कर्नाटक में ‘कुर्सी’ की जंग: क्या सिद्धारमैया की जगह लेंगे डीके शिवकुमार? विधायकों की लामबंदी ने
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संवाद 24 कर्नाटक। राजनीति में एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। दक्षिण भारत के इस महत्वपूर्ण राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान अब सार्वजनिक होने लगी है। ताजा घटनाक्रम में, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खेमे के विधायकों ने खुले तौर पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग शुरू कर दी है। इस लामबंदी ने न केवल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मुश्किलों को बढ़ा दिया है, बल्कि दिल्ली में बैठे कांग्रेस हाईकमान के लिए भी नई चुनौती खड़ी कर दी है।
विधायकों का शक्ति प्रदर्शन और लामबंदी
बेंगलुरु के राजनीतिक गलियारों में उस वक्त हलचल मच गई जब डीके शिवकुमार के करीबी माने जाने वाले कई विधायकों और मंत्रियों ने एक बैठक की। सूत्रों के अनुसार, इस गुप्त बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि अब समय आ गया है जब ‘संकटमोचक’ कहे जाने वाले डीके शिवकुमार को राज्य की कमान सौंपी जाए। समर्थकों का तर्क है कि चुनाव में जीत दिलाने में शिवकुमार की संगठनात्मक क्षमता का बड़ा हाथ था और ढाई साल के कथित समझौते (Power Sharing Formula) के तहत अब बदलाव होना चाहिए।
सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार: पुराना द्वंद्व
कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच की प्रतिद्वंद्विता कोई नई बात नहीं है। 2023 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद भी मुख्यमंत्री पद को लेकर कई दिनों तक सस्पेंस बना रहा था। उस वक्त सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के हस्तक्षेप के बाद सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया था। लेकिन अब ‘अहिल्या’ (सिद्धारमैया का समर्थक आधार) और ‘वोक्कालिगा’ (शिवकुमार का समुदाय) के बीच वर्चस्व की लड़ाई फिर से तेज हो गई है।
भ्रष्टाचार के आरोप और कानूनी पेच
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस समय MUDA घोटाले और अन्य आरोपों के कारण कानूनी जांच का सामना कर रहे हैं। विपक्षी दल भाजपा और जेडीएस लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। शिवकुमार समर्थकों को लगता है कि यदि नैतिक आधार पर सिद्धारमैया को पद छोड़ना पड़ता है, तो डीके शिवकुमार ही स्वाभाविक उत्तराधिकारी होने चाहिए। हालांकि, खुद डीके शिवकुमार भी केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में रहे हैं, जो उनकी राह में रोड़ा बन सकता है।
हाईकमान के सामने धर्मसंकट
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे खुद कर्नाटक से आते हैं, इसलिए उनके लिए यह मामला और भी संवेदनशील है। एक तरफ सिद्धारमैया की जनप्रिय छवि और पिछड़ा वर्ग (OBC) पर उनकी पकड़ है, तो दूसरी तरफ डीके शिवकुमार की संसाधन जुटाने की क्षमता और वफादारी। हाईकमान फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है, क्योंकि किसी भी बड़े बदलाव का असर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और सरकार की स्थिरता पर पड़ सकता है।
भाजपा की पैनी नजर
कर्नाटक के इस आंतरिक कलह पर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पैनी नजर है। भाजपा नेताओं का दावा है कि यह सरकार अपने अंतर्विरोधों के कारण खुद ही गिर जाएगी। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने तंज कसते हुए कहा है कि कांग्रेस नेता जनता की सेवा करने के बजाय कुर्सी की बंदरबांट में लगे हुए हैं।






