दालों की जगह ‘इरादा’- क्या है अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की नई सच्चाई?

संवाद 24 नई दिल्ली। संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच हाल ही में घोषित व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के दस्तावेज में अमेरिका ने कुछ प्रमुख बदलाव कर दिए हैं, जिससे यह समझौता पहले बताई गई अपेक्षाओं से काफी अलग दिखने लगा है। इन संशोधनों से दोनों देशों की नीतियों और आर्थिक हितों पर गंभीर बहस छिड़ गई है।

दालों को हटाया, संवेदी कृषि सुरक्षित
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की फैक्टशीट से ‘पल्स’ यानी दालों का जिक्र पूरी तरह हटा दिया गया है। मूल दस्तावेज में यह कहा गया था कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों पर शुल्क घटाता या समाप्त करता है, जिसमें दालें भी शामिल थीं, पर अब इस बात को हटाकर सामान्यीकृत सूची में केवल कुछ खाद्य और कृषि वस्तुएं ही शामिल रह गईं। विशेषकर दालों जैसे संवेदनशील कृषि क्षेत्र पर यह बदलाव भारतीय कृषक समुदाय और विश्लेषकों के बीच चिंता का विषय बना हुआ है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि भारत ने अपनी कृषि-संबंधी लाल रेखाओं पर कायम रहने की कोशिश की है।

$500 अरब खरीद का वचन नहीं — सिर्फ ‘इरादा’
दूसरा बड़ा बदलाव भारत द्वारा अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर से अधिक अमेरिकी उत्पादों की खरीद को लेकर है। पहले दावा यह था कि भारत “खरीद करेगा” (will purchase), जबकि अब यह शब्द सिर्फ “इरादा रखता है” (intends to buy) में बदल दिया गया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह एक बाध्यकारी वचन नहीं बल्कि एक नीति संकेत है। इस 500 अरब डॉलर के लक्ष्य में ऊर्जा उत्पाद, आईसीटी (सूचना और संचार तकनीक), कोयला और अन्य औद्योगिक सामान शामिल हैं। परंतु अब यह खरीद किसी कानूनी प्रतिबद्धता के रूप में नहीं रहेगी, बल्कि दोनों देशों के बीच आगे की वार्ताओं और बाजार की परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित होगी।

डिजिटल व्यापार और शुल्क संबंधित संशोधन
पहले फैक्टशीट में यह भी कहा गया था कि भारत अपनी डिजिटल सेवा कर नीति को हटा देगा, जो अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए एक प्रमुख आवश्यकता थी। परंतु अब संशोधित दस्तावेज में केवल यह उल्लेख है कि दोनों देश बिलाटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करेंगे, बिना यह घोषित किए कि कर पूरी तरह हटाया जाएगा। यह बदलाव अमेरिका-भारत दोनों के लिए डिजिटल सेवाओं पर नियमन और कर नीति की अस्पष्टता के मुद्दे को उजागर करता है, जिससे आगे की बातचीत की जरूरत बनी हुई है।

व्यापारियों और आलोचकों की प्रतिक्रिया
इस संशोधित दस्तावेज को लेकर भारत में विरोध और समर्थन दोनों ही दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक ओर कुछ विशेषज्ञ इसे एक लचीला व्यापार ढांचा मान रहे हैं, जिसमें भारत ने अपनी संवेदनशील आर्थिक और कृषि हितों को सुरक्षित रखा है। वहीं दूसरी ओर आलोचक इसे अमेरिका के पक्ष में अधिक लाभकारी बताते हैं, जिसमें भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पादों के प्रवेश के लिए अनुकूल स्थितियाँ बन सकती हैं। विशेषकर घरेलू उद्योगों और कृषि क्षेत्र के प्रतिनिधियों का कहना है कि शुल्क में कमी और बेहतर बाजार पहुंच के बावजूद यह अधूरा समाधान है, क्योंकि असली समझौता अभी भी विस्तृत वार्ता और आवश्यक कानूनी दस्तावेजों का विषय बना हुआ है।

दोनों देश क्या हासिल करना चाहते हैं?
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता का उद्देश्य पारंपरिक ट्रेड बाधाओं को कम करना, तरल ऊर्जा, तकनीकी सामान और डिजिटल सेवाओं में सहयोग को बढ़ावा देना है। अमेरिका चाहता है कि भारतीय बाजार में अपनी उच्च गुणवत्ता वाली टेक्नोलॉजी और ऊर्जा उत्पादों का विस्तार हो, जबकि भारत अपने निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार पहुंच बढ़ाना चाहता है। सरकारी सूत्रों का दावा है कि किसानों और संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण इस समझौते के प्रमुख हिस्सों में शामिल है, और कृषि तथा डेयरी उत्पादों के लिए कोई अनुचित खुलापन नहीं आया है।

आगे की राह: ‘अंतरिम समझौता’ से ‘बिलाटरल ट्रेड एग्रीमेंट’
यह समझौता फिलहाल एक अंतरिम ढांचा (interim framework) मात्र है और यह अंतिम द्विपक्षीय व्यापार समझौता नहीं माना जाता है। दोनों देशों ने संकेत दिया है कि वे एक व्यापक व्यापार समझौते की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें और अधिक विस्तृत नियम, सुरक्षा मानदंड और व्यापारिक हित शामिल होंगे।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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