त्योहारों की मिठास पर महंगाई का तड़का: चीनी के भाव 70 रुपये के पार

​संवाद 24 नई दिल्ली। देश में आगामी त्योहारी सीजन की शुरुआत से ठीक पहले आम जनता की जेब पर महंगाई की दोहरी मार पड़ने लगी है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख पर्वों से पहले रसोई का सबसे अहम हिस्सा मानी जाने वाली चीनी की कीमतों में अचानक जोरदार तेजी दर्ज की गई है। खुदरा बाजार में चीनी की कीमतें पिछले केवल एक महीने के भीतर 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम से उछलकर 65 रुपये तक पहुंच चुकी हैं। देश के कई हिस्सों में तो खुदरा व्यापारियों द्वारा चीनी 70 रुपये प्रति किलो तक के भाव पर बेची जा रही है। महज 30 दिनों में प्रति किलो करीब 17 रुपये तक का यह उछाल सीधे तौर पर आम उपभोक्ताओं और हलवाई कारोबारियों के बजट को बिगाड़ रहा है।

​कीमतों में अचानक लगी इस आग का कारण क्या है?
​बाजार के जानकारों और आंकड़ों के अनुसार, इस साल घरेलू चीनी उत्पादन में दर्ज की गई भारी गिरावट कीमतों में आए इस तूफान की मुख्य वजह बनी है। चालू पेराई सत्र के दौरान देश में चीनी उत्पादन का शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन रखा गया था, जो वास्तविक रूप से सिमटकर लगभग 306 लाख टन पर आ गया है। यानी अनुमानित लक्ष्य से करीब 37 लाख टन कम उत्पादन हुआ है। ​कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, गन्ने की प्रमुख फसलों में फैले ‘रेड रॉट’ (लाल सड़न) और ‘टॉप बोरर’ जैसे कीट जनित रोगों ने पैदावार को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके साथ ही कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में अत्यधिक बारिश और लंबे समय तक बने रहे जलभराव ने गन्ने की गुणवत्ता और रिकवरी रेट दोनों को प्रभावित किया। भारत में सामान्यतः सालाना 320 से 340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत 280 से 290 लाख टन के आसपास रहती है। उत्पादन घटने से वह बफर स्टॉक काफी सीमित हो गया जो आमतौर पर बाजार में कीमतों को स्थिर रखने का काम करता था।

​क्या एथनॉल नीति है जिम्मेदार? केंद्र सरकार ने दी सफाई
​बाजार में यह चर्चा भी जोरों पर थी कि केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल में एथनॉल ब्लेंडिंग के लिए चीनी के उपयोग को बढ़ावा देने के कारण यह किल्लत पैदा हुई है। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2022-23 में जहां कुल चीनी उत्पादन का 12 प्रतिशत हिस्सा एथनॉल निर्माण के लिए भेजा गया था, वहीं मौजूदा सत्र में यह घटकर केवल 9 प्रतिशत रह गया है। ​वर्तमान में देश में उत्पादित होने वाले कुल एथनॉल का करीब तीन-चौथाई (75%) हिस्सा खाद्यान्नों, विशेष रूप से मक्के से तैयार किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि एथनॉल नीति से चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और किसानों को उनके गन्ने का बकाया भुगतान समय पर संभव हो सका है, इसलिए इसे महंगाई की वजह बताना पूरी तरह गलत है।

​जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर कड़ा शिकंजा
​कीमतों में असामान्य उछाल को देखते हुए सरकार ने जमाखोरों और सटोरियों के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। आशंका जताई जा रही है कि त्योहारी मांग का फायदा उठाने के लिए कुछ बड़े व्यापारियों और मिलों द्वारा स्टॉक दबाया जा रहा है। इसे रोकने के लिए 30 नवंबर तक व्यापारियों के लिए 400 टन की अधिकतम स्टॉक सीमा लागू कर दी गई है। ​इसके साथ ही एक सितंबर से सभी बड़े थोक उपभोक्ताओं (जैसे कन्फेक्शनरी और बेवरेज निर्माता) के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे अपनी 15 दिन की खपत से अधिक चीनी का भंडारण नहीं रख सकेंगे। नियमों का कड़ाई से पालन कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त टीमें गठित की गई हैं, जो चीनी मिलों और गोदामों में जाकर स्टॉक का औचक भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कर रही हैं।

​राहत के लिए त्रिकोणीय रणनीति: आयात और समय पूर्व पेराई
​त्योहारों के दौरान बाजार में आपूर्ति को सामान्य बनाने के लिए सरकार त्रिकोणीय रणनीति पर काम कर रही है:
​शुल्क-मुक्त आयात: बाजार में तुरंत लिक्विडिटी और आपूर्ति बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात करने का निर्णय लिया गया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी आपूर्ति तंग होने के कारण पिछले दो महीनों में चीनी के वैश्विक दाम 474 डॉलर से बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन (16% से अधिक वृद्धि) हो चुके हैं, फिर भी घरेलू बाजार को स्थिर करने के लिए आयातित चीनी जल्द उतारी जाएगी।
​समय से पहले पेराई: आमतौर पर देश में नया चीनी सत्र अक्टूबर के अंत या नवंबर में रफ्तार पकड़ता है, लेकिन केंद्र ने चीनी मिलों से 15 अक्टूबर से ही पेराई का काम तेजी से शुरू करने का अनुरोध किया है।
​सख्त निगरानी व स्टॉक रिलीज: घरेलू मांग को पूरा करने के लिए मिलों से मासिक आधार पर निर्धारित कोटे को बाजार में तुरंत जारी करने के निर्देश दिए गए हैं। ​अगले डेढ़ से दो महीने त्योहारी मांग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि सरकार की यह बहुस्तरीय रणनीति जमीन पर पूरी तरह प्रभावी साबित होती है, तो आने वाले हफ्तों में खुदरा कीमतों में नरमी आने और उपभोक्ताओं को राहत मिलने की पूरी उम्मीद है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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