
संवाद 24 नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इन दिनों केवल विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी से ही नहीं, बल्कि अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के भीतर से भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले कई रिपब्लिकन सांसद ट्रंप के कुछ प्रमुख फैसलों और नीतियों पर खुलकर सवाल उठाने लगे हैं। इससे अमेरिकी राजनीति में नए समीकरण बनने की चर्चा तेज हो गई है।
पार्टी के भीतर बढ़ रही असहमति
हाल के दिनों में रिपब्लिकन सांसदों ने ट्रंप प्रशासन की कई योजनाओं पर आपत्ति जताई है। ईरान नीति, सरकारी खर्च से जुड़े प्रस्ताव और कुछ महत्वपूर्ण नियुक्तियों को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए हैं। कई सांसदों का मानना है कि चुनावी वर्ष में विवादास्पद फैसले पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि कुछ नेता अब खुलकर अपनी अलग राय रखने लगे हैं।
1.8 अरब डॉलर के फंड पर सबसे ज्यादा विवाद
ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित लगभग 1.8 अरब डॉलर के तथाकथित “एंटी-वेपनाइजेशन फंड” को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा विरोध देखने को मिला। आलोचकों का कहना था कि इस फंड की पारदर्शिता और उपयोग को लेकर कई सवाल हैं। बढ़ते दबाव और कानूनी चुनौतियों के बाद प्रशासन को इस योजना से पीछे हटना पड़ा। इस घटनाक्रम को ट्रंप के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
ईरान और विदेश नीति पर भी सवाल
ईरान को लेकर ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर भी कई रिपब्लिकन सांसद असहज दिखाई दिए हैं। कांग्रेस में कुछ नेताओं ने सैन्य कार्रवाई जैसे संवेदनशील मामलों में संसद की भूमिका को मजबूत करने की मांग की है। कई सांसदों का मानना है कि विदेश नीति से जुड़े बड़े फैसलों में व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी है।
चुनावी दबाव बना बड़ी वजह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के मध्यावधि चुनाव नजदीक आने के कारण कई रिपब्लिकन सांसद अपने-अपने क्षेत्रों के मतदाताओं की चिंताओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। जिन नेताओं को कड़े चुनावी मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है, वे विवादास्पद मुद्दों पर ट्रंप से दूरी बनाकर चलना चाहते हैं। इससे पार्टी के भीतर मतभेद और स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं।
नियुक्तियों पर भी उठे सवाल
ट्रंप की कुछ प्रस्तावित नियुक्तियों को लेकर भी रिपब्लिकन नेताओं ने आपत्ति दर्ज कराई है। वरिष्ठ नेताओं ने कुछ उम्मीदवारों की योग्यता और अनुभव पर सवाल उठाए हैं। इससे यह संकेत मिला है कि पार्टी के भीतर हर निर्णय को बिना चर्चा के स्वीकार करने की प्रवृत्ति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।
क्या ट्रंप की पकड़ कमजोर पड़ रही है?
हालांकि ट्रंप अब भी रिपब्लिकन पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं, लेकिन हालिया घटनाओं ने यह दिखाया है कि उनकी हर योजना को पार्टी के भीतर स्वतः समर्थन नहीं मिल रहा। कई मामलों में सांसदों ने स्वतंत्र रुख अपनाया है और कुछ प्रस्तावों को रोकने या बदलने में सफलता भी हासिल की है।
आगे क्या होंगे राजनीतिक संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में ट्रंप और रिपब्लिकन सांसदों के बीच संबंध अमेरिकी राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। यदि पार्टी के भीतर असहमति बढ़ती है, तो इसका असर चुनावी रणनीति और कांग्रेस में शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है। फिलहाल वॉशिंगटन की राजनीति में सबसे बड़ी चर्चा यही है कि क्या ट्रंप अपनी पार्टी को पूरी तरह एकजुट रख पाएंगे या विरोध की यह आवाजें और मजबूत होंगी।






