बिहार में हड़कंप: क्या 70 हजार करोड़ की भारी-भरकम राशि निगल गई भ्रष्टाचार की भेंट? CAG रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे
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संवाद 24 नई दिल्ली। बिहार की सियासत और शासन व्यवस्था में एक बार फिर उस समय खलबली मच गई, जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट बिहार विधानसभा के पटल पर रखी गई। इस रिपोर्ट ने राज्य सरकार के वित्तीय प्रबंधन और पारदर्शिता के दावों की पोल खोलकर रख दी है। सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सरकार लगभग 70,877 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि का हिसाब देने में विफल रही है। यह महज कोई तकनीकी चूक नहीं, बल्कि एक बड़े वित्तीय घोटाले की आहट मानी जा रही है, जिसने पूरे राज्य के प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया है।
आखिर कहां गया जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा?
कैग की रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्य के विभिन्न विभागों ने करोड़ों रुपये खर्च तो कर दिए, लेकिन उन खर्चों का ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ (Utilization Certificate – UC) अभी तक महालेखाकार कार्यालय में जमा नहीं किया गया है। नियमतः किसी भी सरकारी योजना के लिए जारी की गई राशि का हिसाब एक निश्चित समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य होता है, लेकिन बिहार में 49,649 ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें उपयोगिता प्रमाण पत्र गायब हैं। इन लंबित प्रमाण पत्रों की कुल राशि 70,877.61 करोड़ रुपये है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि “उपयोगिता प्रमाण पत्रों की इतनी बड़ी लंबित संख्या गबन, धोखाधड़ी और धन के दुरुपयोग (Misappropriation & Embezzlement) के गंभीर जोखिम को दर्शाती है।” जब तक सरकार इन खर्चों का प्रमाण पेश नहीं करती, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि यह पैसा उन्हीं उद्देश्यों पर खर्च हुआ है जिनके लिए इसे आवंटित किया गया था।
इन विभागों में मिली सबसे ज्यादा गड़बड़ी
रिपोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि पांच प्रमुख विभागों ने वित्तीय अनुशासन की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सबसे चौंकाने वाली स्थिति पंचायती राज विभाग की है, जहां 28,154.10 करोड़ रुपये का कोई हिसाब-किताब नहीं मिला है। इसके बाद शिक्षा विभाग (12,623.67 करोड़), नगर विकास विभाग (11,065.50 करोड़), ग्रामीण विकास विभाग (7,800.48 करोड़) और कृषि विभाग (2,107.63 करोड़) का नंबर आता है। ये विभाग सीधे तौर पर जनता की बुनियादी सुविधाओं और विकास से जुड़े हैं, ऐसे में इतनी बड़ी राशि का अनअकाउंटेड होना राज्य के विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सालों पुराना है लापरवाही का सिलसिला
यह समस्या सिर्फ मौजूदा वित्तीय वर्ष की नहीं है। कैग की रिपोर्ट बताती है कि लगभग 14,452 करोड़ रुपये का हिसाब तो साल 2016-17 से ही लंबित है। यानी पिछले 7-8 सालों से सिस्टम के भीतर भ्रष्टाचार या लापरवाही की यह जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि किसी ने इसकी जवाबदेही तय करने की जहमत नहीं उठाई। राज्य सरकार के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा, जो करीब 21 प्रतिशत से भी अधिक है, बिना किसी पुख्ता प्रमाण के फाइलों में दबा पड़ा है।
बजट और खर्च के बीच की खाई
सीएजी ने बिहार सरकार की वित्तीय कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर टिप्पणी की है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 के लिए बिहार का कुल बजट 3.26 लाख करोड़ रुपये था, लेकिन सरकार केवल 79.92 प्रतिशत राशि ही खर्च कर पाई। इसके अलावा, राज्य पर कर्ज का बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। साल 2023-24 में बिहार की कुल देनदारी बढ़कर 3.98 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गई है, जो पिछले साल की तुलना में 12.34 प्रतिशत अधिक है। एक तरफ राज्य कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ जो पैसा विकास के लिए निकाला गया, उसका कोई हिसाब नहीं मिल रहा है।
विपक्ष हमलावर, सरकार की सफाई
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही बिहार की राजनीति में उबाल आ गया है। विपक्षी दलों ने नीतीश सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्ष का कहना है कि यह “चारा घोटाले” से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकता है। नेताओं ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष की ओर से इसे एक “प्रक्रियात्मक देरी” बताया जा रहा है। सरकार के प्रतिनिधियों का तर्क है कि उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा करना एक सतत प्रक्रिया है और विभागों को जल्द से जल्द इसे पूरा करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि का हिसाब सालों तक न मिलना केवल एक प्रक्रियात्मक देरी नहीं हो सकती। यह प्रशासनिक विफलता और वित्तीय नियंत्रण की कमी का स्पष्ट संकेत है। यदि इस राशि का सही उपयोग नहीं हुआ है, तो यह बिहार जैसे राज्य के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका हो सकता है, जो पहले से ही केंद्रीय सहायता और ऋण पर काफी हद तक निर्भर है।






