किराएदार अतिक्रमणकारी? नए वक्फ कानून को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती
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संवाद 24 नई दिल्ली। जनवरी 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा नए वक्फ कानून के किराए वाली वक्फ संपत्तियों से जुड़े प्रावधानों को लेकर दायर एक याचिका पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, केंद्रीय वक्फ परिषद और दिल्ली वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी किया गया है। यह मामला वक्फ संपत्तियों पर वित्तीय, संवैधानिक और सामाजिक अधिकारों के मूल प्रश्नों को जन्म दे रहा है और संभावित रूप से कानून की वैधता पर उच्च न्यायालय के समक्ष बड़ा न्यायिक परीक्षण प्रस्तुत करेगा।
वक्फ कानून की पृष्ठभूमि और UMEED Act 2025
वक्फ संपत्ति से जुड़े कानून भारत में लंबे समय से विवादों का विषय रहे हैं। मूल रूप से वक्फ (Waqf) संपत्ति को धार्मिक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए समर्पित किया जाता है, और इसका प्रबंधन वक्फ बोर्डों द्वारा किया जाता है। वक्फ कानूनों का मूल उद्देश वक्फ संपत्ति के संरक्षण, उचित प्रबंधन और पारदर्शिता सुनिश्चित करना रहा है।
हाल ही में संसद ने Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency & Development Act, 2025 (संक्षेप में UMEED Act 2025) नाम से एक संशोधित कानून पारित किया, जिसमें वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, किरायेदारी, बंटवारा, और अधिकारों के निर्धारण जैसे कई पहलुओं में व्यापक बदलाव किए गए। यह कानून पारित होने के बाद विविध राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी विचारों का केंद्र बन गया।
नए कानून के तहत किरायेदारों को अतिक्रमणकारी (encroacher) की परिभाषा में शामिल किया जा सकता है यदि उनकी किरायेदारी समाप्त हो गई है या किसी कारणवश उन्होंने संपत्ति खाली नहीं की। वक्फ संपत्ति से जुड़े अधिकांश विवादों को विशिष्ट वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष हल करने का प्रावधान है। इसके अलावा रिकॉर्डिंग, उपयोग, निवेश और प्रबंधन के मानकों को समेकित तरीके से लागू करने की व्यवस्था भी शामिल है।
इन प्रावधानों को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में पहले से चल रही हैं, जिसमें कानून की संवैधानिक वैधता और मौलिक अधिकारों के संभावित उल्लंघन पर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका: मुख्य दावे
दिल्ली हाईकोर्ट में जनवरी 2026 में दाखिल याचिका इन मुख्य बिंदुओं पर आधारित है:
संविधान के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि UMEED Act 2025 के कई प्रावधान भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार), आर्टिकल 19 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकार) और आर्टिकल 21 (जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं। उनके अनुसार कानून ने अतिक्रमणकारी की परिभाषा को अत्यधिक विस्तारित कर दिया है, जिसके कारण वे लोग भी अतिक्रमणकारी माने जा सकते हैं जिनकी किरायेदारी समाप्त हो चुकी है, लेकिन जिनके पास दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट और अन्य सुरक्षा प्रावधानों के तहत संरक्षण है।
किरायेदारों के बचाव के पारंपरिक अधिकारों को कमजोर करना
दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट और स्लम एरिया एक्ट जैसी प्रावधानों के तहत किरायेदारों को सुरक्षित रखने के नियम हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नया कानून इन सुरक्षा प्रावधानों को नकारता है और किरायेदारों को लीज समाप्ति के बाद तत्काल बेदखल किया जा सकता है, जिससे उनके बुनियादी जीवनाधिकारों पर गंभीर असर पड़ेगा।
वक्फ ट्रिब्यूनल की अधिकारिता और न्यायिक अड़चन
अब कई मामलों का निर्णय विशिष्ट वक्फ ट्रिब्यूनल करेगा, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे ट्रिब्यूनल मूल्यांकन, निष्पक्षता और संवैधानिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। याचिका में कहा गया है कि पारंपरिक अदालतों की बजाए ट्रिब्यूनलों को अधिक अधिकार देने से न्याय का स्तर प्रभावित हो सकता है।
लीज नियमों और किराया निर्धारण
UMEED Act के साथ ही पुराने वक्फ प्रॉपर्टीज लीज रूल्स 2014 के कई नियम (जैसे नियम 4, 5, 6, 7, 18 और 19) पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता कहते हैं कि इन नियमों के तहत सर्किल रेट के आधार पर बोली प्रक्रिया के कारण किराया तय किया जाता है, जबकि किराया तय करने का अधिकार केवल रेंट कंट्रोलर के पास होना चाहिए। इससे किरायेदारों के अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
दिल्ली हाईकोर्ट का रुख और सुनवाई की प्रक्रिया
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामला सुनते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, केंद्रीय वक्फ परिषद और दिल्ली वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी किया है और सभी पक्षों को लगभग छह हफ्तों के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह सुप्रीम कोर्ट में इसी विषय पर चल रही सुनवाई के नतीजे का भी इंतजार करेगा, और उसके बाद ही दिल्ली हाईकोर्ट इस मामले में अंतिम निर्णय देगा।
यह संकेत है कि दोनों न्यायालयों (दिल्ली हाईकोर्ट एवं सर्वोच्च न्यायालय) के फैसले आपस में जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावी बना सकते हैं। इस तरह की दोहरी न्यायिक सुनवाई यह दर्शाती है कि कानून के वैधता और कार्यान्वयन पर व्यापक बहस चल रही है।
सुप्रीम कोर्ट में समान प्रकृति की चुनौतियाँ
दिल्ली में चल रही याचिका से पहले ही सुप्रीम कोर्ट में UMEED Act के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अलग-अलग मामलों को सुचारू रूप से जोड़े जाने के आदेश दिए हैं। यह याचिकाएं कानून के अन्य प्रावधानों पर केंद्रित हैं, जैसे वक्फ-बाय-यूजर (Waqf by User) संपत्तियों की मान्यता तथा वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण पर नियम।
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ याचिकाओं के मामलों में यह स्पष्ट किया है कि जब तक पूरा मामला सुना नहीं जाता, वक्फ संपत्तियों को डिनोटिफाई या हटाया नहीं जाएगा, चाहे वे रजिस्टर्ड हों, रजिस्टर्ड नहीं हों, या वक्फ-बाय-यूजर स्वरूप की संपत्ति हों।
समाज और किरायेदारों पर संभावित प्रभाव
यह मामला केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है। इसका असर सीधे उन लोगों के जीवन, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ेगा जो वक्फ संपत्तियों में किरायेदारी पर रहते हैं। यदि किराएदारों को नए कानून के तहत अतिक्रमणकारी मान लिया जाता है, तो वे अनिश्चित भविष्य के सामने आ सकते हैं। संपत्तियों का नियंत्रण ट्रिब्यूनल के अधिकार में होने से न्याय तक पहुँच मुश्किल हो सकती है, खासकर कमजोर सामाजिक वर्गों के लिए। किराया निर्धारण के पारंपरिक अधिकारों में बदलाव से आर्थिक असंतुलन भी उत्पन्न हो सकता है।
ये सभी मुद्दे सामाजिक न्याय, आर्थिक सुरक्षा और सुरक्षा के मूलभूत अधिकारों से जुड़े हैं, जो भारतीय संवैधानिक ढांचे की आध्यात्मिक और विधिक नींव का हिस्सा हैं।
एक निर्णायक ऐतिहासिक परीक्षण
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा नए वक्फ कानून के किराएदार-संबंधी प्रावधानों को चुनौती देने पर नोटिस जारी करना, भारतीय न्यायपालिका के सामने एक महत्त्वपूर्ण इतिहासिक प्रश्न पेश करता है। यह न केवल किराएदारों और वक्फ प्रबंधन के बीच विवाद का समाधान है, बल्कि भारत के मौलिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक शक्ति वितरण पर भी गहराई से प्रभाव डाल सकता है। अब यह देखना होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, और सरकार के जवाब इस बहुप्रतीक्षित मामले को किस दिशा में ले जाते हैं।






