अमेरिकी स्टूडेंट कर्ज संकट और भारत के लिए शिक्षा प्रणाली से जुड़े महत्त्वपूर्ण सबक
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संवाद 24 अंतरराष्ट्रीय । अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए छात्रों पर बढ़ते कर्ज का बोझ एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्या बन चुका है, जिसका असर न सिर्फ वहाँ के युवाओं के फैसलों पर पड़ा है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव वैश्विक शिक्षा-रणनीति और नीति-निर्माण पर भी देखने को मिल रहा है। अमेरिकी छात्रों के अरबों डॉलर के भारी शिक्षा ऋण और उसके बाद नौकरी की कठिनाइयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा वित्तपोषण की संरचना, कॉलेज लागत और रोजगार-ओरिएंटेड कौशल विकास जैसे कारक आज के विश्व में किसी भी देश की युवाशक्तियों की संभावनाओं को रूप देते हैं।
अमेरिकी शिक्षा ऋण संकट का स्वरूप
अमेरिका में बहुत से छात्र उच्च शिक्षा के लिए लाखों डॉलर तक ऋण लेते हैं। यह ऋण उन्हें कॉलेज या विश्वविद्यालय की ट्यूशन फीस, आवास, किताबें तथा जीवन व्यय के लिए मदद करता है, लेकिन स्नातक होने के बाद रोजगार पाने और कर्ज चुकाने की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण हो जाती है। इसी वजह से छात्र ऋण का बोझ बहुत से युवाओं के लिए आर्थिक, भावनात्मक और पेशेवर संकट बन गया है।
यह संकट केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है; यह वास्तविक जीवन की कहानियों में भी दिख रहा है। उदाहरण के तौर पर, एक भारतीय छात्र जो अमेरिका में पढ़ रहा था, उसने लगभग 5000 जगह आवेदन किए लेकिन नौकरी नहीं मिली और कर्ज लगभग 53 लाख रुपये तक पहुँच गया। उसकी मानसिक और आर्थिक स्थिति इस संकट की गंभीरता को दर्शाती है।
अमेरिका में न सिर्फ छात्रों के पास भारी कर्ज है, बल्कि लोन वसूली भी फिर से बढ़ चुकी है। कोविड-19 के दौरान ऋण वसूलने पर रोक लगी थी, लेकिन 5 मई 2025 से यह प्रक्रिया पुनः चालू हो गई है, जिससे लाखों उधारकर्ताओं को डिफॉल्ट लोन वसूलने के नए उपायों का सामना करना पड़ा।
इस संकट के पीछे कई कारण हैं
उच्च ट्यूशन फीस और जीवनयापन की लागत
रोजगार-मार्केट में अस्थिरता
नीति-परिवर्तन और प्रशासनिक निर्णय
शिक्षा प्रणाली के वैश्विक और सामाजिक प्रभाव
यह संकट अमेरिका के भीतर ही नहीं, बल्कि जारी वैश्विक शिक्षा-परिस्थितियों पर भी प्रभाव डाल रहा है
विदेश में पढ़ाई को ‘सफलता की गारंटी’ मानते हुए बहुत से भारतीय छात्रों के परिवार भी भारी ऋण लेकर विदेश भेजते हैं—जिसका बड़ा हिस्सा अप्रत्याशित रोजगार या वर्क-पर्मिट संकटों के कारण जोखिम में पड़ जाता है।
आर्थिक प्रभाव
उच्च छात्र ऋण सिर्फ व्यक्तिगत बचत और खर्च तक सीमित नहीं रहता; यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सुचारू चलन, उपभोग और निवेश निर्णयों को भी प्रभावित करता है।
इसलिए यह ज़रूरी है कि इस समस्या के अध्ययन को केवल आर्थिक बयान के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार संरचना तथा सामाजिक अवसरों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है।
भारत के संदर्भ में प्रमुख सीखें
भारत जैसे विकसित एवं लोकतांत्रिक देश के लिए इस संकट से कई महत्त्वपूर्ण सबक निकलते हैं:
शिक्षा वित्तपोषण का समावेशी ढांचा
भारत को चाहिये कि शिक्षा-ऋण की प्रणालियों में वित्तीय साक्षरता और जोखिम प्रबंधन को शामिल करे। यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि छात्रों और परिवारों को ऋण लेने, चुकाने तथा भुगतान योजनाओं के बारे में मजबूत जानकारी और सलाह उपलब्ध हो
घरेलू उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच
अमेरिकी संकट यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा की उच्च मूल्य-वृद्धि के परिणाम स्वरूप छात्रों को विदेश भागना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप ऋण का बोझ बढ़ता है। इसे देखते हुए भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार-परक प्रशिक्षण को मजबूत करना आवश्यक है। इससे छात्रों को केवल विदेश की डिग्री के लिए ऋण लेने की बजाय भारत में ही श्रेष्ठ शिक्षा-विकास के अवसर उपलब्ध होंगे।
कौशल-आधारित शिक्षा और रोजगार का तालमेल
भारत को चाहिए कि वह उच्च शिक्षा से पूर्व और पश्चात कौशल-आधारित कोर्स और इंटर्नशिप तथा उद्योग-संबंधित कार्यक्रमों को बढ़ावा दे, जिससे छात्र पढ़ाई के बाद बेरोजगारी की मार न खाएँ। इसके लिए नीति-निर्माता और शिक्षा-संस्थाओं को उद्योगों के साथ साझेदारी बढ़ानी होगी।
ऋण चुकाने की संरचनाओं में सुधार
देश में एजुकेशन लोन की पुनर्भुगतान प्रणालियों में लचीलापन, प्रतिस्पर्धात्मक ब्याज दरें और वित्तीय नियमन की स्पष्टता लाने की आवश्यकता है, जिससे ऋण डिफ़ॉल्ट दरों को कम किया जा सके। भारत में एजुकेशन लोन NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) का स्तर भी बढ़ रहा है, जिससे बैंकों के लिए जोखिम बढ़ रहा है।
शिक्षा नीति और दीर्घकालिक सोच की आवश्यकता
उच्च शिक्षा को केवल ‘डिग्री प्राप्ति’ तक सीमित न रखकर इसे रोजगार, कौशल, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़ने की जिम्मेदारी सरकारों, नियामक निकायों और शिक्षा-संस्थाओं की होनी चाहिए। भारत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के माध्यम से शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन का राह चुना है, लेकिन इसे पूर्ण रूप से लागू करना और उद्योग-समुदाय के साथ गठजोड़ करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
अमेरिकी स्टूडेंट डेब्ट संकट सिर्फ एक राष्ट्रीय समस्या नहीं है, यह वैश्विक शिक्षा-वित्तपोषण, कौशल-आवश्यकताओं और रोजगार बाजार की अंतरक्रिया का परिणाम है। भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए यह संकट हमें सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे हम शिक्षा को अधिक समावेशी, आर्थिक रूप से संतुलित और रोजगार-उन्मुख बना सकते हैं। हमारी शिक्षा नीति, वित्तीय सहायता तंत्र, कौशल विकास कार्यक्रम और उद्योग-शिक्षा साझेदारी को इस दिशा में और अधिक स्थिर तथा दीर्घकालिक अग्रसर रखना होगा।






