निजी पैथोलॉजी का कमीशन खेल: हैलट अस्पताल में डॉक्टर फंसे, प्राचार्य ने कराई वीडियो रिकॉर्डिंग
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर के हैलट अस्पताल में निजी पैथोलॉजियों से कथित सांठगांठ का एक और मामला सामने आया है। अस्पताल में जांच की समुचित सुविधा होने के बावजूद कुछ डॉक्टर कमीशन के लालच में रोगियों को बाहर निजी पैथोलॉजियों की ओर भेज रहे हैं। शनिवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने मेडिसिन ओपीडी के निरीक्षण के दौरान दो ऐसे मामलों का खुलासा किया, जिनमें रोगियों को जबरन बाहर से जांच कराने के लिए कहा गया। इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई है और संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संस्तुति शासन को भेजी जा रही है।
निरीक्षण के दौरान मेडिसिन ओपीडी के बाहर ककवन से आई रोगी साधना पर्चा लिए खड़ी मिली। पूछताछ में उसने बताया कि मेडिसिन विभाग के डॉक्टर डॉ. ब्रजेश कुमार ने उसे अस्पताल के बाहर रावतपुर क्षेत्र की एक निजी पैथोलॉजी में जांच कराने के लिए कहा है। पर्चे पर न तो पैथोलॉजी का नाम लिखा था और न ही कोई दवा। केवल एक मोबाइल नंबर दर्ज था और कहा गया था कि वहां जाकर फोन पर बात करा देना। जब रोगी ने कहा कि यह जांचें हैलट में भी हो जाती हैं, तो डॉक्टर ने कथित तौर पर उसे डांटते हुए कहा कि बहस मत करो, पहले जांच कराओ।
इसी तरह एक अन्य रोगी दीपक को भी बाहर से जांच कराने के लिए कहा गया। डॉक्टर ने यह तर्क दिया कि हैलट में रिपोर्ट आने में 24 घंटे लगेंगे, जबकि बाहर आधे घंटे में रिपोर्ट मिल जाएगी। प्राचार्य डॉ. काला के अनुसार, दोनों ही मामलों में कोई इमरजेंसी नहीं थी, फिर भी रोगियों को निजी पैथोलॉजी की ओर मोड़ा गया। बाद में साधना की जांच मेडिसिन विभाग के डॉ. जे.एस. कुशवाहा से कराई गई, जबकि दूसरे रोगी ने न्यूरोलॉजी विभाग में परामर्श लिया। दोनों रोगियों को आवश्यक दवाएं अस्पताल से ही उपलब्ध कराई गईं।
डॉ. संजय काला ने बताया कि आरोपी डॉक्टर डॉ. ब्रजेश कुमार मूल रूप से आजमगढ़ में तैनात हैं और वर्तमान में हैलट में अटैच हैं। इससे पहले भी उनकी कार्यशैली पर सवाल उठ चुके हैं और एक बार उनकी अटैचमेंट समाप्त करने के लिए पत्र लिखा जा चुका है। अब दोबारा शासन को रिपोर्ट भेजी जाएगी। प्राचार्य ने इस कृत्य को आपराधिक प्रवृत्ति का बताया और कहा कि डॉक्टर के खिलाफ कई शिकायतें पहले से मौजूद हैं। यहां तक कि एक जिंदा रोगी को मृत घोषित करने की चर्चित घटना भी उनकी यूनिट से जुड़ी बताई जाती है।
वहीं, डॉ. ब्रजेश कुमार ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने रोगियों को अस्पताल के भीतर ही पैथोलॉजिकल जांच के लिए कमरा नंबर 34 में भेजा था। उनका दावा है कि रोगी रास्ता भटक गए और उन्हें गलतफहमी हो गई। पर्चे पर अपना नंबर लिखने की बात भी उन्होंने स्वीकार की, लेकिन निजी पैथोलॉजी से किसी तरह की सांठगांठ से इनकार किया।
गौरतलब है कि हैलट अस्पताल में निजी पैथोलॉजियों और उनके एजेंटों की गतिविधियां पहले भी उजागर हो चुकी हैं। कुछ दिन पहले सर्जरी विभाग में भर्ती एक रोगी को एजेंट द्वारा फर्जी हेपेटाइटिस-सी निगेटिव रिपोर्ट थमा दी गई थी। इससे पहले वार्ड में रोगियों के ब्लड सैंपल लेने पहुंचे दलाल को भी प्राचार्य ने रंगेहाथ पकड़ा था। दिसंबर में एक पैरामेडिकल छात्र और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के पास से निजी पैथोलॉजियों के कार्ड बरामद होने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं।
लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने सरकारी अस्पतालों में पारदर्शिता और मरीजों के भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि शासन स्तर पर की जाने वाली कार्रवाई इस ‘कमीशन नेटवर्क’ पर कितनी प्रभावी चोट कर पाती






