गोंडा में विराट हिंदू सम्मेलन: राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक जागरण और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश
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संवाद 24 गोंडा। अदम गोंडवी खेल मैदान में आयोजित हिंदू सम्मेलन जिले के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण आयोजन के रूप में दर्ज हो गया। बड़ी संख्या में नागरिकों, स्वयंसेवकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी ने इस सम्मेलन को जनआंदोलन जैसा स्वरूप प्रदान किया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल विचार प्रकट करना नहीं, बल्कि समाज को उसकी जड़ों से जोड़ते हुए भविष्य की दिशा तय करना था। सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन जी उपस्थित रहे, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना पर अपने विचार रखे।
मुख्य वक्ता स्वांत रंजन जी ने अपने संबोधन की शुरुआत भारत की ऐतिहासिक पहचान से की। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी हैं। उन्होंने यह रेखांकित किया कि जब विश्व के कई देश आधुनिक सभ्यता की ओर बढ़ना भी शुरू नहीं हुए थे, तब भारत शिक्षा, विज्ञान, कृषि और व्यापार के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा था।

स्वांत रंजन जी ने कहा कि आधुनिक भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी ऐतिहासिक चेतना को वर्तमान से जोड़े। केवल अतीत का गौरव गिनाने से राष्ट्र मजबूत नहीं बनता, बल्कि उस गौरव को वर्तमान जीवन में उतारना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षा, तकनीक और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए भी भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान को नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्वीकरण के युग में भारत के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। अवसर इसलिए कि भारतीय विचार और मूल्य विश्व स्तर पर स्वीकार किए जा रहे हैं, और चुनौती इसलिए कि सांस्कृतिक एकरूपता के दबाव में स्थानीय परंपराएं कमजोर पड़ सकती हैं। ऐसे समय में समाज का दायित्व है कि वह अपनी परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में जीवंत बनाए।
मुख्य वक्ता ने संघ द्वारा प्रस्तुत “पंच परिवर्तन” की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह समाज को व्यावहारिक दिशा देने का प्रयास है। उन्होंने इसे समाज के नैतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण का माध्यम बताया। पंच परिवर्तन के अंतर्गत सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जीवनशैली और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों को शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा कि यह अवधारणा किसी एक संगठन या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए है। इन सिद्धांतों का उद्देश्य व्यक्ति के जीवन में संतुलन स्थापित करना और समाज में सहयोग की भावना को मजबूत करना है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि पंच परिवर्तन केवल नीतिगत विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारने योग्य दिशा-सूचक हैं।

सम्मेलन में राष्ट्र जागरण मंच की अखिल भारतीय संयोजक एवं सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता सुबूही खान ने भारत के ऐतिहासिक योगदान और समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता केवल पुरानी नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होती रही है। यह देश ज्ञान, दर्शन और नैतिक मूल्यों की भूमि रहा है, जिसने विश्व को जीवन के अर्थ पर विचार करने की प्रेरणा दी।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज भी कृषि प्रधान देश है और लगभग 60 प्रतिशत भूमि उर्वर है। यह तथ्य दर्शाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का गहरा संबंध कृषि से रहा है। उन्होंने कहा कि विविधता के बावजूद एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति रही है और यही कारण है कि देश ने अनेक ऐतिहासिक संकटों के बावजूद अपनी पहचान बनाए रखी। उन्होंने कहा कि भारत की विशेषता यह है कि यहां भाषाएं, वेशभूषाएं और परंपराएं बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्रीय भावना एक रहती है। यह एकता किसी एक विचारधारा से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद से बनी है।
अयोध्या से आए बधाई पीठाधीश्वर राजीव लोचन शरण जी महाराज ने सनातन परंपरा पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा समाज को जोड़ने वाली मूल शक्ति है। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार और नैतिक जीवन का मार्गदर्शन करती है।

उन्होंने बताया कि संस्कार, संयम और सेवा की भावना सनातन परंपरा की मूल विशेषताएं हैं। जब समाज इन मूल्यों को अपनाता है, तो उसमें आपसी विश्वास और सहयोग बढ़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि सांस्कृतिक चेतना किसी एक पीढ़ी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर पीढ़ी को इसे आगे बढ़ाना होता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कारगिल योद्धा विजय सिंह ने राष्ट्र रक्षा के व्यापक अर्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की भी भूमिका है। उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता, नैतिक अनुशासन और सजग नागरिकता भी राष्ट्र रक्षा का ही हिस्सा हैं। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे आत्मरक्षा के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी सजग रहें। उनके वक्तव्य में राष्ट्रभक्ति के साथ अनुशासन और सजगता का संदेश स्पष्ट रूप से झलकता रहा।
सम्मेलन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने वातावरण को भावनात्मक और प्रेरक बना दिया। एम्स इंटरनेशनल के बच्चों द्वारा प्रस्तुत नाटक ने समाज के प्रति जिम्मेदारी और राष्ट्र के प्रति समर्पण का संदेश दिया। बच्चों की प्रस्तुति ने यह दर्शाया कि सांस्कृतिक चेतना केवल वयस्कों तक सीमित नहीं, बल्कि नई पीढ़ी भी इसमें सहभागी हो रही है। आवास विकास शाखा के बाल स्वयंसेवकों अजिताभ और अस्तित्व द्वारा प्रस्तुत गीत “हिंदू सत्य सनातन हैं हम” ने जनसमूह में राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गौरव की भावना को और प्रखर किया। गीत और नाटक के माध्यम से संदेश को सरल और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।

इस सम्मेलन में कई सामाजिक कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। विभाग प्रचारक प्रवीण, जिला पंचायत अध्यक्ष घनश्याम मिश्र, सदर विधायक प्रतीक भूषण सिंह सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्व प्रदान किया। इसके साथ ही राम प्रकाश गुप्त, श्रीमान सिंह, अश्विनी शुक्ल, सतीश, अमित, बी.एन. सिंह, ज्योति पांडेय, रणविजय सिंह, अलका पांडेय, धर्मेंद्र पांडेय, बृजेश द्विवेदी, नेहा भरद्वाज, धीरज दूबे, हनुमान सिंह बिसेन, अशोक सिंह, के.के. श्रीवास्तव सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवक उपस्थित रहे। इन सभी की सहभागिता ने यह संकेत दिया कि यह आयोजन केवल एक संगठन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है।
आयोजकों के अनुसार इस सम्मेलन में लगभग 5000 से अधिक लोगों की सहभागिता रही। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एकत्र होना यह दर्शाता है कि सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर संवाद की आवश्यकता आज भी समाज में मौजूद है। जनभागीदारी ने यह भी संकेत दिया कि लोग केवल राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान पर भी चर्चा करना चाहते हैं। यह सम्मेलन इसी दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा गया।
यह आयोजन इस बात का संकेत है कि समाज में आज भी अपनी पहचान, संस्कृति और जिम्मेदारियों पर चर्चा की आवश्यकता महसूस की जा रही है। विचारों से आगे बढ़कर व्यवहार में परिवर्तन लाना ही इस प्रकार के सम्मेलनों का वास्तविक उद्देश्य है। गोंडा का यह सम्मेलन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, जिसने राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक जागरण और सामाजिक उत्तरदायित्व का स्पष्ट संदेश दिया।






