‘टैरिफ वॉर’ की आहट: क्या ट्रंप का ‘10% टैक्स प्लान’ बदल देगा वैश्विक बाजार का चेहरा? कोर्ट और व्हाइट हाउस में छिड़ सकती है जंग!
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संवाद 24 नई दिल्ली। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में एक बार फिर ‘टैरिफ युद्ध’ के बादल मंडराने लगे हैं। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी वापसी के साथ ही जिस ’10 प्रतिशत यूनिवर्सल बेसलाइन टैरिफ’ का खाका खींचा है, उसने न केवल अमेरिकी उद्योग जगत बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रंप अपने इस फैसले को लागू करते हैं, तो उन्हें अमेरिका की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के कड़े रुख का सामना करना पड़ सकता है। यह लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक शक्तियों’ की होने वाली है।
क्या है ट्रंप का ‘टैरिफ मास्टरप्लान’?
डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि अमेरिका को ‘व्यापार घाटे’ से उबारने के लिए आयात किए जाने वाले हर सामान पर कम से कम 10 से 20 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे अमेरिकी कंपनियां देश के भीतर ही सामान बनाएंगी और रोजगार बढ़ेगा। हालांकि, अर्थशास्त्रियों की राय इसके उलट है। उनका कहना है कि अगर अमेरिका बाहर से आने वाले सामान पर टैक्स बढ़ाता है, तो इससे वहां महंगाई चरम पर पहुँच जाएगी, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट बनाम राष्ट्रपति: शक्तियों का टकराव
अमेरिकी संविधान के अनुसार, विदेशी व्यापार और कर (Tax) लगाने का अधिकार मुख्य रूप से ‘यूएस कांग्रेस’ (संसद) के पास है। कानून के जानकारों का कहना है कि यदि ट्रंप बिना संसद की सहमति के ‘नेशनल इमरजेंसी’ का हवाला देकर 10% ग्लोबल टैरिफ थोपते हैं, तो इसे तुरंत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। हाल के वर्षों में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ‘मेजर क्वेश्चन्स डॉक्ट्रिन’ (Major Questions Doctrine) का पालन किया है, जिसके तहत राष्ट्रपति अपनी मर्जी से ऐसे बड़े फैसले नहीं ले सकते जिनका देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता हो। ऐसे में, ट्रंप का यह ‘टैरिफ बम’ अदालत की दहलीज पर फुस्स भी हो सकता है।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह खबर दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ, ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से भारतीय निर्यातकों (आईटी, कपड़ा और फार्मा सेक्टर) पर बोझ बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, ट्रंप अक्सर भारत को एक ‘टैरिफ किंग’ बताते रहे हैं और ‘रेसिप्रोकल टैक्स’ (जैसे को तैसा) की बात करते हैं। हालांकि, रक्षा और रणनीतिक मामलों में भारत और अमेरिका की नजदीकी इस व्यापारिक कड़वाहट को कम करने में मदद कर सकती है।
बाजार की चिंता: महंगाई या मजबूती?
अगर ट्रंप का यह फैसला लागू होता है, तो चीन से आने वाले सामान पर 60% तक का टैक्स लग सकता है। इससे वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह टूट सकती है। जानकारों का कहना है कि ट्रंप जजों की आलोचना करने में पीछे नहीं हटते, और यदि अदालत उनके आर्थिक फैसलों में बाधा बनती है, तो वाशिंगटन में ‘व्हाइट हाउस बनाम सुप्रीम कोर्ट’ का एक ऐतिहासिक ड्रामा देखने को मिल सकता है।






