में न उड़े।
क्या सिर्फ छापों से सुधरेगी राजधानी की हवा?
यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली में निगरानी एजेंसियों ने इस तरह की खामियां पकड़ी हों। हर साल ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) लागू किया जाता है, भारी भरकम बजट आवंटित होता है और अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी जाती है। फिर भी रिंग रोड जैसे अति-महत्वपूर्ण गलियारे पर 25 में से 17 जगहों पर धूल और कचरा मिलना यह साबित करता है कि तंत्र में मॉनिटरिंग और जवाबदेही का भारी अभाव है। जब तक लापरवाही बरतने वाले विभागों और ठेकेदारों पर दंडात्मक कार्रवाई तय नहीं होगी, तब तक बैठकों के प्रस्ताव जमीन पर धूल बनकर ही उड़ते रहेंगे और दिल्लीवासी साफ हवा के अधिकार से वंचित रहेंगे।






