“संगठित समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव” बांदा के हिन्दू सम्मेलन में गूंजा वैचारिक स्वर, हजारों का जनसमूह, एक मंच और एक विचार।
Share your love

संवाद 24 बांदा। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में स्थित ऐतिहासिक नगरी बांदा सोमवार, 19 जनवरी 2026 को एक ऐसे वैचारिक और सामाजिक आयोजन की साक्षी बनी, जिसने संगठन, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकजुटता के प्रश्नों को केंद्र में ला खड़ा किया। चिल्ला रोड स्थित होटल रामदा में आयोजित भव्य हिन्दू सम्मेलन में हजारों की संख्या का विशाल जनसमूह, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता, प्रबुद्ध नागरिक और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। यह सम्मेलन न केवल संख्या के लिहाज से विशाल था, बल्कि अपने विचारों से भी विशाल साबित हुआ है।
सम्मेलन का उद्देश्य
हिन्दू सम्मेलन का मूल उद्देश्य समाज में व्याप्त विखंडन, जातीय विभाजन, सांस्कृतिक विस्मृति और सामाजिक चुनौतियों पर चिंतन करते हुए एक साझा राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना का निर्माण करना था। संघ के सौ वर्षों की यात्रा के पड़ाव पर आयोजित इस सम्मेलन को संगठन की वैचारिक निरंतरता, सामाजिक संवाद और भविष्य की दिशा के रूप में देखा गया। आयोजकों के अनुसार, यह कार्यक्रम किसी एक वर्ग या समूह तक सीमित न होकर, समाज के व्यापक हितों पर केंद्रित रहा।
शुभारंभ और मंचीय गरिमा
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि बागेश्वरधाम पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तथा विशिष्ट अतिथि प्रांत प्रचारक श्रीराम जी द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। मंच पर उपस्थित वरिष्ठ पदाधिकारियों, प्रचारकों और कार्यकर्ताओं ने आयोजन को गरिमामय स्वरूप प्रदान किया। पूरे सभागार में “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के उद्घोष के साथ राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक गौरव का वातावरण स्पष्ट रूप से महसूस किया गया।
प्रांत प्रचारक श्रीराम जी का वक्तव्य: संगठन और राष्ट्रबोध की धुरी
सम्मेलन में प्रांत प्रचारक श्रीराम जी का वक्तव्य उल्लेखनीय रहा, जिसे श्रोताओं ने गंभीरता से सुना। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लगभग 100 वर्षों की यात्रा को स्मरण कराते हुए कहा कि यह यात्रा केवल एक संगठन के विस्तार की नहीं, बल्कि भारतीय समाज में सेवा, संस्कार और संगठन की भावना को पुनर्जीवित करने की यात्रा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ ने अपने आरंभिक दिनों से ही समाज को जोड़ने, चरित्र निर्माण और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का कार्य किया है।

श्रीराम जी ने कहा कि संगठन ही समाज की वास्तविक शक्ति है। जब समाज संगठित होता है, तभी वह अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में सामाजिक विखंडन, वैचारिक भ्रम और स्वार्थपरक प्रवृत्तियों से बचने के लिए संगठित प्रयास अनिवार्य हैं। उनके अनुसार, संघ का मूल मंत्र व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण का है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे अपने दैनिक आचरण, सेवा कार्यों और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से इस विचार को व्यवहार में उतारें। यह वक्तव्य सम्मेलन का वैचारिक आधार बना और श्रोताओं के लिए चिंतन का विषय भी।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का संबोधन: सामाजिक चुनौतियों पर स्पष्ट दृष्टि
सम्मेलन के मुख्य वक्ता धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपने संबोधन में सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक मुद्दों पर खुलकर विचार रखे। उन्होंने हिंदू समाज की एकजुटता पर बल देते हुए कहा कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता आपसी भेदभाव को समाप्त कर एक साझा पहचान और लक्ष्य के साथ आगे बढ़ने की है। उन्होंने जातिवाद, सामाजिक विभाजन और आंतरिक कमजोरियों को समाज की प्रगति में बाधक बताया।
उन्होंने बेटियों के सम्मान, संस्कारों के संरक्षण और सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज की उन्नति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण से होती है। उनके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को आत्ममंथन करते हुए अपने विचार और आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा, तभी समाज सशक्त बन सकेगा।
संस्कार और संस्कृति पर जोर
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपने संबोधन में बच्चों को संस्कार देने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अगली पीढ़ी को केवल संपत्ति या सुविधाएं नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्य, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध देना आवश्यक है। यह विचार श्रोताओं के बीच गूंजता नजर आया, क्योंकि वर्तमान समय में संस्कार और सांस्कृतिक पहचान को लेकर व्यापक विमर्श चल रहा है।
सामाजिक एकता का संदेश
उन्होंने समाज के भीतर व्याप्त विभिन्न चुनौतियों जैसे सामाजिक असमानता, वैचारिक भ्रम और सांस्कृतिक विस्थापन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इनका समाधान आपसी संवाद, समझ और एकजुट प्रयासों से ही संभव है। उनके अनुसार, जब समाज अपने भीतर की कमजोरियों को पहचान कर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी वह बाहरी चुनौतियों का सामना कर सकता है।

संघ के विचार और ऐतिहासिक संदर्भ
सम्मेलन में वक्ताओं ने संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि और उसके संस्थापक विचारों का भी उल्लेख किया। संघ को एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि इसका उद्देश्य किसी के विरोध में नहीं, बल्कि समाज को संगठित कर राष्ट्रहित में कार्य करना है। वक्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि संघ की कार्यपद्धति सेवा, अनुशासन और स्वयंसेवक भावना पर आधारित है।
कार्यक्रम के दौरान सह-प्रांत प्रचारक मुनीश जी, विभाग प्रचारक ऋतुराज जी, विभाग कार्यवाह संजय जी, जिला संघचालक सुरेंद्र जी, जिला कार्यवाह श्यामसुंदर जी, जिला प्रचारक अनुराग जी, नगर संघचालक रामनाथ जी, नगर कार्यवाह उमाशंकर जी सहित अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे।
सामाजिक विमर्श और श्रोताओं की प्रतिक्रिया
सम्मेलन के दौरान सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्र निर्माण और व्यक्तिगत दायित्व जैसे विषयों पर व्यापक विमर्श हुआ। श्रोताओं ने वक्ताओं के विचारों को गंभीरता से सुना और कई बिंदुओं पर सहमति जताई। कार्यक्रम के अंत में यह स्पष्ट रूप से महसूस किया गया कि सम्मेलन केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने उपस्थित जनसमूह को आत्मचिंतन और सामाजिक भूमिका पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
बुंदेलखंड के संदर्भ में सम्मेलन का महत्व
बांदा और आसपास का क्षेत्र सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष पहचान रखता है। ऐसे में इस प्रकार का आयोजन स्थानीय समाज को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने का कार्य करता है। सम्मेलन ने बुंदेलखंड के सामाजिक ताने-बाने में एकता और सांस्कृतिक चेतना के महत्व को रेखांकित किया।
विचार से व्यवहार की ओर
कुल मिलाकर, बांदा में आयोजित यह हिन्दू सम्मेलन एक वैचारिक और सामाजिक संवाद का मंच बनकर उभरा। प्रांत प्रचारक श्रीराम जी के संगठनात्मक और राष्ट्रबोध से जुड़े विचार, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के सामाजिक एकता और संस्कार पर केंद्रित संदेश तथा स्वयंसेवकों की व्यापक भागीदारी ने इस आयोजन को विशेष बना दिया।
यह सम्मेलन इस बात का संकेत भी है कि समाज में संगठन, संवाद और सांस्कृतिक मूल्यों पर चर्चा की आवश्यकता लगातार बनी हुई है। आयोजन के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि यदि समाज अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए संगठित प्रयास करे, तो राष्ट्र निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
संवाद 24 के लिए यह सम्मेलन न केवल एक समाचार है, बल्कि समाज में चल रहे व्यापक वैचारिक मंथन की एक झलक भी, जिसने आने वाले समय में सामाजिक संवाद को और गहराई देने की संभावना को रेखांकित किया है।






