व्रत-उपवास: धर्म से अधिक एक जीवन-विज्ञान जो शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करता है।

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संवाद 24 (संजीव सोमवंशी)। भारतीय सनातन संस्कृति की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि यहाँ आध्यात्मिकता और जीवनशैली एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसी कड़ी में “व्रत और उपवास” भारतीय परंपरा का एक अत्यंत पवित्र और व्यावहारिक अंग हैं।  यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि मन, शरीर और आत्मा की समग्र शुद्धि के साधन हैं। 

वाशिष्ठ स्मृति में स्पष्ट उल्लेख है- 
उपावृत्तस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणः सह।
उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः॥
अर्थात उपवास का सच्चा स्वरूप सभी तामसी और राजसी भोगों से विरक्ति रखते हुए सत्कर्म, भगवत भजन, ध्यान और जप में लीन रहना है। इससे पापों और तापों का नाश होता है, जबकि सद्गुणों का संचय होता है। यह एक पुण्यप्रद अनुष्ठान है जो व्यक्ति को भगवत प्राप्ति की योग्यता प्रदान करता है।

आज के भारतीय समाज पर नजर डालें तो पाश्चात्य प्रभाव इतना गहरा हो चुका है कि हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही भूलते जा रहे हैं। धार्मिक अनुष्ठान, विशेषकर व्रत-उपवास को कई लोग हेय दृष्टि से देखते हैं। जब कोई इनकी महत्ता बताता है, तो तुरंत कुतर्क शुरू हो जाते हैं “क्या इनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है? इसका लाभ क्या है?” ऐसे प्रश्नों की बौछार से न केवल प्रश्नकर्ता भ्रमित रहता है, बल्कि कमजोर आस्था वाले लोग भी डगमगा जाते हैं। 

परिणामस्वरूप, गांवों से लेकर महानगरों तक, छोटी-मोटी बीमारियों जैसे छींक, बुखार या सर्दी-खांसी में लोग तुरंत डॉक्टर की शरण में भागते हैं। डॉक्टर जांच कराते हैं  मूत्र, रक्त आदि और रिपोर्ट के आधार पर इलाज शुरू होता है। इससे नर्सिंग होम और विशाल अस्पतालों की श्रृंखला फैल रही है, जो मरीज को आर्थिक और शारीरिक रूप से निचोड़ लेती है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विज्ञान के नाम पर हम उन परंपराओं को “अंधविश्वास” कहने लगे हैं, जो वास्तव में स्वास्थ्य और संतुलन का गहन विज्ञान थीं। व्रत और उपवास कोई अंधानुकरण नहीं, बल्कि शरीर और मन के “रीसेट बटन” की तरह हैं जो हमारे भीतर की विषाक्तता को दूर करते हैं और आत्मा को स्थिर बनाते हैं।

यदि हम पिछले सौ-दो सौ वर्षों के इतिहास पर नजर डालें, तो पाते हैं कि हमारे पूर्वज शारीरिक रूप से कहीं अधिक स्वस्थ और दीर्घायु थे। उनके जीवन में रोग बहुत कम थे, जबकि दवाइयाँ, एंटीबायोटिक्स और मेडिकल तकनीकें तब अस्तित्व में नहीं थीं।

ऐसा क्यों था?
क्योंकि लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं के अनुसार आचरण करके निरोग रहते थे। उपवास, संयम, ऋतु-अनुसार आहार, और सादा जीवन ही उनकी “दवा” थे। लेकिन आज हम अतिभोजन, अनियमित जीवनशैली और तनाव से घिरे हैं, और आज हम छोटी सी बीमारी पर भी अस्पताल दौड़ते हैं, लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि प्राचीन काल में संयम और उपवास ही स्वास्थ्य का आधार थे, और रोगों से बचने का सबसे सरल उपाय “अल्पाहार और उपवास” ही है।

हमारा शरीर एक जीवंत मशीन की तरह है, जो निरंतर भोजन को पचाने, रस बनाने और अपशिष्ट निकालने का कार्य करती है।
लगातार काम करते-करते जैसे कोई मशीन गर्म होकर धीमी पड़ जाती है, वैसे ही शरीर के अंग भी निरंतर कार्य से थक जाते हैं। उपवास उन्हें विश्राम देने का अवसर प्रदान करता है। जब हम एक दिन या कुछ समय के लिए भोजन नहीं लेते, तो आमाशय, यकृत (लिवर), आंत्र (Intestine) और अन्य पाचन अंगों को आराम मिलता है। वे शरीर में जमा विषाक्त द्रव्यों (toxins) को बाहर निकाल पाते हैं, जिससे शरीर स्वाभाविक रूप से डिटॉक्स हो जाता है। 

अतिभोजन में शरीर की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा पाचन में ही व्यय हो जाता है, जिससे विषाक्त पदार्थों का पूर्ण निराकरण नहीं होता। यही रोगों की जड़ बनती है। बीमारी में सारी शक्ति विष निष्कासन में लगती है। इसलिए, रोग निवारण के सभी उपायों में उपवास सबसे प्राकृतिक, सरल और श्रेष्ठ चिकित्सा है। प्रकृति में पशु-पक्षी भी रोगग्रस्त होने पर उपवास करते हैं यह सभी प्राणियों की प्राथमिक चिकित्सा है। आयुर्वेद में कहा गया है “लङ्घनं परम् औषधम्।” अर्थात् उपवास ही सर्वोत्तम औषधि है।

व्रत और उपवास एक ही या अलग?
सामान्यतः व्रत और उपवास को एक ही माना जाता है, लेकिन इनमें सूक्ष्म अंतर है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि जप-तप में संयम और नियम पालन करते थे, जिसे व्रत या उपवास कहा जाता था। ‘उपवास’ शब्द ‘उप’ (समीप) और ‘वास’ (रहना) से मिलकर बना है अर्थात ईश्वर के समीप रहना, ध्यान, जप और स्तुति करना। इसमें निराहार रहकर अधिक समय भगवान के चिंतन में लगाना पड़ता है। वहीं ‘व्रत’ संकल्प लेकर नियम-संयम से उसे पूरा करना है। दोनों में संकल्प होता है, इसलिए आज इन्हें एक ही मान लिया जाता है।

भारतीय ऋषियों ने ऋतुओं के अनुसार व्रत और उपवास की परंपरा बनाई। शरद और बसंत ऋतु को वैद्य के लिए माता-पिता कहा गया है “वैद्यानां शारदी माता, पिता च कुसुमाकरः।” क्योंकि इन ऋतुओं में ज्वर, पीलिया, मलेरिया जैसे रोग बढ़ते हैं। इसलिए इन दिनों हल्के भोजन, फलाहार, जल सेवन और उपवास की सलाह दी जाती है। यह शरीर को प्राकृतिक रूप से संक्रमणों से बचाने का उपाय है, एक प्रकार का वैदिक इम्यून बूस्टर।

शरीर में रस-रक्त प्रवाह बाधित होने से कष्ट होते हैं, जैसे सड़क पर अतिक्रमण से आवागमन रुकता है। नियम पालन से दूषित पदार्थों का संचय नहीं होता। मूल नियम निम्न हैं – 
1. भूख लगने पर ही खाना।
2. जितनी भूख, उतना ही खाना।
3. उपयोगी पदार्थ ही ग्रहण करना।
4. पिछला भोजन पचने पर ही नया खाना।
5. मल-मूत्र वेग आने पर तुरंत निराकरण।
6. लोभ या स्वाद के लिए अधिक न खाना।

शारीरिक श्रम, व्यायाम और उपवास से संतुलन बना रहता है। रोग होने से बेहतर है रोकथाम। प्राचीन ऋषियों ने तपोबल से शरीर की क्रियाओं का अध्ययन किया और आयुर्वेद में लंघन (उपवास) को महत्व दिया। उपवास पाचक अग्नि जागृत करता है, विषाक्त पदार्थ जलाता है, शरीर शुद्ध करता है। मन शांत होता है। भूख न आने पर खाना पाचन कमजोर करता है, तनाव बढ़ाता है, प्रतिरक्षा गिराती है। उपवास अग्नि को पुनर्जीवित कर रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है।

विज्ञान भी आज मान चुका है कि “फास्टिंग” (Intermittent Fasting) शरीर को डिटॉक्स करता है, इंसुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाता है और हृदय रोगों के जोखिम को कम करता है। उपवास के दौरान शरीर अपनी पाचन ऊर्जा को “सेल रिपेयर” और “वेस्ट रिमूवल” में लगाता है। यह प्रक्रिया आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में Autophagy कहलाती है, जो शरीर की मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित करती है।

सप्ताह में एक दिन उपवास कर संबंधित देवता की आराधना पुण्यदायक है। सात्विक पदार्थ जैसे दूध, फल, साबूदाना, सिंघाड़ा, मखाना सेवन करें। पूर्ण निराहार-निर्जल भी संभव। दान की परंपरा मानसिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए आवश्यक। उपवास करने वालों का स्वास्थ्य उत्तम, व्यक्तित्व विकसित होता है। आयुर्वेद और योगशास्त्र में उपवास के पाँच प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं – 

1️⃣ पाचक उपवास: यह पाचन सुधारने और कब्ज या अजीर्ण दूर करने के लिए किया जाता है। इसमें केवल जल, नींबू रस या हल्की औषधि ली जाती है।
2️⃣ शोधक उपवास: यह रोग निवारण के लिए किया जाता है। जब शरीर विषाक्त पदार्थों से भर जाता है, तो उपवास से रोग स्वयं नष्ट हो जाते हैं।
3️⃣ शामक उपवास: मानसिक शांति और आत्मचिंतन के लिए।
इसमें दूध, छाछ, फलरस आदि हल्के पदार्थ लिए जाते हैं। साथ में मौन, ध्यान और जप का अभ्यास किया जाता है।
4️⃣ आनक उपवास: दैवीय ऊर्जा या विशेष उद्देश्य की सिद्धि के लिए किया जाने वाला उपवास। इसमें सूर्य की किरणों और ग्रहों की शक्तियों का ध्यान किया जाता है।
5️⃣ पावक उपवास: यह प्रायश्चित्त हेतु किया जाता है, जब व्यक्ति अपने अपराधों के प्रायश्चित्त के लिए सच्चे हृदय से ईश्वर से क्षमा मांगता है और केवल जल ग्रहण करता है।

वैज्ञानिक शोध दर्शाते हैं कि उपवास इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाता है, मधुमेह जोखिम कम करता है, वजन नियंत्रित करता है हृदय रोग के खतरे को काम करता है। 

उपवास के समय सावधानियां: पर्याप्त जल लेना चाहिए, स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह से उपवास करें, उपवास खोलते समय हल्का भोजन लेना चाहिए। उपवास शरीर, मन और आत्मा के लिए लाभकारी है, आत्म-अनुशासन सिखाता है और प्राचीन काल जितना आज भी प्रासंगिक है।

उपवास अपनाकर हम न केवल निरोगी रह सकते हैं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रख सकते हैं। क्या आप इस प्राचीन रहस्य को आजमाने को तैयार हैं? यह न केवल स्वास्थ्य देगा, बल्कि आपको आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाएगा। व्रत और उपवास केवल धर्म नहीं, यह जीवनशैली का अनुशासन हैं। यदि भारत अपनी इन परंपराओं को पुनः अपनाए, तो न केवल तन, बल्कि मन और समाज भी पुनः निरोगी हो जाएगा।

Samvad 24 Office
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