गोवा सरकार का बड़ा फैसला, क्या अब 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ‘नो एंट्री’ ज़ोन बनेगा सोशल मीडिया
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संवाद 24 गोवा। आधुनिक युग में जहाँ स्मार्टफोन बच्चों के खिलौनों की जगह ले चुके हैं, वहीं गोवा सरकार ने एक ऐसा क्रांतिकारी और साहसिक कदम उठाने की तैयारी की है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। गोवा सरकार 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के नेतृत्व में इस दिशा में तेजी से मंथन चल रहा है, जिसका उद्देश्य बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाना है।
सावधान! आपकी स्क्रीन के पीछे छिपा है बड़ा खतरा
गोवा सरकार की इस पहल के पीछे हाल के दिनों में सामने आए साइबर अपराध, साइबर बुलिंग और बच्चों में बढ़ती सोशल मीडिया की लत जैसे गंभीर मुद्दे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटी उम्र में सोशल मीडिया के अनियंत्रित इस्तेमाल से बच्चों के व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। ‘संवाद 24’ को मिली जानकारी के अनुसार, सरकार ऐसे कानून बनाने पर विचार कर रही है जिससे इंस्टाग्राम, टिकटॉक (अगर प्रासंगिक हो) और फेसबुक जैसे प्लेटफार्मों पर बच्चों की उम्र का सत्यापन (Age Verification) अनिवार्य हो सके।
मुख्यमंत्री की चिंता और अभिभावकों का रुख
पणजी में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने संकेत दिए कि डिजिटल दुनिया बच्चों के बचपन को निगल रही है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे मैदानी खेलों के बजाय वर्चुअल दुनिया में अधिक समय बिता रहे हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं है। सरकार का मानना है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चे इतने परिपक्व नहीं होते कि वे सोशल मीडिया पर मौजूद भ्रामक जानकारी और ‘हनी ट्रैपिंग’ जैसे साइबर जाल को समझ सकें।
क्या ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर बनेगा भारत का कानून?
गौरतलब है कि हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने भी इसी तरह का कानून बनाकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। गोवा भारत का पहला ऐसा राज्य बन सकता है जो इस तरह के कड़े डिजिटल नियम लागू करे। इस प्रस्तावित प्रतिबंध के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्लेटफॉर्म पर किसी भी नाबालिग का अकाउंट न हो, अन्यथा उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
चुनौतियां और संभावनाएं
हालांकि, इस कानून को लागू करना इतना आसान नहीं होगा। तकनीकी जानकारों का कहना है कि वीपीएन (VPN) और फर्जी जन्मतिथि के जरिए बच्चे अक्सर इन प्रतिबंधों को धता बता देते हैं। इसके लिए सरकार को मजबूत ‘डिजिटल बुनियादी ढांचे’ और ‘प्राइवेसी रेगुलेशन’ की आवश्यकता होगी। साथ ही, विपक्ष और सिविल सोसाइटी के बीच इस बात को लेकर भी बहस छिड़ सकती है कि क्या यह बच्चों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है या उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम?
अभिभावकों के लिए एक बड़ी राहत?
गोवा के कई शिक्षक संघों और पैरेंट-टीचर एसोसिएशनों ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि मोबाइल की लत के कारण बच्चों के स्कूल ग्रेड गिर रहे हैं और उनमें एकाग्रता की कमी देखी जा रही है। यदि यह कानून लागू होता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक ‘ब्लूप्रिंट’ के रूप में काम कर सकता है।






