नौ माह बाद केएफसीएल को नई उम्मीद, अदाणी समूह संभालेगा पनकी उर्वरक संयंत्र

संवाद 24 संवाददाता। नौ माह से बंद पड़े कानपुर फर्टिलाइजर एंड केमिकल्स लिमिटेड (केएफसीएल) के लिए अब राहत की खबर है। पनकी स्थित इस प्रतिष्ठित उर्वरक संयंत्र का संचालन जल्द ही अदाणी समूह के हाथों में जाएगा। राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने 14 नवंबर 2025 को अदाणी समूह की बोली को मंजूरी दे दी थी। इसके बाद 20 दिसंबर 2025 को समूह के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्लांट का निरीक्षण कर उसकी क्षमता, संपत्तियों, मशीनरी और मानव संसाधन से जुड़ी जानकारी जुटाई।

केएफसीएल का संचालन पूर्व में जेपी एसोसिएट ग्रुप कर रहा था। यह वही प्लांट है, जहां कभी ‘चांद छाप’ यूरिया के नाम से किसानों के बीच लोकप्रिय खाद का उत्पादन होता था, जिसे बाद में ‘भारत छाप’ यूरिया के नाम से जाना जाने लगा। अपनी पूरी क्षमता पर यह संयंत्र प्रतिदिन करीब 2100 मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन करता था और उत्तर भारत के किसानों के लिए एक अहम आधार माना जाता था।

बकाया और सब्सिडी बनी बंदी की वजह
पिछले साल केएफसीएल की मुश्किलें तब बढ़ीं, जब बकाया भुगतान के चलते गेल ने गैस आपूर्ति बंद कर दी। प्रबंधन ने सरकार से मिलने वाली सब्सिडी और बाजार में उपलब्ध यूरिया की बिक्री के माध्यम से भुगतान का भरोसा दिया था। इसी क्रम में दिसंबर 2024 और जनवरी 2025 में गेल को 538 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया। हालांकि, इसके बाद केस्को ने भी बिजली बिल के बकाया को लेकर आपूर्ति काट दी, जिससे उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया।

स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब केंद्र सरकार की ओर से सब्सिडी भुगतान से जुड़े एनर्जी मानक का नवीनीकरण 31 मार्च 2025 के बाद नहीं किया गया। पर्याप्त सब्सिडी के अभाव में एक अप्रैल 2025 से प्लांट को बंद करना पड़ा। कर्मचारियों को हटाने और दूसरे प्रतिष्ठानों में स्थानांतरण की प्रक्रिया भी इसी दौरान शुरू हुई।

श्रमिकों की निगाहें नए संचालन पर
फिलहाल प्लांट में करीब 100 स्थायी और अस्थायी कर्मचारी ही बचे हैं। वेतन भुगतान से जुड़ा विवाद श्रम न्यायालय में विचाराधीन है। भारतीय उर्वरक श्रमिक संघ के अध्यक्ष सुखदेव मिश्रा के अनुसार, अदाणी समूह की एंट्री से कर्मचारियों और क्षेत्र के लोगों में नई उम्मीद जगी है। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने संयंत्र की मौजूदा स्थिति और परिसंपत्तियों का गहन मूल्यांकन किया है, जिससे संकेत मिलते हैं कि उत्पादन दोबारा शुरू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

लंबे इतिहास वाला संयंत्र
1967 में कमीशन हुआ पनकी का यह उर्वरक संयंत्र अपने इतिहास में कई उतार-चढ़ाव देख चुका है। आईईएल और डंकन के दौर की बंदी के बाद, जेपी ग्रुप ने इसे 2012 से 2015 के बीच करीब 1500 करोड़ रुपये निवेश कर पुनर्जीवित किया था। उस समय करीब 90 करोड़ रुपये के श्रमिक बकाये का भुगतान किया गया और फीड स्टॉक को नाफ्था से प्राकृतिक गैस में बदला गया। इसके बाद लगभग एक दशक तक यह प्लांट 90 प्रतिशत से अधिक क्षमता पर उत्पादन करता रहा।

क्षेत्र और किसानों के लिए बड़ी उम्मीद
अब अदाणी समूह के हाथों में संचालन आने से न सिर्फ पनकी और कानपुर क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि किसानों को भी स्थानीय स्तर पर यूरिया की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी। यदि सब कुछ योजना के अनुसार आगे बढ़ता है, तो नौ माह से खामोश पड़ा केएफसीएल जल्द ही फिर से अपनी चिमनियों से धुआं उगलता नजर आएगा और उर्वरक उद्योग में अपनी पुरानी पहचान हासिल करेगा।

Pavan Singh
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