मुख्यमंत्री द्वारा विमोचित ‘होल्कर कीर्ति ध्वजा’ लगातार चर्चा में, अहिल्याबाई होल्कर के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनी पुस्तक

संवाद 24 | विशेष संवाददाता

करीब 12 दिन पूर्व राजस्थान की राजधानी जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में आयोजित भव्य समारोह में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा विमोचित की गई पुस्तक ‘होल्कर कीर्ति ध्वजा : अहिल्याबाई होल्कर महाकाव्य’ आज भी साहित्य, इतिहास और सामाजिक क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती के अवसर पर आयोजित प्रदेश स्तरीय समारोह में हुए इस विमोचन ने पुस्तक को व्यापक पहचान दिलाई और इसके लेखक अखिलेश कुमार शुक्ला के साहित्यिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा प्रदान की। 

जयपुर में आयोजित हुए इस समारोह में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पुस्तक का लोकार्पण करते हुए लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के जीवन, उनके आदर्शों तथा भारतीय समाज के प्रति उनके योगदान को स्मरण किया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य व्यक्तियों, साहित्यकारों, इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही थी। आयोजन का उद्देश्य केवल एक पुस्तक का विमोचन भर नहीं था, बल्कि अहिल्याबाई होल्कर के जीवन-दर्शन और राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका को समाज के समक्ष पुनः स्थापित करना भी था। 

पुस्तक के लेखक अखिलेश कुमार शुक्ला लंबे समय से साहित्य, इतिहास और राष्ट्रचिंतन के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने अपनी इस कृति में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के व्यक्तित्व और कृतित्व को महाकाव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पुस्तक में उनके जीवन के विभिन्न आयामों—धर्म, संस्कृति, सुशासन, जनकल्याण, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक समरसता—का विस्तृत वर्णन किया गया है। लेखक का मानना है कि अहिल्याबाई होल्कर केवल मालवा की शासक नहीं थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोकसेवा की ऐसी आदर्श प्रतिमूर्ति थीं जिनके जीवन से आज भी प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है।

इतिहासकारों के अनुसार अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासनकाल में न्याय, प्रशासनिक दक्षता और जनकल्याणकारी कार्यों का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी चर्चा आज भी आदर के साथ की जाती है। देशभर में मंदिरों, घाटों और धर्मस्थलों के पुनर्निर्माण में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। यही कारण है कि उनकी 301वीं जयंती पर विभिन्न राज्यों में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए और जयपुर का यह समारोह उनमें प्रमुख रहा। 

विमोचन समारोह के बाद पुस्तक को लेकर साहित्यिक और सामाजिक जगत में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। विभिन्न समाचार पत्रों और मंचों पर प्रकाशित समीक्षाओं में इसे लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के जीवन को समझने का एक सार्थक प्रयास बताया गया है। विशेष रूप से युवाओं के बीच इतिहास और प्रेरक चरित्रों के अध्ययन की बढ़ती रुचि को देखते हुए यह कृति महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

साहित्यकारों का कहना है कि वर्तमान समय में जब युवा पीढ़ी अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को जानने के लिए नए स्रोत तलाश रही है, तब ऐसी पुस्तकें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। महाकाव्य शैली में लिखी गई यह कृति केवल ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व की जीवनगाथा है जिसने सेवा, त्याग और सुशासन के आदर्श स्थापित किए।

जयपुर में हुए भव्य आयोजन की तस्वीरें और समाचार विभिन्न क्षेत्रों के समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुए, जिससे पुस्तक और उसके लेखक को व्यापक पहचान मिली। उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा अन्य राज्यों के कई समाचार माध्यमों ने इस कार्यक्रम को विशेष महत्व देते हुए प्रकाशित किया। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का व्यक्तित्व आज भी समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और प्रेरित करने की क्षमता रखता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी पुस्तक का महत्व केवल उसके विमोचन तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके विचारों की सामाजिक प्रासंगिकता ही उसकी वास्तविक सफलता तय करती है। ‘होल्कर कीर्ति ध्वजा : अहिल्याबाई होल्कर महाकाव्य’ के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। विमोचन के लगभग दो सप्ताह बाद भी पुस्तक चर्चा में है और पाठकों के बीच उत्सुकता का विषय बनी हुई है।

लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती के अवसर पर हुआ यह विमोचन समारोह एक साहित्यिक आयोजन से बढ़कर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, सुशासन और राष्ट्रसेवा के आदर्शों को स्मरण करने का अवसर बन गया। यही कारण है कि यह पुस्तक आज भी साहित्य प्रेमियों, इतिहास के अध्येताओं और युवा पाठकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है तथा आने वाले समय में भी लोकमाता के प्रेरक जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 

Samvad 24 Office
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