राजनीति का बदलता चेहरा: विचारधारा से प्रदर्शन तक

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अजय कुमार: भारत की राजनीति कभी सिद्धांतों, संघर्ष और जनसेवा के आदर्शों पर टिकी थी। गांधी, लाल बहादुर शास्त्री और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने राजनीति को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया था। परंतु आज का परिदृश्य बदल चुका है — अब राजनीति प्रदर्शन का पर्याय बन गई है।

चमकते मंच, विशाल काफिले, सोशल मीडिया अभियानों और डिजिटल विज्ञापनों ने लोकतांत्रिक संवाद की जगह ले ली है। पहले नेता जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएँ सुनते थे, अब वे कैमरों और इवेंट मैनेजमेंट के जरिए अपने संदेश “प्रोजेक्ट” करते हैं। जनता के बीच संवाद की जगह अब “ब्रांडिंग” ने ले ली है।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि वैचारिक भी है। राजनीति अब विचारधारा से अधिक छवि पर निर्भर हो गई है। किसी पार्टी या उम्मीदवार की लोकप्रियता अब उनके कार्यों से नहीं, बल्कि उनकी डिजिटल मौजूदगी से आँकी जाती है। मंचों की भीड़, हेलीकॉप्टर रैलियाँ और सोशल मीडिया अभियानों ने लोकतंत्र को एक महंगे आयोजन में बदल दिया है।

आंकड़े बताते हैं कि अपराधी पृष्ठभूमि और आर्थिक रूप से संपन्न उम्मीदवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। चुनाव आयोग के अनुसार, 2024 के आम चुनावों में करोड़ों रुपये की संपत्ति वाले प्रत्याशी अब सामान्य बात बन चुके हैं। यह लोकतंत्र के उस भाव को कमजोर करता है, जहाँ सेवा भावना राजनीति का मूल आधार हुआ करती थी।

राजनीति में अब ‘जनसेवा’ की जगह ‘जन-दिखावा’ ने ले ली है। सोशल मीडिया के दौर में लाइक्स, व्यूज़ और फॉलोअर्स ही प्रभाव का पैमाना बन चुके हैं। लेकिन क्या केवल दृश्यता ही नेतृत्व का मापदंड हो सकती है? असली राजनीति तो जनता के बीच रहकर, उनकी पीड़ा को महसूस कर और उनके लिए ठोस नीतियाँ बनाने में है।

जरूरत है कि राजनीतिक दल और उनके प्रतिनिधि यह समझें कि जनता केवल भाषणों और अभियानों से नहीं, बल्कि अपने जीवन में आए बदलाव से प्रभावित होती है। लोकतंत्र की ताकत जनमत में है, न कि जन-प्रदर्शन में।

Samvad 24 Office
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