मृत्यु से पहले की आखिरी पुकार: क्या एक बेटी की ‘अंतिम इच्छा’ पिघला पाएगी अमेरिकी सिस्टम का कलेजा?

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संवाद 24 नई दिल्ली। इंसानियत और कानून की जंग में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं जो पूरी दुनिया को झकझोर कर रख देते हैं। अमेरिका के शिकागो से एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जिसने न केवल अमेरिकी आव्रजन नीतियों (Immigration Laws) पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि एक लाचार पिता और उसकी कैंसर पीड़ित बेटी की मार्मिक दास्तां ने लाखों आंखों को नम कर दिया है। 16 वर्षीय किशोरी एलिजाबेथ लेमा, जो पिछले लंबे समय से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही थी, उसने अपनी आखिरी सांस ली। लेकिन अपनी मृत्यु से कुछ घंटों पहले तक वह जिस संघर्ष में जुटी थी, वह खुद के जीवन के लिए नहीं, बल्कि अपने पिता की आजादी के लिए था।

एक पिता, एक बेटी और निर्वासन का काला साया
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब एलिजाबेथ के पिता को अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया और उन्हें उनके मूल देश निर्वासित (Deport) करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। एलिजाबेथ, जो एक दुर्लभ और आक्रामक प्रकार के कैंसर से लड़ रही थी, वह जानती थी कि उसका समय कम है। उसकी सिर्फ एक ही इच्छा थी—अपने अंतिम समय में अपने पिता का साथ। शिकागो के अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई, असहनीय दर्द के बीच एलिजाबेथ ने सोशल मीडिया और मानवाधिकार संगठनों के माध्यम से अमेरिकी सरकार से गुहार लगाई थी। उसने एक भावुक अपील करते हुए कहा था, “मुझे नहीं पता मेरे पास कितना समय बचा है, लेकिन मैं अपने पिता के बिना नहीं मरना चाहती। कृपया उन्हें मेरे पास आने दें।”

सिस्टम की बेरुखी और आखिरी विदाई
एलिजाबेथ के इस संघर्ष ने शिकागो में एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया था। स्थानीय लोग, छात्र और आव्रजन अधिकार कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए थे। उनकी मांग थी कि मानवीय आधार पर पिता के निर्वासन को रोका जाए। हालांकि, अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) की सख्त नीतियों के कारण इस प्रक्रिया में देरी होती रही। दुर्भाग्य से, कानून की पेचीदगियां एक बेटी की भावनाओं पर भारी पड़ीं। सोमवार को एलिजाबेथ ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि जिस समय उसने दुनिया को अलविदा कहा, उसके पिता सलाखों के पीछे थे और उससे मिल भी नहीं सके। इस घटना ने पूरे अमेरिका में ‘फैमिली रीयूनिफिकेशन’ और आव्रजन सुधारों की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।

विश्लेषण: कानून बड़ा या संवेदना?
यह खबर सिर्फ एक मौत की खबर नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की विफलता की कहानी है जहां ‘नियम’ मानवीय संवेदनाओं से ऊपर हो जाते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अमेरिका जैसे देश में, जो मानवाधिकारों का पैरोकार होने का दावा करता है, एक मरती हुई बच्ची को उसके पिता से दूर रखना ‘क्रूरता की पराकाष्ठा’ है। एलिजाबेथ के परिवार के वकील ने बयान जारी करते हुए कहा, “एलिजाबेथ एक फाइटर थी। उसने अपनी बीमारी से ज्यादा अपने पिता के हक के लिए लड़ाई लड़ी। उसकी मृत्यु हमारे सिस्टम पर एक बदनुमा दाग है।” अब सवाल यह उठता है कि क्या एलिजाबेथ की मौत के बाद उसके पिता को कम से कम उसकी अंतिम विदाई (Funeral) में शामिल होने की अनुमति मिलेगी? या फिर वहां भी कानून की दीवार आड़े आएगी?

एक अधूरी कहानी का अंत
शिकागो की सड़कों पर आज खामोशी है, लेकिन लोगों के दिलों में आक्रोश है। सोशल मीडिया पर #JusticeForElizabeth ट्रेंड कर रहा है। लोग मांग कर रहे हैं कि कम से कम अब तो प्रशासन को जागना चाहिए ताकि भविष्य में किसी और ‘एलिजाबेथ’ को अपने पिता का हाथ थामे बिना दुनिया से न जाना पड़े। एलिजाबेथ की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सीमाओं और पासपोर्ट से परे भी एक दुनिया है, जिसे ‘इंसानियत’ कहते हैं।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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