दुष्कर्म पीड़िता के चरित्र पर टिप्पणी पड़ी भारी, हाई कोर्ट ने खारिज की अपील
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संवाद 24, प्रयागराज। दुष्कर्म के एक मामले में पीड़िता के चरित्र पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने अधिवक्ता के इस आचरण को अनुचित और वकालत के स्थापित नियमों के विपरीत बताते हुए न केवल नाराजगी जताई, बल्कि संबंधित अपील को भी खारिज कर दिया।
मामला सिद्धार्थनगर निवासी बेचन प्रसाद से जुड़ा है, जिसके विरुद्ध दुष्कर्म के आरोप में IPC की धारा 376 और एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने विवेचना के बाद आरोप पत्र दाखिल किया, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान ले लिया था। इसी संज्ञान आदेश और चार्जशीट को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की गई थी।
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे ब्लैकमेल करने की आदी बताने का प्रयास किया। इसके समर्थन में कुछ हलफनामे भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें पीड़िता के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। इस पर हाई कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की दलीलें न केवल असंवेदनशील हैं, बल्कि महिला की गरिमा के खिलाफ भी हैं।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी महिला के चरित्र और आचरण पर अपमानजनक आरोप लगाना, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त सम्मान और निजता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में ऐसे तर्क पूरी तरह अशोभनीय हैं और इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि पीड़िता ने अपने बयान में अभियोजन का समर्थन किया है और चार्जशीट विधिसम्मत साक्ष्यों के आधार पर दाखिल की गई है। हाई कोर्ट ने इन तथ्यों से सहमति जताते हुए कहा कि संज्ञान आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं है।
अंततः अदालत ने अपील को खारिज करते हुए अधिवक्ताओं को भविष्य में न्यायालय के समक्ष दलीलें रखते समय संयम और मर्यादा बनाए रखने की सख्त हिदायत दी।






