अदालत का अनोखा न्याय: दुष्कर्म के दोषी की सजा में बड़ी कटौती, महात्मा गांधी पर लिखे निबंध ने बदली किस्मत!
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संवाद 24 मुंबई। मुंबई की एक विशेष अदालत ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने कानूनी गलियारों और आम जनता के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। न्यायपालिका को अक्सर कठोर दंड के लिए जाना जाता है, लेकिन मुंबई की इस डिंडोशी कोर्ट ने ‘सुधारात्मक न्याय’ (Reformative Justice) का एक अनूठा उदाहरण पेश किया है। अदालत ने एक दुष्कर्म के दोषी की उम्रकैद की सजा को कम कर दिया है, और इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण बना, वह था दोषी द्वारा जेल में महात्मा गांधी के विचारों पर लिखा गया एक निबंध।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2018 का है, जब मुंबई में एक 22 वर्षीय युवक को एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उसे दोषी करार दिया और पोक्सो (POCSO) कानून की धाराओं के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोषी पिछले छह वर्षों से जेल में अपनी सजा काट रहा था। उसने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील की और अपनी सजा कम करने की गुहार लगाई।
गांधीवादी विचारों ने किया हृदय परिवर्तन
सजा के दौरान जेल प्रशासन द्वारा कैदियों के सुधार के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसी कड़ी में महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर जेल में एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था, जिसका विषय ‘गांधी के विचारों की आज के दौर में प्रासंगिकता’ और ‘अहिंसा’ था। इस दोषी ने न केवल उस प्रतियोगिता में भाग लिया, बल्कि गांधीवादी सिद्धांतों, सत्य, अहिंसा और पश्चाताप पर एक बेहद प्रभावशाली निबंध लिखा। जब यह मामला अदालत के समक्ष आया, तो प्रतिवादी पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि दोषी ने जेल में रहते हुए अपने किए पर गहरा पश्चाताप व्यक्त किया है। वकील ने सबूत के तौर पर उसके द्वारा लिखे गए निबंध और जेलर की रिपोर्ट पेश की, जिसमें उसके व्यवहार को ‘अत्यंत शालीन और सुधारात्मक’ बताया गया था।
अदालत की टिप्पणी: सजा का मकसद केवल बदला लेना नहीं
विशेष न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा, “न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना या समाज से अलग करना नहीं है, बल्कि उसे एक बेहतर इंसान बनने का अवसर देना भी है। यदि कोई अपराधी जेल की सलाखों के पीछे रहते हुए अपने भीतर सुधार लाता है और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्व के विचारों को आत्मसात करता है, तो कानून को भी लचीला रुख अपनाना चाहिए।” अदालत ने पाया कि दोषी की उम्र वर्तमान में कम है और जेल में उसके छह साल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि वह अब समाज के लिए खतरा नहीं है। न्यायाधीश ने उसकी उम्रकैद की सजा को घटाकर 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया। अदालत का मानना है कि गांधीवादी विचारों पर लिखा गया निबंध इस बात का प्रमाण है कि अपराधी का ‘हृदय परिवर्तन’ हो चुका है।
सुधारात्मक न्याय बनाम अपराध की गंभीरता
इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों के बीच विमर्श शुरू हो गया है। जानकारों का कहना है कि भारतीय न्यायशास्त्र हमेशा से ‘सुधारात्मक न्याय’ का पक्षधर रहा है। प्राचीन काल से ही यह माना गया है कि “अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं।” हालांकि, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों में सजा कम करना पीड़ित के प्रति अन्याय हो सकता है। लेकिन इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि सजा में कटौती केवल अच्छे आचरण और वैचारिक सुधार के ठोस प्रमाणों के आधार पर की गई है।
जेल सुधार कार्यक्रमों को मिलेगा बढ़ावा
मुंबई कोर्ट का यह फैसला देश भर की जेलों में चल रहे शिक्षा और सुधार कार्यक्रमों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। यह संदेश देता है कि यदि कोई कैदी वास्तव में खुद को बदलना चाहता है, तो शिक्षा, साहित्य और महान विचारकों के दर्शन उसके लिए नई जिंदगी के द्वार खोल सकते हैं। दोषी ने अपनी याचिका में यह भी संकल्प लिया है कि जेल से बाहर आने के बाद वह गांधीवादी सिद्धांतों पर चलते हुए समाज सेवा करेगा। यह मामला कानून की किताब में एक नजीर की तरह दर्ज होगा, जहाँ ‘कलम’ और ‘विचार’ ने एक अपराधी को प्रायश्चित की राह दिखाई और न्यायपालिका ने मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखा।






